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रविवार, 13 अगस्त 2017

आसानी से पत्नी से तलाक लेने के तरीके और जानकारी Ways to divorce and get information from wife

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भारत में तलाक लेना एक बहुत ही महंगा होता है , क्यों की तलाक का केस लड़ना और जितना बहुत मुश्किल काम है , वकीलों की मनमानी होती है , और फेसला आने में बहुत समय लगता है क्यों की वकील लोग आपनी मनमानी करते है ,अगर आपको को तलाक की प्रकिया के बारे में जानकारी हो तो ये काम आसन हो जाता है और वकील अपनी मनमानी भी नही कर पाएंगे तो जानते है भारत में तलाक केसे लिया जाता है
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आपसी सहमती से तलाक के नियम-
भारत में तलाक के दो तरीके हैं। एक अपसी सहमती से और दूसरा संघर्ष भरा फैसला। आपसी सहमती से लिए भारत में काफी आसान है। इस प्रक्रिया के लिए पति और पत्नी दोनों की सहमती तलाक के लिए जरूरी है मतलब साफ है कि अलग होने का फैसला दोनों का होना चाहिए।

गुजारा भत्ता – 
गुजारा भत्ता की कोई कम या ज्यादा लिमिट नहीं होती। दोनों पार्टनर बैठकर आपसी समझ से फैसला ले सकते हैं।
बच्चों की निगरानी –
 अगर आपके बच्चे हैं तो उनकी देखभाल की जिम्मेदारी जिसे कानूनी भाषा में चाइल्ड कस्टडी कहते हैं वो एक जटिल समस्या होती है। अगर दोनों पैरेंट्स देखभाल करना चाहते हैं तो ये उनकी आपसी सोच पर निर्भर करती है कि ज्वाइंट चाइल्ड कस्टडी, शेयर चाइल्ड कस्टडी या मुक्त रूप से किसी एक को जिम्मेदारी सौंपी जाए।

आपसी सहमती से तलाक के लिए कैसे केस दाखिल करें

अगर ऐसा करना चाहते हैं तो सबसे पहले जो पति पत्नी तलाक लेना चाहते हैं वो एक साल से कम से कम अलग अलग रह रहे हों। यहां जानिए पूरी प्रक्रिया।

पहला चरण- दोनों पार्टी (पति और पत्नी) को कोर्ट में पहले एक याचिका दाखिल करनी पड़ती है।

दूसरा चरण - कोर्ट के सामने दोनों पक्ष के बयान रिकॉर्ड किए जाते हैं और पेपर पर दस्तखत लिए जाते हैं।
तीसरा चरण -  कोर्ट दोनों पक्ष को 6 महीने का समय देती है कि वो अपने रिश्ते को वक्त दें और फिर सोचें कि उन्हें तलाक चाहिए या नहीं। इसे सामंजस्य बिठाने की अवधि भी कहते हैं।

चौथा चरण - जब ये समय खत्म हो जाता है तो दोनों पार्टी फाइनल सुनवाई के लिए बुलाई जाती है। (अगर उन्होंने अपना फैसला बदल लिया है)

पांचवां चरण - अंतिम सुनवाई में कोर्ट अपना आखिरी फैसला सुनाती है।

divorce laws in india

तलाक के लिए संघर्ष-

जैसा कि नाम से पता चलता है कि इसके लिए एक पक्ष को दूसरे पक्ष (पति या पत्नी जो भी) से बहस/लड़ाई करनी होगी। भारत में आप तलाक के लिए तभी लड़ सकते हैं जब आप किसी तरह से शारीरिक/मानसिक प्रताड़ना, पार्टनर द्वारा छोड़ देना, पार्टनर की विक्षिप्त मानसिक स्थिति, धोखा, नपुसंकता जैसी गंभीर चीजें हो जिस वजह से साथ रहना नामुमकिन हो जाए।
इस केस में जो पक्ष तलाक चाहता है उन्हें कोर्ट में एक केस दाखिल करना होता है और साथ ही साक्ष्य भी दिखाना होता है। तलाक तभी मंजूर की जाती है अगर जो पक्ष तलाक चाहती है वो साबित कर सके कि वो वाकई तलाक की हकदार है।

केस लड़कर साबित कर तलाक लेने की प्रक्रिया-

पहला चरण - सबसे पहले आप किस आधार पर तलाक लेना चाहते हैं ये सुनिश्चित कर लें।

दूसरा चरण - आप जिस आधार पर तालाक चाहते हैं इसके लिए साक्ष्य जुटाना शुरू करें। इस तरह से 
तलाक लेने की प्रक्रिया में सबसे अह्म यही होता है कि आप कितने मजबूत सुबूत दिखा पाते हैं।

तीसरा चरण - कोर्ट में याचिका दाखिल करें और साथ ही सारे साक्ष्य और कागज भी जमाक करें।

चौथा चरण (क)- याचिका दाखिल होने के बाद कोर्ट दूसरे पक्ष को नोटिस देगी। अगर दूसरा पक्ष कोर्ट
 नहीं पहुंचता है तो ये मुद्दा एकपक्षी होता है तलाक प्रस्तुत किए कागजों पर दिया जाता है।

चौथा चरण (ख) - अगर दूसरा पक्ष कोर्ट में हाजिर होता है तो ये द्वपक्षीय हो जाता है और दोनों पार्टी की बातें सुनती हैं और कोशिश करती है कि सुलह हो जाए।अगर बाद में दोनों साथ में रहना चाहते हों या फिर तलाक।
पांचवां चरण - अगर दोनों पक्ष सुलग नहीं कर पाए तो केस करने वाला पक्ष लिखित में दूसरे के खिलाफ याचिका देता है। लिखित बयान 30 से 90 दिन के भीतर होना चाहिए।

छठा चरण - एक बार अगर बयान की प्रक्रिया पूरा हो जाए तो कोर्ट फैसला लेती है कि आगे क्या करना है।
सातवां चरण - कोर्ट सुनवाई शुरू करती है और दोनों पक्षों को और उनके पेश किए गए सुबूत और पेपर दुबारा देखती है।

आठवां चरण - सारे सुबूतों को देखने के बाद कोर्ट अपना फैसला सुनाती है। ये काफी लंबी प्रक्रिया  और कई सप्ताह, महीने और साल भी लग जाते हैं।  

तलाक के नियम भारत में आपसी बॉन्डिंग के खराब होने के आधार पर नहीं मिलते। इसे या तो आपसी सहमति से साबित करके लेना होता है। कानून ने इसमें कुछ कमियां मानी हैं इसलिए एक बिल तैयार किया गया है जो फिलहाल संसद में लंबित है। अगर ये बिल संसद में पास होती है तो आपसी कंपेटिब्लिटी के इश्यू पर आप तलाक ले सकते हैं। इस तरह कई लोग जो इस आधार पर कानूनी रूप से अपना रिश्ता नहीं खत्म कर पा रहे वो कर पाएंगे।
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मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

भारत में कैदियों के भी जबरदस्त अधिकार है -Prisoner's rights in India is tremendous -

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भारत की जेलों में लाखो कैदी विचारधीन और सजायाफ्ता जो इस समय भारत की जेलों में बंद है ,भारत में जेल का कानून अंग्रेजो का बनाया हुवा है और देश के आजाद होने के बाद इनमे कुछ कानून हटाये गये है और कुछ कानून नये भी बनाये गये है ,जिन में जेल में बंद सभी केदियो को कुछ मोलिक अधिकार भी दिए गये है जिनके बारे में बहुतो को नही पता इस लिए आपकी मदद के लिए हम ये आपको बता रहे है ,पहला तो सुचना के अधिकार से  कैदियों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में सूचना प्राप्त करने का अधिकार है ।
भारत में कैदियों के भी जबरदस्त अधिकार है -Prisoner's rights in India is tremendous -

कैदियों का मौलिक अधिकार-

कैदियों को अनुच्छेद 14,19 और 21 में दिए गये मौलिक अधिकार प्राप्त करने के अधिकार हैं।

अनुच्छेद 14- विधि के समक्ष समता- राज्य , भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता  या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा ।

अनुच्छेद 19-(क)  वाक-स्वातंत्र्य औऱ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार ।

अनुच्छेद 21- प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण-किसी व्यक्ति को , उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा, अन्यथा नहीं ।

चिकित्सा सुविधा का अधिकार-

1-कैदियों को चिकित्सा सुविधा पाने का अधिकार है ।

2-अगर इसकी उपेक्षा की जाती है तो सरकार द्वारा कर्तव्यों की उपेक्षा मानी जायेगी ।

केस के जल्दी निपटारे का अधिकार-
अनुच्छेद 21 के तहत कैदियों को केस के जल्दी निपटारे का अधिकार है ।

समय से अधिक बंदी नहीं-

1-न्यायालयों में बिना किसी परिसीमा के निर्णय औऱ देर से विचार मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण है । केस का जल्दी से निपटारा होना चाहिए।

2-अगर कैदी न्यायालय द्वारा सुनाई गयी सजा, पहले ही जेल में काट चुका हो तो उसे छोड़ दिया जाना चाहिए।

विचाराधीन कैदी को जमानत-

1-जिन कैदियों पर मुकदमा अभी विचाराधीन है वो दोष सिद्ध होने से पहले जमानत के लिए आवेदन कर सकते  हैं ।

2-अगर न्यायालय को यह संतुष्टि हो जाती है कि अभियोगी पर पारिवारिक उत्तादात्वि है। और यह संतुष्टि हो कि वह इन सामाजिक बंधनों के कारण पलायन नहीं करेगा तब उसे एक बंध पत्र पर रिहा किया जा सकता है ।

कैदियों को मतदान का अधिकार-

विचाराधीन कैदियों को अपना वोट डालने का अधिकार  है।

कैदियों को वेतन अथवा मजदूरी का अधिकार -

1-कैदियों को जेल में उनके किए गए कार्य के लिए न्यूनतम मजदूरी मिलनी चाहिए।

2-मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 4 में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति से गुलामी नहीं करवाई जा सकती है ।

3-मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 23(1) में कहा गया है कि हर व्यक्ति को काम करने का, काम चुनने का, कार्य करने के स्थान पर न्यायपूर्वक और अनुकूल परिस्थितियों  के साथ ही बेरोजगारी से सुरक्षा का अधिकार होना चाहिए।

4-मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 23(3) में कहा गया है कि सही वेतन जो स्वयं औऱ परिवार के गरिमामय अस्तित्व को आश्वस्त करता हो ।

5-मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 10(1) में कहा गया है कि सभी व्यक्तियों को , जिनसे उनकी स्वतंत्रता का अधिकार ले लिया गया हो , उनके आदर और मानवता की भावना से पूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

वकील से परामर्श का अधिकार-

1-कैदी को अधिकार है कि वह अपने फैसले से कानूनी सलाहकार से भेंट कर सके । ऐसा ना होने पर संविधान के अनुच्छेद 14 औऱ 21 का उल्लंघन होगा ।

2-सीआरपीसी की धारा 161(2) और आपीसी की धारा 179 के तहत  अभियुक्त परीक्षण अधवा जांच के दौरान अपने कानूनी सलाहकार अथवा वकील को बुला सकता है ।

खुद के विरुद्ध साक्ष्य के लिए बाध्यता नहीं-

1-संविधान के अनुच्छेद 20(3) के अनुसार किसी भी अपराध में अभियुक्त को स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है ।

2-इसका अर्थ है कि न्यायिक प्रक्रिया से अधिक कहने के लिए किसी को भी बाध्य नहीं किया जा सकता है, फिर चाहे वह साक्ष्य के लिए हो या किसी भी सूचना देने के लिए हो।

निशुल्क विधिक सहायता का अधिकार-

ऐसा अभियुक्त जो किसी कानूनी सलाहकार को नियुक्त करने में सक्षम ना हो, गरीब हो या अन्य कोई परिस्थिति हो,  निशुल्क कानूनी  सहायता पाने का अधिकारी है ।

1-कोर्ट को निर्देश हैं कि वो किसी भी व्यक्ति को कारावास की सजा देते समय उसे फैसले की निशुल्क कॉपी दे।

2-यह कॉपी जेल अधिकारी कैदी को तुरंत दे औऱ उससे लिखित में उस कॉपी की प्राप्ति की सूचना ले।

3-अगर कैदी इस फैसले की अपील अथवा रिवीजन फाइल करना चाहता हो तो जेल प्रशासन उस कैदी के लिए सारी सुविधाएं प्रदान करे।

4-वकील की नियुक्ति में असमर्थ कैदी के लिए कोर्ट किसी भी सक्षम सलाहकार को नियुक्त कर सकता है ,लेकिन यह तभी हो सकता है जब अभियुक्त  को इस पर कोई आपत्ति ना हो ।

5-नियुक्त वकील का खर्च राज्य सरकार उठायेगी , जिसने कैदी को अभियु्क्त ठहराया है।

6- अभियुक्त को निशुल्क कानूनी सहायता मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने के दौरान से ही प्रदान की जानी चाहिए।

विचाराधीन कैदियों को सुविधाएं-

1-अपने मित्रों तथा परिजनों से पत्र व्यवहार का अधिकार।

2-मित्रों औऱ परिजनों से मिलने का अधिकार ।

3-अपने वकील या उसके एजेंट से बातचीत या सलाह का अधिकार।

4-रेडियो , संगीत या टेलीविजन की सुविधा का अधिकार ।

5-अपने घर में होने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं में भाग लेने का अधिकार।

6-व्यक्तित्व विकास के लिए सांस्कृतिक  शिक्षा पाने का अधिकार ।

कैदियों की शिकायत निवारण के उपाय-

1-जेलों में लगाए गए शिकायत बॉक्सों में अपनी शिकायतों को लिखकर डालना।

2-सेशन जज या एडिशनल डिस्ट्रिक्त जज शिकायत बॉक्स के शिकायती पत्रों को रिकॉर्ड में रखेंगे और शिकायतों को दूर करेंगे।

3-जिला अथवा सेशन जज शिकायत बॉक्स में डाली गयी शिकायतों के संबंध में एक शिकायत रजिस्टर भी रखेंगे ।

4-जिला अथवा सेशन जज अपने क्षेत्राधिकार में आने वाली जेलों का निरीक्षण करेंगे औऱ कैदियों को यह भरपूर मौका देंगे कि उनकी शिकायतों को दूर करने के लिए उपयुक्त कदम उठाएं ।

5-सेशन जज अपने क्षेत्राधिकार में आने वाली जेलों का निरीक्षण करने के लिए वकीलों को भी नियुक्त कर सकते हैं । औऱ वकील निरीक्षण के बाद अपनी  रिपोर्ट को संबंधित कोर्ट को देगा ।
सेक्स का अधिकार -
एक कैदी पति-पत्नी के मामले में फैसला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि जेल में बंद कैदी को अपने पति या पत्नी से यौन संबंध बनाने और बच्चे पैदा करने का अधिकार है। संविधान के मुताबिक ये एक मौलिक अधिकार है और कैदियों को इससे वंचित नहीं रखा जा सकता।
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