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सोमवार, 1 जनवरी 2018

जाने इस्लाम (मुस्लिम) धर्म के बारे में -।know about islam(muslim)

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क्या है इस्लाम का इतिहास-
आमतौर पर यह समझा जाता है कि इस्लाम 1400 वर्ष पुराना धर्म है, और इसके ‘प्रवर्तक’ पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) हैं। लेकिन वास्तव में इस्लाम 1400 वर्षों से काफ़ी पुराना धर्म है; उतना ही पुराना जितना धर्ती पर स्वयं मानवजाति का इतिहास और हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) इसके प्रवर्तक (Founder) नहीं, बल्कि इसके आह्वाहक हैं। आपका काम उसी चिरकालीन (सनातन) धर्म की ओर, जो सत्यधर्म के रूप में आदिकाल से ‘एक’ ही रहा है, लोगों को बुलाने, आमंत्रित करने और स्वीकार करने के आह्वान का था। आपका मिशन, इसी मौलिक मानव धर्म को इसकी पूर्णता के साथ स्थापित कर देना था ताकि मानवता के समक्ष इसका व्यावहारिक रूप साक्षात् रूप में आ जाए।

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इस्लाम का इतिहास जानने का अस्ल माध्यम स्वयं इस्लाम का मूल ग्रंथ ‘क़ुरआन’ है। और क़ुरआन, इस्लाम का आरंभ प्रथम  मनुष्य ‘आदम’ से होने का ज़िक्र करता है। इस्लाम धर्म के अनुयायियों के लिए क़ुरआन ने ‘मुस्लिम’ शब्द का प्रयोग हज़रत इबराहीम (अलैहि॰) के लिए किया है जो लगभग 4000 वर्ष पूर्व एक महान पैग़म्बर (सन्देष्टा) हुए थे। हज़रत आदम (अलैहि॰) से शुरू होकर हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) तक हज़ारों वर्षों पर फैले हुए इस्लामी इतिहास में असंख्य ईशसंदेष्टा ईश्वर के संदेश के साथ, ईश्वर द्वारा विभिन्न युगों और विभिन्न क़ौमों में नियुक्त किए जाते रहे। उनमें से 26 के नाम कु़रआन में आए हैं और बाक़ी के नामों का वर्णन नहीं किया गया है। इस अतिदीर्घ श्रृंखला में हर ईशसंदेष्टा ने जिस सत्यधर्म का आह्वान दिया वह ‘इस्लाम’ ही था; भले ही उसके नाम विभिन्न भाषाओं में विभिन्न रहे हों। बोलियों और भाषाओं के विकास का इतिहास चूंकि क़ुरआन ने बयान नहीं किया है इसलिए ‘इस्लाम’ के नाम विभिन्न युगों में क्या-क्या थे, यह ज्ञात नहीं है।

इस्लामी इतिहास के आदिकालीन होने की वास्तविकता समझने के लिए स्वयं ‘इस्लाम’ को समझ लेना आवश्यक है। 

इस्लाम क्या है, यह कुछ शैलियों में क़ुरआन के माध्यम से हमारे सामने आता है, जैसे:-

1. इस्लाम, अवधारणा के स्तर पर ‘विशुद्ध एकेश्वरवाद’ का नाम है। यहां ‘विशुद्ध’ से अभिप्राय है: ईश्वर के व्यक्तित्व, उसकी सत्ता व प्रभुत्व, उसके अधिकारों (जैसे उपास्य व पूज्य होने के अधिकार आदि) में किसी अन्य का साझी न होना। विश्व का...बल्कि पूरे ब्रह्माण्ड और अपार सृष्टि का यह महत्वपूर्ण व महानतम सत्य मानवजाति की उत्पत्ति से लेकर उसके हज़ारों वर्षों के इतिहास के दौरान अपरिवर्तनीय, स्थायी और शाश्वत रहा है।

2. इस्लाम शब्द का अर्थ ‘शान्ति व सुरक्षा’ और ‘समर्पण’ है। इस प्रकार इस्लामी परिभाषा में इस्लाम नाम है, ईश्वर के समक्ष, मनुष्यों का पूर्ण आत्मसमर्पण; और इस आत्मसमर्पण के द्वारा व्यक्ति, समाज तथा मानवजाति के द्वारा ‘शान्ति व सुरक्षा’ की उपलब्धि का। यह अवस्था आरंभ काल से तथा मानवता के इतिहास हज़ारों वर्ष लंबे सफ़र तक, हमेशा मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता रही है।

3- इस्लाम की वास्तविकता, एकेश्वरवाद की हक़ीक़त, इन्सानों से एकेश्वरवाद के तक़ाज़े, मनुष्य और ईश्वर  के बीच अपेक्षित संबंध, इस जीवन के पश्चात (मरणोपरांत) जीवन की वास्तविकता आदि जानना एक शान्तिमय, सफल तथा समस्याओं, विडम्बनाओं व त्रासदियों से रहित जीवन बिताने के लिए हर युग में अनिवार्य रहा है; अतः ईश्वर ने हर युग में अपने सन्देष्टा (ईशदूत, नबी, रसूल, पैग़म्बर) नियुक्त करने (और उनमें से कुछ पर अपना ‘ईशग्रंथ’ अवतरित करने) का प्रावधान किया है। इस प्रक्रम का इतिहास, मानवजाति के पूरे इतिहास पर फैला हुआ है।

4. शब्द ‘धर्म’ (Religion) को, इस्लाम के लिए क़ुरआन ने शब्द ‘दीन’ से अभिव्यक्त किया है। क़ुरआन में कुछ ईशसन्देष्टाओं के हवाले से कहा गया है (42:13) कि ईश्वर ने उन्हें आदेश दिया कि वे ‘दीन’ को स्थापित (क़ायम) करें और इसमें भेद पैदा न करें, इसे (अनेकानेक धर्मों के रूप में) टुकड़े-टुकड़े न करें।

इससे सिद्ध हुआ कि इस्लाम ‘दीन’ हमेशा से ही रहा है। उपरोक्त संदेष्टाओं में हज़रत नूह (Noah) का उल्लेख भी हुआ है और हज़रत नूह (अलैहि॰) मानवजाति के इतिहास के आरंभिक काल के ईशसन्देष्टा हैं। क़ुरआन की उपरोक्त आयत (42:13) से यह तथ्य सामने आता है कि अस्ल ‘दीन’ (इस्लाम) में भेद, अन्तर, विभाजन, फ़र्क़ आदि करना सत्य-विरोधी है-जैसा कि बाद के ज़मानों में ईशसन्देष्टाओं का आह्वान व शिक्षाएं भुलाकर, या उनमें फेरबदल, कमी-बेशी, परिवर्तन-संशोधन करके इन्सानों ने अनेक विचारधाराओं व मान्यताओं के अन्तर्गत ‘बहुत से धर्म’ बना लिए।

मानव प्रकृति प्रथम दिवस से आज तक एक ही रही है। उसकी मूल प्रवृत्तियों में तथा उसकी मौलिक आध्यात्मिक, नैतिक, भौतिक आवश्यकताओं में कोई भी परिवर्तन नहीं आया है। अतः मानव का मूल धर्म भी मानवजाति के पूरे इतिहास में उसकी प्रकृति व प्रवृत्ति के ठीक अनुकूल ही होना चाहिए। इस्लाम इस कसौटी पर पूरा और खरा उतरता है। इसकी मूल धारणाएं, शिक्षाएं, आदेश, नियम...सबके सब मनुष्य की प्रवृत्ति व प्रकृति के अनुकूल हैं।

अतः यही मानवजाति का आदिकालीन तथा शाश्वत धर्म है।

क़ुरआन ने कहीं भी हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) को ‘इस्लाम धर्म का प्रवर्तक’ नहीं कहा है। क़ुरआन में हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) का परिचय नबी (ईश्वरीय ज्ञान की ख़बर देने वाला), रसूल (मानवजाति की ओर भेजा गया), रहमतुल्-लिल-आलमीन (सारे संसारों के लिए रहमत व साक्षात् अनुकंपा, दया), हादी (सत्यपथ-प्रदर्शक) आदि शब्दों से कराया है।

स्वयं पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने इस्लाम धर्म के ‘प्रवर्तक’ होने का न दावा किया, न इस रूप में अपना परिचय कराया। आप (सल्ल॰) के एक कथन के अनुसार ‘इस्लाम के भव्य भवन में एक ईंट की कमी रह गई थी, मेरे (ईशदूतत्व) द्वारा वह कमी पूरी हो गई और इस्लाम अपने अन्तिम रूप में सम्पूर्ण हो गया’ (आपके कथन का भावार्थ।) इससे सिद्ध हुआ कि आप (सल्ल॰) इस्लाम धर्म के प्रवर्तक नहीं हैं। (इसका प्रवर्तक स्वयं अल्लाह है, न कि कोई भी पैग़म्बर, रसूल, नबी आदि)। और आप (सल्ल॰) ने उसी इस्लाम का आह्वान किया जिसका, इतिहास के हर चरण में दूसरे रसूलों ने किया था। इस प्रकार इस्लाम का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना मानवजाति और उसके बीच नियुक्त होने वाले असंख्य रसूलों के सिलसिले (श्रृंखला) का इतिहास।

यह ग़लतफ़हमी फैलने और फैलाने में, कि इस्लाम धर्म की उम्र कुल 1400 वर्ष है दो-ढाई सौ वर्ष पहले लगभग पूरी दुनिया पर छा जाने वाले यूरोपीय (विशेषतः ब्रिटिश) साम्राज्य की बड़ी भूमिका है। ये साम्राज्यी, जिस ईश-सन्देष्टा (पैग़म्बर) को मानते थे ख़ुद उसे ही अपने धर्म का प्रवर्तक बना दिया और उस पैग़म्बर के अस्ल ईश्वरीय धर्म को बिगाड़ कर, एक नया धर्म उसी पैग़म्बर के नाम पर बना दिया। (ऐसा इसलिए किया कि पैग़म्बर के आह्वाहित अस्ल ईश्वरीय धर्म के नियमों, आदेशों, नैतिक शिक्षाओं और हलाल-हराम के क़ानूनों की पकड़ (Grip) से स्वतंत्र हो जाना चाहते थे, अतः वे ऐसे ही हो भी गए।) यही दशा इस्लाम की भी हो जाए, इसके लिए उन्होंने इस्लाम को ‘मुहम्मडन-इज़्म (Muhammadanism)’ का और मुस्लिमों को ‘मुहम्मडन्स (Muhammadans)’ का नाम दिया जिससे यह मान्यता बन जाए कि मुहम्मद ‘इस्लाम के प्रवर्तक (Founder)’ थे और इस प्रकार इस्लाम का इतिहास केवल 1400 वर्ष पुराना है। न क़ुरआन में, न हदीसों (पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल॰ के कथनों) में, न इस्लामी इतिहास-साहित्य में, न अन्य इस्लामी साहित्य में...कहीं भी इस्लाम के लिए ‘मुहम्मडन-इज़्म’ शब्द और इस्लाम के अनुयायियों के लिए ‘मुहम्मडन’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, लेकिन साम्राज्यिों की सत्ता-शक्ति, शैक्षणिक तंत्र और मिशनरी-तंत्र के विशाल व व्यापक उपकरण द्वारा, उपरोक्त मिथ्या धारणा प्रचलित कर दी गई।

भारत के बाशिन्दों में इस दुष्प्रचार का कुछ प्रभाव भी पड़ा, और वे भी इस्लाम को ‘मुहम्मडन-इज़्म’ मान बैठे। ऐसा मानने में इस तथ्य का भी अपना योगदान रहा है कि यहां पहले से ही सिद्धार्थ गौतम बुद्ध जी, ‘‘बौद्ध धर्म’’ के; और महावीर जैन जी ‘‘जैन धर्म’’ के ‘प्रवर्तक’ के रूप में सर्वपरिचित थे। इन ‘धर्मों’ (वास्तव में ‘मतों’) का इतिहास लगभग पौने तीन हज़ार वर्ष पुराना है। इसी परिदृश्य में भारतवासियों में से कुछ ने पाश्चात्य साम्राज्यिों की बातों (मुहम्मडन-इज़्म, और इस्लाम का इतिहास मात्र 1400 वर्ष की ग़लत अवधारणा) पर विश्वास कर लिया।
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बुधवार, 20 दिसंबर 2017

हिन्दू धर्म के अनुसार हमारा का जन्म कैसे हुआ हम कहा से आये-According to Hinduism, we were born, how we came to the

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सृष्टि के आदिकाल में न सत् था न असत्, न वायु थी न आकाश, न मृत्यु थी न अमरता, न रात थी न दिन, उस समय केवल वही था, जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी शक्ति से सांस ले रहा था। उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।’ ‘ब्रह्म वह है, जिसमें से संपूर्ण सृष्टि और आत्माओं की उत्पत्ति हुई है या जिसमें से ये फूट पड़े हैं। विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का कारण ब्रह्म है।’ -(ऋग्वेद, उपनिषद)
हिन्दू ग्रंथो के अनुसार मानव का जनम,केसे जाने ज्ञान /According to Hindu scriptures of human birth, how the knowledge,इन्सान का जन्म ,पहला इन्सान ,पहला मानव ,कहा से आया ,हम कोण है ,हम कहा से आये है --kaise hui aadmi ki utpatti-मानव की उत्पत्ति-पृथ्वी का अंत-मानव की उत्पत्ति का इतिहास-मानव का इतिहास-पृथ्वी का निर्माण-पृथ्वी अ का इतिहास-पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति-मानव का विकास-हिन्दू धर्म के अनुसार हमारा का जन्म कैसे हुआ हम कहा से आये-According to Hinduism, we were born, how we came to the इंसान की उत्पत्ति मनुष्य कैसे बना manav ki पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति कैसे हुई धरती का पहला मानव कौन था?  मानव की उत्पत्ति और विकास धरती का पहला मानव कौन था मनुष्य कैसे बना पृथ्वी की उत्पत्ति video पृथ्वी की उत्पत्ति video download मानव का इतिहास पृथ्वी का निर्माण मनुष्य का जन्म कैसे हुआ


ब्रह्म से आत्मा। आत्मा से जगत की उत्पत्ति हुई। महर्षि अरविंद ने अपनी किताब ‘दिव्य जीवन’ में इस संबंध में बहुत अच्छे से लिखा है। उन्होंने जहां पुराणों के अनुसार धरती पर जीवन की उत्पत्ति, विकास और उत्थान के बारे में बताया है वहीं उन्होंने वेदों की पंचकोशों की धारणा को विज्ञान की कसौटी पर कसा है।
जब धरती ठंडी होने लगी तो उस पर बर्फ और जल का साम्राज्य हो गया। तब धरती पर जल ही जल हो गया। इस जल में ही जीवन की उत्पत्ति हुई। आत्मा ने ही खुद को जलरूप में व्यक्त किया। इस जलरूप ने ही करोड़ों रूप धरे। जल का यह रूप हिरण्यगर्भ में जन्मा अर्थात जल के गर्भ में जन्मा।
सर्वप्रथम : सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ से अंडे के रूप का एक मुख प्रकट हुआ। मुख से वाक् इन्द्री, वाक् इन्द्री से ‘अग्नि’ उत्पन्न हुई। तदुपरांत नाक के छिद्र प्रकट हुए। नाक के छिद्रों से ‘प्राण’ और प्राण से ‘वायु’ उत्पन्न हुई। फिर नेत्र उत्पन्न हुए। नेत्रों से चक्षु (देखने की शक्ति) प्रकट हुए और चक्षु से ‘आदित्य’ प्रकट हुआ। फिर ‘त्वचा’, त्वचा से ‘रोम’ और रोमों से वनस्पति-रूप ‘औषधियां’ प्रकट हुईं। उसके बाद ‘हृदय’, ‘हृदय’ से ‘मन, ‘मन से ‘चन्द्र’ उदित हुआ। तदुपरांत नाभि, नाभि से ‘अपान’ और अपान से ‘मृत्यु’ का प्रादुर्भाव हुआ। फिर ‘जननेन्द्रिय, ‘जननेन्द्रिय से ‘वीर्य’ और ‘वीर्य’ से ‘आप:’ (जल या सृजनशीलता) की उत्पत्ति हुई।
यहां वीर्य से पुन: ‘आप:’ की उत्पत्ति कही गई है। यह आप: ही सृष्टिकर्ता का आधारभूत प्रवाह है। वीर्य से सृष्टि का ‘बीज’ तैयार होता है। उसी के प्रवाह में चेतना-शक्ति पुन: आकार ग्रहण करने लगती है। सर्वप्रथम यह चेतना-शक्ति हिरण्य पुरुष के रूप में सामने आई।
अति सूक्ष्म रूप में जीवन की उत्पत्ति के बाद मोटेतौर पर वनस्पत्तियों, लताओं और फिर वृक्षों की उत्पत्ति हुई। इस क्रम में आगे चलकर एककोशीय और फिर बहुकोशीय जीवों की उत्पत्ति हुई।
कुछ ऐसे जीव उत्पन्न हुए जिसमें हड्डी न होती थी तथा ये किसी पतले इमली, नीम के पत्ते की तरह होते थे। प्रारंभ में ये सभी जल के भीतर की भूमि से जुड़े रहते थे। ऐसे जीव जो एकेंद्रीय थे अर्थात वे न देख सकते थे, न सुन सकते थे, न स्वाद ले सकते थे। बस स्पर्श ही उनकी अनुभूति थी।
इसी क्रम में आगे चलकर एक पत्तेनुमा मछली की उत्पत्ति हुई। फिर मछली ने कई रूप धरे। हिन्दू धर्म में मछली को पवित्र जलचर जंतु माना जाता है। जल के अंदर मछली की उत्पत्ति सबसे बड़ी घटना थी। संभवत: यह घटना 3 अरब वर्ष पहले की है।
वराह काल और कच्छप काल : जब वराह काल में धरती के कुछ भाग को जल से ऊपर प्रकट किया गया तो प्रारंभ में कुछ आदिकालीन शैवाल और वनस्पतियों ने धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। यही धीरे-धीरे वृक्ष का आकार लेने लगी।
इन छोटी-छोटी घासों के पीछे आए उभयचर प्राणी, कीट, कीड़े और सरीसृप आदि। यही धरती पर और जल में अपनी सत्ता जमाने लगे। इनमें से कई हिंसक प्राणियों से बचने के लिए कीटों ने वृक्षों पर चढ़ना सीखा और उनमें से ही कुछ कीटों में पंख निकलने लगे और इस तरह आकाश में कीट-पतंगों की भरमार होने लगी।
इधर कई उभयचर प्राणियों में कछुआ सबसे विकसित प्राणी था और उन्हीं आदिकालीन प्रजातियों में से कुछ उड़ना सीखकर पक्षी होने लगे। कुछ धरती पर नए-नए रूप धरने लगे। सर्वप्रथम जमीन पर बसने वाले प्राणियों ने अपनी जड़ें पानी में ही जमाए रखीं, उसी तरह जिस तरह कि वनस्पत्तियों और पौधों ने। ऐसा इसलिए कि वे धरती पर ज्यादा देर तक रह नहीं सकते थे। उन्हें सांस लेने के लिए जल में लौटना ही पड़ता था।
हिन्दू धर्म में सर्प को इसलिए महत्व दिया जाता है कि जहां जल में इसकी करोड़ों प्रजातियां थीं वहीं धरती पर सबसे पहले इसका ही साम्राज्य स्थापित हुआ। यह जल के बगैर भी धरती पर कई दिनों तक रहने में कामयाब रहा और इसने अन्य प्राणियों की अपेक्षा सबसे पहले जल पर अपनी निर्भरता छोड़ दी। इसकी ऐसी भी प्रजातियां थीं, जो उड़ने में सफल हो गई थीं।
वराह, कच्छप और सर्प ने धरती पर जीवन के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिस तरह सर्प की कुछ अन्य प्रजातियां उड़ने में सफल हो गई थीं उसी तरह कछुए की प्रजातियां भी कुछ इसमें सफल रहीं और इस तरह आकाश में कीट-पतंगों, मछलियों, कछुओं और सर्पों की भिन्न-भिन्न प्रजातियों ने आकाश को हरा-भरा कर दिया।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, धरा के पर्यावरण में भारी बदलाव आते गए। जो जीव इन परिवर्तनों के अनुसार अपने आपको ढाल नहीं सके, वे हमेशा के लिए विलुप्त हो गए और जिन्होंने खुद को बचाए रखा वे विजेता कहलाए। उनमें मछली, सर्प, कछु्आ, मगरमच्छ, कीट-पतंगें, चींटी, मकोड़े आदि जलचर और उभयचर प्राणी तो आज भी हैं, लेकिन अब सवाल यह उठता है कि मनुष्य कैसे और किससे बना?
इसके लिए हिन्दू धर्म में दो सिद्धांत हैं- 1. मनुष्य को ईश्वर ने बनाया, 2. क्रम विकास के तहत मनुष्य बना मछली जैसे प्राणी से।
1. मनुष्य को ईश्वर ने बनाया : ब्रह्म से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई और ब्रह्मा ने खुद को दो भागों में विभक्त कर लिया। उसका पुरुष रूप एक भाग का नाम था स्वायंभुव मनु और स्त्री रूप दूसरे का नाम शतरूपा था। सप्तचरुतीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई। प्रमाण यही बताते हैं कि आदि सृष्टि की उत्पत्ति भारत के उत्तराखंड अर्थात इस ब्रह्मावर्त क्षेत्र में ही हुई। 
2. मनुष्य बना मछली जैसे प्राणी से : आज का मनुष्य मछली की लाखों प्रजातियों में से एक विशेष मछली का विकसित रूप है। विकास के क्रम में उसने कई महत्वपूर्ण रूप बदले। लेकिन पूर्व काल में मनुष्य सिर्फ मछली का ही विकसित रूप नहीं रहा और ‍भी कई ऐसे जीव-जंतु थे, जो न मालूम कब वानर की भिन्न-भिन्न प्रजातियां बनते गए और अंतत: उन्हीं में से एक आज का आधुनिक मनुष्य बना। जिस तरह मछलियां हजारों प्रजातियों में पाई जाती हैं उसी तरह मानव भी आदिकाल में हजारों प्रजातियों में थे। हालांकि आज हमें अफ्रीकी, यूरोपीय, चीनी, भारतीय आदि क्षे‍त्र की मानव प्रजातियां ही नजर आती हैं।
वेद में सृष्टि की उत्पत्ति, विकास, विध्वंस और आत्मा की गति को पंचकोश के क्रम में समझाया गया है। पंचकोश ये हैं- 1. अन्नमय, 2. प्राणमय, 3. मनोमय, 4. विज्ञानमय और 5. आनंदमय। 
उक्त पंचकोश को ही 5 तरह का शरीर भी कहा गया है। वेदों की उक्त धारणा विज्ञानसम्मत है।
दो गोलार्ध हैं- एक उर्ध्व और दूसरा अधो। जब आत्मा नीचे गिरती है तो जड़ हो जाती है और इस तरह वह विकास क्रम का हिस्सा बनकर अपने पुरुषार्थ से ऊपर उठना शुरू करती है और अंतत: स्वयं के आनंदस्वरूप को पुन: प्राप्त कर लेती है। लेकिन कुछ ऐसी भी आत्माएं हैं, जो कभी नीचे नहीं गिरीं और जाग्रत हो गईं, वे ही आत्माएं देवात्माएं कहलाईं। उनके कारण भी सृष्टि उत्पत्ति, विकास और विध्वंस हुआ।
महर्षि अरविंद ने अपनी किताब ‘दिव्य जीवन’ में इस संबंध में बहुत अच्छे से लिखा है।

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में सब कुछ जो आप जानना चाहते है Everything you want to know about Rohingya Muslims

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रोहिंग्या मुसलमानों का मामला जून में नृशंस जनसंहार और लूटपाट की एक कार्यवाही के बाद दुनिया के ध्यान का केन्द्र बना किन्तू यह कोई अस्थाई विषय नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से विश्व के सबसे अत्याचारग्रस्त अल्पसंख्यक बताए जाने वाले रोहिग्या मुसलमानों के अतिरिक्त शायद दुनिया का कोई भी अल्पसंख्यक इस विषम स्थिति का शिकार नहीं हुआ।

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 जिस देश में वह शताब्दियों से आबाद हैं वह उन्हें अपना नागरिक स्वीकार करने और मूलभूत अधिकार देने को तैयार नहीं है बल्कि व्यवहारिक रूप से जातीय सफाए के प्रयास में है। म्यांमार के राष्ट्रपति थीन सेन का आदेश कि हम अपनी ही जाति के लोगों की ज़िम्मेदारी ले सकते हैं किन्तु अपने देश में ग़ैर क़ानूनी रूप से प्रविष्ट होने वाले रोहिग्या मुसलमानों की ज़िम्मेदारी स्वीकार करना हमारे लिए असंभव है जो हमारी जाती से संबंध नहीं रखते। यह बयान उन्होंने कुछ दिन पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार आयुक्त नवी पिल्ली के उस बयान के उत्तर में दिया जो उन्होंने रख़ाइन में बहुसंख्यक आबादी के हाथों जनसंहार और लूटपाट का निशाना बनने वाले रोहिग्या मुसलमानों की स्थिति की समीक्षा लेने के बाद किया था।

 संयुक्त राष्ट्र संघ में मानवाधिकार आयुक्त की आशंकाओं के उत्तर में राष्ट्रपति थीन सेन ने आठ लाख मुसलमानों के विषय का “समाधान” यह पेश किया कि यदि कोई तीसरा देश उन्हें स्वीकार करे तो मैं उन्हें वहां भेज दूंगा, यह है वह चीज़ जो हमारी नज़र में विषय का समाधान है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या लाखों रोहिग्या मुसलमान राष्ट्रपति थीन सेन के क्षेत्र में रातों रात प्रविष्ट हो गये हैं जिन्हें देश से निकाल बाहर करना ही उनके अनुसार विषय का एकमात्र समाधान है या इन लोगों का कोई इतिहास या अतीत थी है? उनका अतीत क्या है और उनके पूर्वज कौन थे और अराकान में यह लोग कब से आबाद हैं।

 इन प्रश्नों का प्रमाणित उत्तर करना, विषय को समझने के लिए अतिआवश्यक है। रोहिग्या शब्द कहां से निकला? इस बारे में रोहिग्या इतिहासकारों में मतभेद पाये जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह शब्द अरबी के शब्द रहमा अर्थात दया से लिया गया है और आठवीं शताब्दी ईसवी में जो अरब मुसलमान इस क्षेत्र में आये थे, उन्हें यह नाम दिया गया था जो बाद में स्थानीय प्रभाव के कारण रोहिग्या बन गया किन्तु दूसरे इतिहासकारों का मानना है कि इसका स्रोत अफ़ग़ानिस्तान का रूहा स्थान है और उनका कहना है कि अरब मुसलमानों की पीढ़ीयां अराकान के तटवर्ती क्षेत्र में आबाद हैं जबकि रोहिग्या अफ़ग़ानिस्तान के रूहा क्षेत्र से आने वाली मुसलमान जाती है। इसके मुक़ाबले में बर्मी इतिहासकारों का दावा है कि रोहिग्या शब्द बीसवीं शताब्दी के मध्य अर्थात 1950 के दशक से पहले कभी प्रयोग नहीं हुआ और इसका उद्देश्य वह बंगाली मुसलमान हैं जो अपना घर बार छोड़कर अराकान में आबाद हुए।

 राष्ट्रपति थीन सेन और उनके समर्थक इस दावे को आधार बनाकर रोहिग्या मुसलमानों को नागरिक अधिकार देने से इन्कार कर रहे हैं किन्तु यह दावा सही नहीं है रोहिग्या शब्द का प्रयोग अट्ठारहवीं शताब्दी में प्रयोग होने का ठोस प्रमाण मौजूद है। बर्मा में अरब मुसलमानों के प्रविष्ट होने और रहने पर सभी एकमत हैं। उनकी बस्तियां अराकीन के मध्यवर्ती क्षेत्रों में हैं जबकि रोहिग्या मुसलमानों की अधिकांश आबादी बांग्लादेश के चटगांव डिविजन से मिली अराकान के सीमावर्ती क्षेत्र मायो में आबाद है। अराकान में बंगाली मुसलमानों के बसने के प्रथम प्रमाण पंद्रहवीं ईसवी शताब्दी के चौथे दशक से मिलते हैं।

 द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा पर जापान के क़ब्ज़े के बाद आराकान में बौद्धमत के अनुयाई रख़ाइन और रोहिंग्या मुसलमानों के मध्य रक्तरंजित झड़पें हुईं। रख़ाइन की जनता जापानियों की सहायता कर रही थी और रोहिंग्या अंग्रेज़ों के समर्थक थे इसीलिए जापान ने भी रोहिंग्या मुसलमानों पर जम कर अत्याचार किया। जनवरी वर्ष 1948 में बर्मा स्वतंत्र हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1948 में कुछ रोहिंग्या मुसलमानों ने अराकान को एक मुस्लिम देश बनाने के लिए सशस्त्र संघर्ष आरंभ किया। वर्ष 1962 में जनरल नी विंग की सैन्य क्रांति तक यह आंदोलन बहुत सक्रिय था। जनरल नी विंग की सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध व्यापक स्तर पर सैन्य कार्यवाही की जिसके कारण कई लाख मुसलमानों ने वर्तमान बांग्लादेश में शरण ली।

उनमें से बहुत से लोगों ने बाद में कराची का रूख़ किया और उन लोगों ने पाकिस्तान की नागरिकता लेकर पाकिस्तान को अपना देश मान लिया। मलेशिया में भी पच्चीस से तीस हज़ार रोहिंग्या मुसलमान आबाद हैं। बर्मा के लोगों ने लंबे संघर्ष के बाद तानाशाह से मुक्ति प्राप्त कर ली है और देश में लोकतंत्र की बेल पड़ गयी है। वर्ष 2012 के चुनाव में लोकतंत्र की सबसे बड़ी समर्थक आन सांग सू की की पार्टी की सफलता के बावजूद रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिक के दरवाज़े बंद हैं और उन पर निरंतर अत्याचार जारी है जो लोकतंत्र के बारे में सू के बयानों से पूर्ण रूप से विरोधाभास रखता है। अब भी विश्व जनमत के मन में यह प्रश्न उठता है कि बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना के बाद क्या रोहिंग्या मुसलमानों का उनका अधिकार मिल पायेगा?

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सोमवार, 7 अगस्त 2017

भारत की शापित जगह जहां से कोई जिन्दा नहीं आता India's cursed place from where no one lives

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भारत में कुछ ऐसे स्थान है जिनके बारे में बहुत से लोग नही जानते पर वहा जाना मौत को गले लगाने से कम नही है . अर्थात किसी पुराने शाप के चलते अब ये या तो भूतिया हो गए हैं  या फिर उजाड़ पड़े हैं. हालांकि ऐसे भी स्थान है जो किसी शाप के चलते अब एक तीर्थ बन गए हैं.
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बहुत लोगों का मानना है कि इन जगहों पर जाने से हमारा अहित हो सकता है फिर भी  कुछ यहां अपने रोमांच के लिए जाते हैं. हालांकि कुछ ऐसे भी स्थान है जो शापित तो नहीं है, लेकिन किसी न किसी शाप से जुड़े हैं और वहां जाकर व्यक्ति अपने पापों से मुक्त हो सकता है.
आइए जानते हैं कि भारत में कहां-कहां स्थित है ऐसे शापित स्थान जहां आज भी शाप का असर कायम है. शापित होने का मतलब कतई यह नहीं की यह स्थान बुरे हैं. यहां आज भी हजारों की तादाद में लोग जाते हैं.
जमीन में दफन शापित नगरी 
जमीन में दफन शापित नगरी भारत की शापित जगह जहां से कोई जिन्दा नहीं आता India's cursed place from where no one lives
मध्यप्रदेश के देवास जिले के गांव गंधर्वपुरी को शापित गांव माना जाता है. यह गांव प्राचीनकाल में राजा गंधर्वसेन के शाप से पूरा पाषाण में बदल गया था. यहां का हर व्यक्ति, पशु और पक्षी सभी शाप से पत्थर के हो गए थे. फिर एक ‘धूकोट’ (धूलभरी आंधी) चला, जिससे यह पूरी नगरी जमीन में दफन हो गई.देवास की सोनकच्छ तहसील में स्थित है एक ऐसा गांव जो भारत के बौद्धकालीन इतिहास का गवाह है. इस गांव का नाम पहले चंपावती था. चंपावती के पुत्र गंधर्वसेन के नाम पर बाद में गंधर्वपुरी हो गया. आज भी इसका नाम गंधर्वपुरी है.जनश्रुति के अनुसार यहां मालव क्षत्रप गंधर्वसेन, जिन्हें गर्धभिल्ल भी कहते थे, के शाप से पूरी गंधर्व नगरी पाषाण की हो गई थी. राजा गंधर्वसेन के बारे में अनेकानेक किस्से प्रचलित हैं, लेकिन इस स्थान से जुड़ी कहानी कुछ अजीब ही है. कहते हैं कि गंधर्वसेन ने चार विवाह किए थे. उनकी पत्नियां चारों वर्णों से थीं. क्षत्राणी से उनके तीन पुत्र हुए सेनापति शंख, राजा विक्रमादित्य तथा ऋषि भर्तृहरि.
यहां के स्थानीय निवासी कमल सोनी बताते हैं कि यह बहुत ही प्राचीन नगरी है. यहां आज भी जिस जगह पर भी खुदाई होती है वहां से मूर्ति निकलती है.बताते हैं कि इस नगरी के राजा की पुत्री ने राजा की मर्जी के खिलाफ गधे के मुख के गंधर्वसेन से विवाह रचाया था. गंधर्वसेन दिन में गधे और रात में गधे की खोल उतारकर राजकुमार बन जाते थे. जब एक दिन राजा को इस बात का पता चला तो उन्होंने रात को उस चमत्कारिक खोल को जलवा दिया, जिससे गंधर्वसेन भी जलने लगे तब जलते-जलते उन्होंने राजा सहित पूरी नगरी को शाप दे दिया कि जो भी इस नगर में रहते हैं, वे पत्थर के हो जाएं.गंधर्वसेन गधे क्यों हुए और वे कौन थे यह एक लम्बी दास्तान है. इस संबंध में हमने गांव के सरपंच विक्रमसिंह चौहान से बात की, तो उन्होंने कहा कि यह सही है कि इस गांव के नीचे एक प्राचीन नगरी दबी हुई है. यहां हजारों मूर्तियां हैं.यहां पर 1966 में एक संग्रहालय का निर्माण किया गया, जहां कुछ खास मूर्तियां एकत्रित ‍कर ली गई हैं. संग्रहालय के केयर टेकर रामप्रसाद कुंडलिया बताते हैं कि उस खुले संग्रहालय में अब तक 300 मूर्तियों को संग्रहित किया गया. इसके अलावा अनेक मूर्तियां राजा गंधर्वसेन के मंदिर में हैं और अनेक नगर में यहां-वहां बिखरी पड़ी हैं.जमीन की खुदाई के दौरान यहां आज भी बुद्ध, महावीर, विष्‍णु के अलावा ग्रामीणों की दिनचर्या के दृश्यों से सजी मोहक मूर्तियां मिलती रहती हैं. ग्रामीणों की सूचना के बाद उन्हें संग्रहालय में रख दिया जाता है. स्थानीय निवासी बताते हैं क‍ि यहां से सैकड़ों मूर्तियां लापता हो गई हैं. खैर, अब आप ही तय करें क‍ि आखिर इस ऐतिहासिक नगरी का सच क्या है.
शापित किराडु शहर 
शापित किराडु शहर भारत की शापित जगह जहां से कोई जिन्दा नहीं आता India's cursed place from where no one lives
अब इसे आप चमत्कार कहें या अंधविश्‍वास, लेकिन एक शहर में एक ऐसा भी स्थान हैं, जहां जाकर लोग हमेशा-हमेशा के लिए पत्थर बन जाते हैं. कोई कहता है कि इस शहर पर किसी भूत का साया है तो कोई कहता है कि इस शहर पर एक साधु के शाप का असर है, यहां के सभी लोग उसके शाप के चलते पत्थर बन गए थे और यही वजह है कि आज भी उस शाप के डर के चलते लोग वहां नहीं जाते हैं. लोगों में अब वहम बैठ गया है. राजस्थान में बाड़मेर के पास किराडु शहर का आखिर सच क्या है?कहते हैं कि राजस्थान के बाड़मेर के पास एक ऐसा गांव है, जहां के मंदिरों के खंडहरों में रात में कदम रखते ही लोग हमेशा-हमेशा के लिए पत्थर बन जाते हैं. यह कोई शाप है, जादू है, चमत्कार है या भूतों की हरकत- कोई नहीं जानता. हालांकि किसी ने यह जानने की हिम्मत भी नहीं की कि क्या सच में यहां रात रुकने पर वह पत्थर बन जाएगा? कौन ऐसी रिस्क ले सकता है? तभी तो आज तक इसका रहस्य बरकरार है. कैसे जान पाएगा कोई कि अगर ऐसा होता है तो इसके पीछे कारण क्या है? भारत में शोध और रिसर्च को न तो बढ़ावा दिया जाता और न ही सरकार इस पर कोई खर्च करती है, तो आज भी देश का इतिहास इसी तरह खंडहरों में दफन है.बाड़मेर (राजस्थान) का किराडु शहर ऐसे ही किसी रहस्य को अपने भीतर दफन किए हुए है. कहते हैं कि एक समय था, जब यह स्थान भी आम जगहों की तरह चहल-पहल से भरा था और लोग यहां खुशहाल जीवन जी रहे थे. यहां हर तरह की सुख-सुविधाएं मौजूद थीं, लेकिन एक दिन अचानक इस शहर की किस्मत बदल गई. कहना चाहिए कि इस पर वज्रपात हुआ और सभी अपना जीवन खो बैठे.मान्यता है कि इस शहर पर एक साधु का शाप लगा हुआ है. यह लगभग 900 साल पहले की बात है, जबकि यहां परमारों का शासन था. तब इस शहर में एक सिद्ध संत ने डेरा डाला. कुछ दिन रहने के बाद जब वे संत तीर्थ भ्रमण पर निकले तो उन्होंने अपने साथियों को स्थानीय लोगों के सहारे छोड़ दिया कि आप इनको भोजन-पानी देना और इनकी सुरक्षा करना.संत के जाने के बाद उनके सारे शिष्य बीमार पड़ गए और बस एक कुम्हारिन को छोड़कर अन्य किसी भी व्यक्ति ने उनकी सहायता नहीं की. बहुत दिनों के बाद जब संत पुन: उस शहर में लौटे तो उन्होंने देखा कि मेरे सभी शिष्य भूख से तड़प रहे हैं और वे बहुत ही बीमार अवस्था में हैं. यह सब देखकर संत को बहुत क्रोध आया.उस सिद्ध संत ने कहा कि जिस स्थान पर साधुओं के प्रति दयाभाव ही नहीं है, तो अन्य के साथ क्या दयाभाव होगा? ऐसे स्थान पर मानव जाति को नहीं रहना चाहिए. उन्होंने क्रोध में अपने कमंडल से जल निकाला और हाथ में लेकर कहा कि जो जहां जैसा है, शाम होते ही पत्‍थर बन जाएगा. उन्होंने संपूर्ण नगरवासियों को पत्थर बन जाने का शाप दे दियाफिर उन्होंने जिस कुम्हारिन ने उनके शिष्यों की सेवा की थी, उसे बुलाया और कहा कि तू शाम होने से पहले इस शहर को छोड़ देना और जाते वक्त पीछे मुड़कर मत देखना. कुम्हारिन शाम होते ही वह शहर छोड़कर चलने लगी लेकिन जिज्ञासावश उसने पीछे मुड़कर देख लिया तो कुछ दूर चलकर वह भी पत्थर बन गई. इस शाप के चलते पूरा गांव आज पत्थर का बना हुआ है. जो जैसा काम कर रहा था, वह तुरंत ही पत्थर का बन गया.इस शाप के कारण ही आस-पास के गांव के लोगों में दहशत फैल गई जिसके चलते आज भी लोगों में यह मान्यता है कि जो भी इस शहर में शाम को कदम रखेगा या रुकेगा, वह भी पत्थर का बन जाएगा.किराडु के मंदिरों का निर्माण किसने कराया इस बारे में कोई तथ्य मौजूद नहीं है. यहां पर पर विक्रम शताब्दी 12 के तीन शिलालेख उपलब्ध हैं. पहला शिलालेख विक्रम संवत 1209 माघ वदी 14 तदनुसार 24 जनवरी 1153 का है जो कि गुजरात के चालुक्य कुमार पाल के समय का है. दूसरा विक्रम संवत 1218, ईस्वी 1161 का है जिसमें परमार सिंधुराज से लेकर सोमेश्वर तक की वंशावली दी गई है और तीसरा यह विक्रम संवत 1235 का है जो गुजरात के चालुक्य राजा भीमदेव द्वितीय के सामन्त चौहान मदन ब्रह्मदेव का है. इतिहासकारों का मत है कि किराडु के मंदिरों का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ था तथा इनका निर्माण परमार वंश के राजा दुलशालराज और उनके वंशजों ने किया था.यहां मुख्यत: पांच मंदिर है जिसमें से केवल विष्णु मंदिर और सोमेश्वर मंदिर ही ठीक हालत में है. बाकी तीन मंदिर खंडहरों में बदल चुके हैं.खजुराहो के मंदिरों की शैली में बने इन मंदिरों की भव्यता देखते ही बनती है. हालांकि आज यह पूरा क्षेत्र विराने में बदल गया है लेकिन यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है. इन मंदिरों को क्यों बनाया गया और इसके पीछे इनका इतिहास क्या रहा है इस सब पर शोध किए जाने की आवश्यकता है.
भानगढ़ का किला :
भानगढ़ का किला भारत की शापित जगह जहां से कोई जिन्दा नहीं आता India's cursed place from where no one lives
भानगढ़ राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान के पास स्थित एक एक शहर है. हालांकि इस शहर में कोई नहीं रहता है क्योंकि अब यह शहर पूरा का पूरा खंडहर में बदल चुका है. यहां का एक किला और महल सबसे ज्याता शापित माने जाते हैं. भानगढ़ के किले को आमेर के राजा भगवानदास ने 1573 ई. में बनवाया था.यहां बाजार, गलियां, हवेलियां, महल, कुएं और बावड़िया तथा बाग-बगीचे आदि सब कुछ हैं, लेकिन सब के सब खंडहर हैं. जैसे एक ही रात में सब कुछ उजड़ गया हो. पूरे शहर में एक भी घर या हवेली ऐसी नहीं है, जिस पर छत हो, लेकिन मंदिरों के शिखर आत्ममुग्ध खड़े दिखाई देते हैं.गुरु बालू का शाप : कहते हैं कि भानगढ़ में एक गुरु बालूनाथ रहते थे. उन्होंने भानगढ़ के महल के मूल निर्माण की मंजूरी दी थी लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी थी कि महल की ऊंचाई इतनी रखी जाए कि उसकी छाया उनके ध्यान स्थान से आगे न निकले अन्यथा पूरा नगर ध्वस्त हो जाएगा. बालूनाथ की ये चेतावनी किसी ने सुनी नहीं और राजवंश के राजा अजब सिंह ने उस महल की ऊंचाई बढ़ा दी जिससे की महल की छाया ने गुरु बालूनाथ के ध्यान स्थान को ढंक लिया और तभी से यह महल शापित हो गया.तंत्रिक का शाप : एक अन्य किंवदंति के अनुसार अरावली की पहाडि़यों में सिंघिया नाम का तांत्रिक अपने तंत्र-मंत्र और टोटकों के लिए जाना जाता था. कहते हैं कि वह मन ही मन भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती को चाहने लगा था. राजकुमारी को पाने के लिए उसने सिर में लगाने वाले तेल को अभिमंत्रित कर दिया था. कहा जाता है कि रत्नावली भी तंत्र-मंत्र और टोटके की जानकार थी. उसने अपनी शक्ति से तेल के टोटके को पहचान लिया और तेल एक बड़ी शिला पर डाल दिया. इस प्रयोग के बाद शिला तांत्रिक की ओर उड़ चली. चट्टान को अपनी ओर आते देख तांत्रिक क्रोधित हो गया.उसने शिला से कुचलकर मरने से पहले एक और तंत्र किया और शिला को समूचे भानगढ़ को बर्बाद करने का आदेश दिया. चट्टान ने रातों-रात भानगढ़ के महल, बाजारों और घरों को खंडहर में तब्दील कर दिया. लेकिन मंदिरों और धार्मिक स्थानों पर तांत्रिक का तंत्र नहीं चला और मंदिरों के शिखर ध्वस्त होने से बच गए.
असीरगढ़ का किला :
असीरगढ़ का किला भारत की शापित जगह जहां से कोई जिन्दा नहीं आता India's cursed place from where no one lives
कहते हैं यहाँ स्थित शिव मंदिर में महाभारतकाल के अश्वत्थामा आज भी पूजा-अर्चना करने आते हैं. असीरगढ़ का किला मध्यप्रदेश के बुरहानपुर शहर से 20 किलोमीटर दूर है. कहते हैं कि जो एक बार अश्वत्थामा को देख लेता है, उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है.ब्रह्मास्त्र चलाने के बारण भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को कलियुग में एक निश्‍चित तिथि तक भटकते रहने का शाप दे दिया था. यही कारण है कि पिछले लगभग पांच हजार वर्षों से अश्वत्थामा आज भी भटक रहे हैं. उनके बारे में कई जगहों पर उनके देखे जाने की जनश्रुतियां प्रचलित है उसी में से एक असीरगढ़ का किला सबसे ज्यादा प्रचलित है.
शापित है कृष्ण का गोवर्धन पर्वत :
शापित है कृष्ण का गोवर्धन पर्वत भारत की शापित जगह जहां से कोई जिन्दा नहीं आता India's cursed place from where no one lives
गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत भी कहा जाता है. पांच हजार साल पहले यह गोवर्धन पर्वत 30 हजार मीटर ऊंचा हुआ करता था और अब शायद 30 मीटर ही रह गया है. पुलस्त्य ऋषि के शाप के कारण यह पर्वत एक मुट्ठी रोज कम होता जा रहा है. इसी पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी चींटी अंगुली पर उठा लिया था. श्रीगोवर्धन पर्वत मथुरा से 22 किमी की दूरी पर स्थित है.पौराणिक मान्यता अनुसार श्रीगिरिराजजी को पुलस्त्य ऋषि द्रौणाचल पर्वत से ब्रज में लाए थे. दूसरी मान्यता यह भी है कि जब रामसेतुबंध का कार्य चल रहा था तो हनुमानजी इस पर्वत को उत्तराखंड से ला रहे थे, लेकिन तभी देववाणी हुई की सेतुबंध का कार्य पूर्ण हो गया है, तो यह सुनकर हनुमानजी इस पर्वत को ब्रज में स्थापित कर दक्षिण की ओर पुन: लौट गए.क्यों उठाया गोवर्धन पर्वत : इस पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी चींटी अंगुली से उठा लिया था. कारण यह था कि मथुरा, गोकुल, वृंदावन आदि के लोगों को वह अति जलवृष्टि से बचाना चाहते थे. नगरवासियों ने इस पर्वत के नीचे इकठ्ठा होकर अपनी जान बचाई. अति जलवृष्टि इंद्र ने कराई थी. लोग इंद्र से डरते थे और डर के मारे सभी इंद्र की पूजा करते थे, तो कृष्ण ने कहा था कि आप डरना छोड़ दे…मैं हूं ना.परिक्रमा का महत्व : सभी हिंदूजनों के लिए इस पर्वत की परिक्रमा का महत्व है. वल्लभ सम्प्रदाय के वैष्णवमार्गी लोग तो इसकी परिक्रमा अवश्य ही करते हैं क्योंकि वल्लभ संप्रदाय में भगवान कृष्ण के उस स्वरूप की आराधना की जाती है जिसमें उन्होंने बाएं हाथ से गोवर्धन पर्वत उठा रखा है और उनका दायां हाथ कमर पर है.इस पर्वत की परिक्रमा के लिए समूचे विश्व से कृष्णभक्त, वैष्णवजन और वल्लभ संप्रदाय के लोग आते हैं. यह पूरी परिक्रमा 7 कोस अर्थात लगभग 21 किलोमीटर है.परिक्रमा मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थल आन्यौर, जातिपुरा, मुखार्विद मंदिर, राधाकुंड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, गोविन्द कुंड, पूंछरी का लौठा, दानघाटी इत्यादि हैं. गोवर्धन में सुरभि गाय, ऐरावत हाथी तथा एक शिला पर भगवान कृष्ण के चरण चिह्न हैं.परिक्रमा की शुरुआत वैष्णवजन जातिपुरा से और सामान्यजन मानसी गंगा से करते हैं और पुन: वहीं पहुंच जाते हैं. पूंछरी का लौठा में दर्शन करना आवश्यक माना गया है, क्योंकि यहां आने से इस बात की पुष्टि मानी जाती है कि आप यहां परिक्रमा करने आए हैं. यह अर्जी लगाने जैसा है. पूंछरी का लौठा क्षेत्र राजस्थान में आता है.वैष्णवजन मानते हैं कि गिरिराज पर्वत के ऊपर गोविंदजी का मंदिर है. कहते हैं कि भगवान कृष्ण यहां शयन करते हैं. उक्त मंदिर में उनका शयनकक्ष है. यहीं मंदिर में स्थित गुफा है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह राजस्थान स्थित श्रीनाथद्वारा तक जाती है.गोवर्धन की परिक्रमा का पौराणिक महत्व है. प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक लाखों भक्त यहां की सप्तकोसी परिक्रमा करते हैं. प्रतिवर्ष गुरु पूर्णिमा पर यहां की परिक्रमा लगाने का विशेष महत्व है. श्रीगिरिराज पर्वत की तलहटी समस्त गौड़ीय सम्प्रदाय, अष्टछाप कवि एवं अनेक वैष्णव रसिक संतों की साधाना स्थली रही है.अब बात करते हैं पर्वत की स्थिति की. क्या सचमुच ही पिछले पांच हजार वर्ष से यह स्वत: ही रोज एक मुठ्ठी खत्म हो रहा है या कि शहरीकरण और मौसम की मार ने इसे लगभग खत्म कर दिया. आज यह कछुए की पीठ जैसा भर रह गया है.हालांकि स्थानीय सरकार ने इसके चारों और तारबंदी कर रखी है फिर भी 21 किलोमीटर के अंडाकार इस पर्वत को देखने पर ऐसा लगता है कि मानो बड़े-बड़े पत्‍थरों के बीच भूरी मिट्टी और कुछ घास जबरन भर दी गई हो. छोटी-मोटी झाड़ियां भी दिखाई देती है.पर्वत को चारों तरफ से गोवर्धन शहर और कुछ गांवों ने घेर रखा है. गौर से देखने पर पता चलता है कि पूरा शहर ही पर्वत पर बसा है, जिसमें दो हिस्से छूट गए है उसे ही गिर्राज (गिरिराज) पर्वत कहा जाता है. इसके पहले हिस्से में जातिपुरा, मुखार्विद मंदिर, पूंछरी का लौठा प्रमुख स्थान है तो दूसरे हिस्से में राधाकुंड, गोविंद कुंड और मानसी गंगा प्रमुख स्थान है.बीच में शहर की मुख्य सड़क है उस सड़क पर एक भव्य मंदिर हैं, उस मंदिर में पर्वत की सिल्ला के दर्शन करने के बाद मंदिर के सामने के रास्ते से यात्रा प्रारंभ होती है और पुन: उसी मंदिर के पास आकर उसके पास पीछे के रास्ते से जाकर मानसी गंगा पर यात्रा समाप्त होती है.मानसी गंगा के थोड़ा आगे चलो तो फिर से शहर की वही मुख्य सड़क दिखाई देती है. कुछ समझ में नहीं आता कि गोवर्धन के दोनों और सड़क है या कि सड़क के दोनों और गोवर्धन? ऐसा लगता है कि सड़क, आबादी और शासन की लापरवाही ने खत्म कर दिया है गोवर्धन पर्वत को.
राजा जगतपाल सिंह का शापित किला :
राजा जगतपाल सिंह का शापित किला भारत की शापित जगह जहां से कोई जिन्दा नहीं आता India's cursed place from where no one lives
झारखण्ड की राजधानी से 18 किलोमीटर की दुरी पर रांची-पतरातू मार्ग के पिठौरिया गांव में 2 शताब्दी पुराना राजा जगतपाल सिंह का किला स्थित है. यह 100 कमरों वाला विशाल महल अब खंडहर में परिवर्तित हो चुका है. इसके खंडहर में परिवर्तित होने का कारण इस किले पर हर साल बिजली गिरना है.आश्चर्य जनक रूप से इस किले पर दशकों से हर साल बिजली गिरती आ रही है जिससे की हर साल इसका कुछ हिस्सा टूट कर गिर जाता है. दशकों से ऐसा होते रहने के कारण यह किला अब बिलकुल खंडहर हो चुका है.ग्रामिणों के अनुसार इस किले पर हर साल बिजली एक क्रांतिकारी द्वारा राजा जगतपाल सिंह को दिए गए शाप के कारण गिरती है. वैसे तो बिजली गिरना एक प्राकृति घटना है, लेकिन एक ही जगह पर दशकों से लगातार बिजली गिरना अवश्य ही आश्चर्यजनक है.कौन थे राजा जगतपाल सिंह? इतिहासकारों के अनुसार पिठौरिया प्रारम्भ से ही मुंडा और नागवंशी राजाओं का प्रमुख केंद्र रहा है. यह इलाका 1831-32 में हुए कौल विद्रोह के कारण इतिहास में जाना जाता है. पिठौरिया के राजा जगतपाल सिंह ने अपने क्षेत्र का विकास कर उसे व्यापार और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बना दिया था. वो अपने क्षेत्र की जनता में काफी लोकप्रिय थे लेकिन उनकी कुछ गलतीयों ने उनका नाम इतिहास में खलनायकों और गद्दारों की सूचि में शामिल करवा दिया.सबसे पहली गलती तो उन्होंने 1831 के विद्रोह के समय की. 1831 में सिंदराय और बिंदराय के नेतृत्व में आदिवासियों ने आंदोलन किया था लेकिन यहां की भौगोलिक परस्तिथियों से अनजान अंग्रेज विद्रोह को दबा नहीं पा रह थे. इसलिए अंग्रेज अधिकारी विलकिंगसन ने राजा जगतपाल सिंह के पास सहायता का संदेश भिजवाया जिसे की जगतपाल सिंह ने स्वीकार करते हुए अंग्रेजों की मदद की. उनकी इस मदद के बदले तत्कालीन गवर्नर जनरल विलियम वैंटिक ने उन्हें 313 रुपए प्रतिमाह आजीवन पेंशन दी. दूसरा और सबसे बड़ा गुनाह उन्होंने 1857 की क्रांति में किया.1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों को रोकने के लिए उन्होंने पिठौरिया घाटी की घेराबंदी की थी, ताकि क्रांतिकारी अपने मकसद में सफल न हो सके. इतना ही नहीं वे क्रांतिकारियों की हर गतिविधियों की जानकारी अंग्रेज तक पहुंचाते थे. इससे राज्य में राजा के प्रति नाराजगी अपने चरम पर पहुंच गई. उनकी गद्दारी के चलते ही उस समय क्रांतिकारी ठाकुर विश्वनाथ नाथ शाहदेव उन्हें सबक सिखाने पिठौरिया पहुंचे और उन पर आक्रमण किया. बाद में वे गिरफ्तार हो गए और जगतपाल सिंह की गवाही के कारण उन्हें 16 अप्रैल 1858 को रांची जिला स्कूल के सामने कदम्ब के वृक्ष पर फांसी पर लटका दिया गया. जानकार बताते हैं कि उनकी ही गवाही पर कई अन्य क्रांतिकारियों को भी फांसी पर लटकाने का काम किया गया.लोकमान्यता है कि विश्वनाथ शाहदेव ने जगतपाल सिंह को अंग्रेजों का साथ देने और देश के साथ गद्दारी करने पर यह शाप दिया कि आने वाले समय में जगतपाल सिंह का कोई नाम लेवा नहीं रहेगा और उसके किले पर हर साल उस समय तक वज्रपात होता रहेगा, जब तक यह किला पूरी तरह बर्बाद नहीं हो जाता. तब से हर साल पिठौरिया स्थित जगतपाल सिंह के किले पर वज्रपात हो रहा है.

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रविवार, 16 जुलाई 2017

'मुगले-आजम' के रचयिता k.आसिफ का जीवन परिचय K. Asif's book introduces the life of 'Mughle-Azam'

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'मुगल-ए-आजम'
महज आठवीं जमात तक पढ़े थे. पैदाइश से जवानी तक का वक्त गरीबी में गुजारा था. फिर उन्होंने भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे बड़ी, भव्य और सफल फिल्म का निर्माण किया. यह इसलिए मुमकिन हुआ, क्योंकि उन्हें सिर्फ इतना पता था कि उनकी फिल्म के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा
हम बात कर रहे हैं फिल्म इंडस्ट्री के महान डायरेक्टर्स में से एक करीमुद्दीन आसिफ की, जिन्हें लोग के. आसिफ के नाम से जानते हैं और वह फिल्म थी ‘मुगल-ए-आजम’.
'मुगले-आजम' के रचयिता k.आसिफ का जीवन परिचय K. Asif's book introduces the life of 'Mughle-Azam'

करीमुद्दीन आसिफ का जन्म 14 जून, 1922 को हुआ था और 9 मार्च, 1971 को वह इस दुनिया से रुख्सत हो गए. इस मौके पर हम बता रहे हैं ‘मुगल-ए-आजम’ से जुड़े कुछ किस्से और फिल्म निर्माण को लेकर के. आसिफ का नजरिया. नोश फरमाइए.
ये महान फिल्म 5 अगस्त, 1960 को रिलीज हुई थी. इसके प्रीमियर के लिए बंबई के मराठा मंदिर को दुल्हन की तरह सजाया गया था और आसिफ खुद मेहमानों का स्वागत कर रहे थे. प्रीमियर में ओमप्रकाश, मुकरी, शम्मी कपूर, गीता बाली, नादिरा, राजेंद्र कुमार, सुरैया, शोभना समर्थ, वहीदा रहमान, गुरुदत्त, देवानंद, बिमल रॉय, जय किशन, लता मंगेशकर, माला सिन्हा, मीना कुमारी, कमाल अमरोही और जॉय मुखर्जी जैसे दिग्गज आए थे. राज कपूर तो उसी दिन बर्लिन से लौटे थे. 19वीं शताब्दी के मशहूर पारसी नेता सर काउसजी जहांगीर पहली बार कोई भारतीय फिल्म देखने आए थे.
प्रीमियर देखकर किसी ने आसिफ से कहा कि फिल्म के डायलॉग बहुत ही कठिन उर्दू में हैं, लोगों को समझ नहीं आएंगे. आसिफ ने जवाब दिया कि हर फिल्म की अपनी जुबान होती है. लोगों को समझना होगा, तो वो समझ लेंगे.
ये किस्सा सुनाते हुए समीक्षक जय प्रकाश चौकसे बताते हैं कि फिल्म के एक सीन में अकबर ‘यलगार हो’ बोलते हैं और सेना लड़ने के लिए दौड़ पड़ती है. ये शब्द इतना प्रचलित हुआ कि बाद में गुजरात तक में लोग इसका इस्तेमाल करते सुने गए.
डायलॉग
‘यलगार’ से याद आया, ‘मुगल-ए-आजम’ के संवाद लिखने के लिए आसिफ ने चार लोगों से संपर्क किया था. इसके डायलॉग कमाल अमरोही, वजाहत मिर्जा, अहसान रिजवी और अमानउल्लाह खान ने मिलकर लिखे थे. ये चारों लोग मुगल इतिहास के जानकार थे.
बताते हैं कि के. आसिफ को इस फिल्म का आइडिया 1944 में आया था. वो तब से इस पर काम कर रहे थे, लेकिन शूटिंग जैसे बड़े काम शुरू हुए 1950 के बाद. इतने लंबे समय तक एक ही प्रॉजेक्ट से जुड़े रहना मुश्किल है. इस विकसित तकनीक के जमाने में भी ‘बाहुबली’ बनने में पांच साल का वक्त लगा. सबसे ज्यादा परेशानी तो प्रोड्यूसर को संभालने में आती है. आखिर कौन होगा, जो लगातार 16 सालों तक पैसे देता रहेगा. ये आसिफ की लगन ही थी, जिससे फिल्म तैयार हुई. और जो तैयार हुई, लोग आज भी उसके दीवाने हैं.
शूटिंग के समय जब आसिफ को कुछ कमजोर लगने लगता था (सेट से लेकर संवाद, अभिनय और प्रॉपर्टी तक), वो शूटिंग रोक देते. शीशमहल का सेट बनने की वजह से फिल्म दो साल रुकी रही. दिलीप कुमार के लिए सोने के जूते बनने और एक सीन के लिए मोती इकट्ठे करने के लिए भी फिल्म रुकी रही.
इस फिल्म के प्रोड्यूसर थे शपूरजी पलौंजी मिस्त्री, जिन्हें सिनेमा बिल्कुल पसंद नहीं था. वो फिल्में नहीं देखते थे, लेकिन नाटक देखने के शौकीन थे और इसके लिए अक्सर ओपेरा हाउस जाया करते थे, जहां पृथ्वीराज कपूर के नाटक होते थे. पृथ्वीराज के. आसिफ के साथ फिल्म ‘फूल’ में काम कर चुके थे. पृथ्वीराज आसिफ के हुनर से परिचित थे. तो उन्होंने ही शपूरजी से कहा, ‘आपके पास बहुत पैसा है और आपके जैसा ही आसिफ जैसे पागल आदमी को फाइनेंस कर सकता है. पता नहीं कितने साल और कितना पैसा लगे, पर मैं इतना यकीन से कह सकता हूं कि वो फिल्म अभूतपूर्व बनाएगा.’
पृथ्वीराज के कहने पर शपूरजी फिल्म के फाइनेंसर बने और तब फिल्म को निर्बाध पैसा मिलना शुरू हुआ. वैसे शपूरजी के इंट्रेस्ट के पीछे एक कहानी ये भी है कि शपूरजी अकबर की शख्सियत के दीवाने थे. आसिफ तो सलीम-अनारकली की मोहब्बत के कायल थे, जिसकी वजह से उन्होंने फिल्म बनाना शुरू किया, लेकिन शपूरजी का इंट्रेस्ट अकबर की वजह से जगा था. हालांकि, शपूरजी फिल्म के इकलौते फाइनेंसर नहीं थे. आसिफ ने इन 16 सालों में जो भी कमाया, सब इसी फिल्म में लगा दिया.
‘मुगल-ए-आजम’ का मकबूल गाना ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ शीशमहल में शूट किया गया था. पहले ये सेट साधारण शीशों को काटकर बनाया जा रहा था, लेकिन के. आसिफ को लगा कि इन शीशों से वह मन-मुताबिक आकर्षण पैदा नहीं कर पाएंगे, तो उन्होंने बेल्जियम से खास तरह के शीशे मंगवाए. मोहन स्टूडियो में बने इस 200 फीट लंबे, 80 फीट चौड़े और 35 फीट ऊंचे सेट में 10 लाख की लागत आई थी और बनने में 2 साल का वक्त लगा था. तब तक शूटिंग रुकी रही.
रोचक बात ये है कि फिल्म बनाने से पहले पूरी फिल्म का बजट ही 10 लाख रुपए का रखा गया था. उतना तो अकेले इस सेट में लग गया. पूरी फिल्म में करीब डेढ़ करोड़ रुपए का खर्च आया. शीशमहल का सेट बनने के बाद इसकी लाइटिंग करने में भी टेक्नीशियन्स को छींके आ गई थीं. विदेशी टेक्नीशियन्स तक ने हाथ खड़े कर दिए थे. फिर कैमरामैन आरडी माथुर की मदद से सेट की लाइटिंग मुमकिन हुई. वो टेक्निकल कहानी है.
सेट देखने विदेशों से आते थे मेहमान
‘मुगल-ए-आजम’ के सेट की खूबसूरती की इतनी चर्चा हुई कि देशभर से लोग इन्हें देखने आते थे. अहिस्ता-अहिस्ता बात जब देश के बाहर गई, तो कई विदेशी मेहमान भी सेट की भव्यता देखने भारत आए. इनमें अफगानिस्तान और सउदी अरब के शाही मेहमान, नेपाल के वजीर-ए-आजम, इटली के मशहूर डायरेक्टर रॉबर्तो रोज़ेलिनी और इंग्लैंड के बड़े फिल्ममेकर डेविड लीन शामिल हैं. चीन का कल्चरल डेलिगेशन भी सेट देखने आए थे और बेहद खुश हुआ.
सेट ही नहीं, फिल्म भी देखने आए
के. आसिफ ने ये फिल्म इतनी शानदार, बेमिसाल, लाजवाब बनाई थी कि लोग इसे देखने विदेशों से आते थे. हिंदुस्तानी तो इस कदर दीवाने हो गए थे कि टिकट की बिक्री से पहले दो-दो मील लंबी लाइनें लगाकर खड़े हो जाते थे. रजा मुराद बताते हैं कि कइयों ने तो सड़क पर बिस्तर ही डाल लिया था. वो फुटपाथ पर सोते थे और घरवालों से वहीं खाना मंगाते थे, ताकि टिकट लेकर फिल्म देख सकें.
मराठा मंदिर सिनेमाहॉल में दो टिकट विंडो होती थीं. एक भारतीयों के लिए और दूसरी उनके लिए, जिनके पास पासपोर्ट होते थे. यानी विदेशी. पाकिस्तान से तो न जाने कितने लोग ये फिल्म देखने आए थे.
‘मुगल-ए-आजम’ में इस्तेमाल हुआ एक-एक लिबास, जंगी कपड़े, ढालें, तलवारें और जेवर वगैरह पूरी जांच-पड़ताल के बाद ही तैयार किया गया था और वो किसी मायने में अकबरी जमाने से कमतर नहीं था. बंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में जब इस साजो-सामान की नुमाइश लगी, तो इसे देखने लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था.
इंडियन सिनेमा में ऐसे डायरेक्टर्स कम ही हुए हैं, जो फिल्म के हर हिस्से पर इतना ध्यान दें. सबसे बड़ी बात तो विजन है. न जाने कितने डायरेक्टर्स तरसते हैं कि वो ‘मुगल-ए-आजम’ की भव्यता का 100वां हिस्सा भी अपनी फिल्म में दिखा पाए. आसिफ सोच सकते थे और फिर उसे उतनी ही इंटेंसिटी से दिखा भी सकते थे.
मोतियों की बारिश के लिए मंगाए असली मोती, फिल्म में एक सीन है, जब सलीम 14 साल बाद वापस आते हैं. उनके स्वागत में महल में मोतियों की बारिश करवाई जाती है. पहले तो शूटिंग में आर्टीफीशियल मोती इस्तेमाल हुए, लेकिन वो जमीन से टकराते ही टूट जाते थे. मन-मुताबिक काम न होते देख आसिफ ने असली मोतियों की मांग की और जब तक हजारों मोती इकट्ठे नहीं हो गए, शूटिंग रुकी रही. आसिफ कहते थे कि असली मोतियों के जमीन पर गिरने से जो खनक और खुशी मिलती है, उन्हें वही चाहिए और वो वही हासिल करके माने.

भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसा शायद ही किसी फिल्म के लिए हुआ हो. फिल्म में सलीम के महल लौटने वाले सीन में एक रास्ता दिखाया गया है, जहां सलीम और उनके साथ सैकड़ों सैनिक महल की तरफ बढ़ते हैं. ये सीन राजस्थान के किसी भी पुराने इलाके में शूट किया जा सकता था, लेकिन आसिफ को वो रास्ता इतना पसंद आया कि उन्होंने वहीं शूटिंग करने का फैसला लिया. इसके लिए उन्होंने सरकार, नेताओं और अधिकारियों के साथ काफी मशक्कत की और आखिरकार उस रास्ते में लगे बिजली के सारे खंभे हटवा दिए गए.
‘मुगल-ए-आजम’ का म्यूजिक नौशाद ने कंपोज किया था. जब आसिफ ‘मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे’ गाना लेकर नौशाद के पास गए, तो बस इतना ही बोले, ‘क्लासिक होना चाहिए ये’. नौशाद ने जवाब किया, ‘कोशिश करेंगे’. नौशाद की कोशिश इतना रंग लाई कि आसिफ को कहना पड़ा, ‘अहा! फर्स्ट क्लास.’ जब आसिफ को गाना जंच गया, तो नौशाद ने उनसे कहा, ‘इसमें कोई फिल्मी डांस मास्टर (कोरियोग्राफर) मत लीजिएगा.’
फिर इस गाने की कोरियोग्राफी के लिए नौशाद लच्छू महाराज को आसिफ के पास ले गए. गाना सुनकर लच्छू महाराज रोने लगे. तब आसिफ ने नौशाद को किनारे लेकर कहा, ‘अमां वल्लाह ये क्या ड्रामा है. ये डांस का गाना है और ये बैठे रो रहे हैं’. इस पर नौशाद ने बताया, ‘वाजिद अली शाह के दरबार में इनके बाप जो थे, ये आस्ताई उनकी थी. आस्ताई उनकी ली है मैंने.’ इस पर आसिफ बच्चे की तरह खुश होकर बोले, ‘अरे फिर तो क्लासिक है.’ फिर लच्छू महाराज ने इस गाने पर मधुबाला को नचाया.

जब नौशाद ने ‘मुगल-ए-आजम’ बनानी शुरू की थी, तभी फिल्मिस्तान स्टूडियो ने ‘अनारकली’ नाम की एक फिल्म बनाकर रिलीज कर दी. फिल्म चल भी गई. तो कुछ लोग आसिफ के पास आए और बोले कि अब आपका क्या होगा. इस पर आसिफ ने बड़े आत्मविश्वास और गर्व से कहा, ‘वो उनकी फिल्म है. मैं अपनी फिल्म अपने ढंग से बना रहा हूं.’ इसके बाद क्या हुआ, सब जानते हैं.

आसिफ की ये बात उनका पूरा व्यक्तित्व बयां करती है. वो असल जिंदगी में इतने ही कॉन्फिडेंट थे. न तो उन्होंने बहुत पढ़ाई की थी और न फिल्ममेकिंग का कोई कोर्स. सिर्फ दो ही फिल्में हैं, जो वो पूरी बना पाए. उन्हें अपने काम और काम के लिए अपनी समझ पर भरोसा था. वो उन पैमानों से परे थे कि कोई बड़ा एक्टर है या कोई बड़ा डायरेक्टर है. उनके सामने सब बराबर थे. वो जितना सोचते थे, उसे वैसा ही दिखाने के लिए जी-जान एक कर देते थे. ‘मुगल-ए-आजम’ के निर्माण के दौरान न जाने कितनी ऐसी रातें गुजरीं, जब आसिफ मोहन स्टूडियो में चटाई पर सोए. वो फिल्म नहीं बनाते थे, तपस्या करते थे.

जब फिल्म सिनेमाहॉल में लगने की बारी आई, तो डिस्ट्रीब्यूटर मदन कोठारी ने आसिफ से कहा कि ये कोई ऑर्डिनरी फिल्म तो है नहीं, तो इसके टिकट भी साधारण नहीं होने चाहिए. आसिफ ने कहा, ‘छपवा लीजिए.’ आसिफ की मंजूरी के बाद ऐसे टिकट छपवाए गए, जिसमें फिल्म का पोस्टर भी था. ये टिकट मराठा मंदिर और मुंबई के कुछ दूसरे सिनेमाघरों में बेचे गए. तब इन्हें छापने की लागत 85 हजार आई थी, जो आज के वक्त में करीब 25 लाख होती.

आसिफ को अपने सामने देखने वाले लोग उनकी दो बातों का जिक्र हमेशा करते हैं. एक तो उनके पढ़े-लिखे न होने का और दूसरा उनकी सिगरेट पीने की अदा का. वो मुट्ठी बांधकर सिगरेट पीते थे, जैसे अक्सर रिक्शेवाले या चिलम पीने वाले पीते हैं. उनका शरीर बड़ा था. भारी-भरकम. चौड़ी छाती और कंधों वाला. दिल भी उनका उतना ही बड़ा था. दो-ढाई सौ लोगों की यूनिट के साथ काम करते थे. उनके साथ काम करने वाला हर शख्स उनकी तारीफ करता था. महज 48 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था.
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भारत में इंडियन मुजाहिद्दीन की सच्चाई और मुसलमान The truth of the Indian Mujahideen and the Muslims

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छद्मयुद्ध और मुसलमान :-
भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दो दिन पहले आधा सच बोला कि
"विश्व की दूसरी सबसे अधिक मुस्लिम आबादी होने के बावजूद "आईएसआईएस" भारत में पैर जमाने में नाकाम रहा"
भारत में इंडियन मुजाहिद्दीन की सच्चाई और मुसलमान The truth of the Indian Mujahideen and the Muslims

दरअसल राजनाथ सिंह को पूरी बात कहनी चाहिए थी और वह यह थी कि इस देश के मुसलमानों की इतनी बड़ी आबादी के बावजूद "अलकायदा" भी इस देश में कभी पैर ना जमा सका।
संपुर्ण बात तो यह होती कि "इस देश का मुसलमान "आतंकवाद" से सदैव ही दूर रहा।"
मेरी इस बात का आधार यह है कि कांग्रेस के समय में या अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के समय एक एक करके "इंडियन मुजाहिद्दीन" के नाम पर पकड़ॆ गये मुसलमान भारत की अदालतों से एक एक करके 12 से 20 साल बाद अपना बहुत बड़ा जीवन जेल की अँधेरी काल कोठरी में गुजार कर बाइज्ज़त बरी होते जा रहे हैं।
यदि आप यह सोचेंगे कि अदालतों से एक एक करके बाइज्ज़त बरी होते यह मुसलमान यदि निर्दोष हैं तो इनको जिन आतंकवादी घटनाओं में फँसाया गया उन्हें दरअसल किसने अंजाम दिया ? तो सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा कि यह खेल कितना साजिश भरा है और गहरा है।

महाराष्ट्र के पूर्व आईजी एस एम मुशरिफ ने अपनी किताब "करकरे के हत्यारे कौन" में इस बात का खुलासा साल 2009 में ही कर दिया था कि यह साजिश किसकी है।
दरअसल , आतंकवाद का हौव्वा जब इस देश और दुनिया में खड़ा हुआ तो आतंकवादी घटनाओं में पुलिस और जाँच एजेंसियां अपना नाकारापन छुपाने के लिए छद्म रूप से गढ़ी गये एक आतंकवादी संगठन "इंडियन मुजाहिद्दीन" से उन आतंकवादी घटनाओं को छोड़कर यहाँ से वहाँ तक जहाँ दिल किया मुस्लिम लड़कों को उस संगठन का सदस्य बता कर और उस आतंकवादी घटनाओं में शामिल बता कर जेलों में ठूस दिया जो अब एक एक करके सब बाइज्ज़त बरी हो रहे हैं।
ताज़ी रिहाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शोध के छात्र गुलज़ार वाणी की हुई है जिन्हें ट्रेन धमाकों में फँसाया गया था।

सवाल फिर वही है कि फिर इन सभी घटनाओं को किया किसने ?
महाराष्ट्र पुलिस के पूर्व आईजी एस एम मुशरिफ अपने कार्यकाल के अनुभव पर कहते हैं कि यह सभी कारनामे भारत की खूफिया जाँच एजेंसी "इंटेलिजेंस ब्यूरो" कराती है इसीलिए इन घटनाओं के असली अपराधी पकड़े नहीं जाते और मुसलमानों को इन घटनाओं के नाम पर यहाँ वहाँ से उठा कर जेल में ठूस दिया जाता है और फिर भाँड मीडिया के ज़रिए यह माहौल बनवाया जाता है कि "मुसलमान आतंकवादी होता है" और इसका कारण उसका कट्टर होना और कुरान के प्रति उसकी अपार श्रृद्धा होता है। ऐसे ही छद्म खेल खेलकर मुसलमान और इस्लाम को डरावना बनाने की कोशिशें की गयीं।

दरअसल ऊपर से नीचे तक "इंटेलिजेंस ब्यूरो" में बैठे संघी यह साजिश करते हैं जिसको एस एम मुशरिफ ने सबके सामने नंगा करके रख दिया है , वह भी तमाम प्रमाणों के साथ।
आज "इंडियन मुजाहिद्दीन" का कुछ अता पता नहीं , कौन थे लोग ? कहाँ था हेडक्वार्टर ? सब बातें हवा हो गयीं , और वह यूँ कि इस संगठन का कोई वजूद कभी रहा ही नहीं , इसके वजूद को पुलिस और जाँच एजेंसी अदालतों में सिद्ध ही नहीं कर सकी। इसके नाम से फँसाए गये मुसलमान एक एक करके बाइज्ज़त बरी होते गये तो आईबी का गढ़ा "इंडियन मुजाहिद्दीन" भी हवा हो गया।

कभी कभी मुझे लगता है कि "आइएस" भी झूठ का पुलिंदा है , ठीक "इंडियन मुजाहिद्दीन" की तरह जिससे इसके नाम के सहारे पूरी दुनिया में मुसलमानों का कत्ले-आम किया जा सके।
केवल दुनिया को डराने के लिए इसके मुखिया को रोज मारा जाता है रोज जिन्दा किया जाता है और यह सारी दुनिया की भाँड मीडिया के माध्यम से किया जाता है , प्रतिदिन उसके खौफनाक किस्सों से देश और दुनिया को डराया जाता है और उसके लिए इस्लाम को जिम्मेदार ठहराया जाता है। ओसामा बिन लादेन तो सदैव दुनिया के सामने रहा परन्तु "बगदादी" अदृश्य ही रहा जैसे भारत में "इंडियन मुजाहिद्दीन" अदृश्य रहा।
दरअसल यह छद्म युद्ध कहा जाता है और यहूदी अपने जन्म से यह युद्ध लड़ते रहे हैं , सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हज़रत मुहम्मद के समय से ही , और तब इनकी रणनीति दूसरी थी , ये युद्ध विराम के समझौते करके मुसलमानों को युद्ध करने से रोकते थे और अपनी औरतों और बच्चों को आगे करके समझौता तोड़ कर लोगों को मारते थे।

यही छद्मयुद्ध आज पूरी दुनिया में खेला जा रहा है जो यहूदी सदैव से खेलते आएँ हैं , अब यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं कि "संघी" और "यहूदियों" का डीएनए एक है।
सच तो यह है कि देश का जो मुसलमान अपने विरुद्ध हो रहे इतने उत्पीड़न पर सड़क पर एक विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकता वह अपनी और अपने परिवार की जान जोखिम में डाल कर आतंकवादी क्या बनेगा।
दरअसल आज के मुसलमानों को हक और संघर्ष से अधिक जरूरत "दो वक्त की रोटी" की है , वह झंडा लेकर हक के लिए खड़ा हो जाएगा तो उसके घर में रात की रोटी नहीं बन पाएगी , दो वक्त की रोटी उसके सभी संघर्ष और हक की माँग पर भारी पड़ जाती है , उसे रोज़ कूँआ खोदना होता है रोज़ पानी पीना होता है , वह कूँआ खोदना छोड़कर आंदोलन करेगा तो पानी कहाँ से मिलेगा ? वह पंचर नहीं बनाएगा , कपड़े नहीं सिलेगा , मोटर मशीन नहीं बनाएगा तो रात में घर की रोटी कैसे बनेगी ?  वह इस कारण आंदोलन नहीं करता तो आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने की बात तो बहुत दूर की बात है।

दरअसल , आंदोलन भरे पेट के लोग करते हैं जिनको घर की रोटी की चिंता नहीं होती , 50 साल पहले दलित भी आंदोलन नहीं करते थे , क्युँकि वह भी तब आज के मुसलमान जैसे ही थे , आरक्षण और तमाम योजनाओं ने उनको समृद्ध किया उनको नौकरी मिली और उन्हीं नौकरी वालों से हर दफ्तर में जा जा कर कांशीराम ने दलित आंदोलन को जन्म दिया। दलित आंदोलन कोई भूखे पेट से नहीं जन्मा।
मुसलमानों के संदर्भ में ऐसे आरक्षण और लाभ संविधान में या तो प्रतिबंधित किया या तुस्टीकरण की गाली बना कर सभी को डराया गया कि वह मुसलमान के साथ खड़े होने की हिम्मत ना कर सकें। राहुल हों अखिलेश हों या मायावती , सब इसी कारण डरते हैं।
राजनाथ सिंह जी पूरा सच बोलिए , आप गृहमंत्री हैं आपको तो सब सच पता ही है ?
इस छद्म युद्ध में मारे जाना ही फिलहाल देश के मुसलमानों की किस्मत है। आज कहीं कल कहीं परसों कहीं।
बेसहारा
एक लेखक के दुवरा लिखा गया पोस्ट 
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चीन से आजाद करा कर औरंगजेब ने मिलाया था कैलाश पर्वत को भारत में Freedom from China, Aurangzeb was mixed with Kailash Mountain in India

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औरंगज़ेब_कैलश_पर्वत_और_चीन


आज़ादी के बाद जब चीन ने कैलाश पर्वत, कैलाश मानसरोवर और अरुणाचल प्रदेश पर कब्ज़ा कर लिया तो नेहरू जी UNO पहुंचे की चीन ने ज़बरदस्ती क़ब्ज़ा कर लिया है, हमारी ज़मीन हमें वापस दिलाई जाए, इस पर चीन ने जवाब दिया कि हमने भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं किया है बल्कि अपना वो हिस्सा वापस लिया है जो #औरंगज़ेब हमसे 1680 में छीन कर ले गया था.


चीन ने पहले भी इस हिस्से पर कब्ज़ा किया था, जिस पर औरंगज़ेब ने उस वक़्त चीन के राजा से ख़त लिख कर गुज़ारिश की थी, कि कैलाश मानसरोवर हिंदुस्तान का हिस्सा है और हमारे हिन्दू भाईयों की #आस्था का हिस्सा है, लिहाज़ा इसे छोड़ दें, जब देढ़ महीने तक जवाब नहीं आया तो औरंगजेब ने चीन पर चढ़ाई कर दी और देढ़ दिन में ही हिंदुस्तानी ज़मीन लड़ कर वापस छीन ली.


ये वही औरंगज़ेब है जिस को कट्टर इस्लामी आतंकवादी कहा जाता है, सिर्फ उसी ने हिम्मत दिखाई और चीन पर surgical strike कर दी थी.


इतिहास के इस हिस्से की authenticity को चेक करना हो तो आज़ादी के वक़्त के UNO के हलफनामे जो आज भी संसद में महफूज़ हैं पढ़ सकते हैं.
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रविवार, 19 मार्च 2017

यूपी CM योगी आदित्यनाथ के गहरे राज जानिए Know the deeper state of UP Yogi Adityanath

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up के नये cm योगी जी बन गये है जाहिर है इनके बारे में सब जानना चाहते है | योगी आदित्य नाथ जी का जीवन परिचय और उनके गहरे राज जो अब तक कोई नही जनता था वो आज हम आपको बताने जा रहे है | कट्टर हिंदूवादी और नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख भाजपा से पांच बार सांसद रहे योगी से महंथ बने आदित्यनाथ को अंततः उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए विधायक दल का नेता चुन लिया गया।
यूपी CM योगी आदित्यनाथ के गहरे राज जानिए Know the deeper state of UP Yogi Adityanath

जन्म -
योगीजी का जन्म देवाधिदेव भगवान् महादेव की उपत्यका में स्थित देव-भूमि उत्तराखण्ड में 5 जून सन् 1972 को हुआ। शिव अंश की उपस्थिति ने छात्ररूपी योगी जी को शिक्षा के साथ-साथ सनातन हिन्दू धर्म की विकृतियों एवं उस पर हो रहे प्रहार से व्यथित कर दिया। प्रारब्ध की प्राप्ति से प्रेरित होकर आपने 22 वर्ष की अवस्था में सांसारिक जीवन त्यागकर संन्यास ग्रहण कर लिया। आपने विज्ञान वर्ग से स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की तथा छात्र जीवन में विभिन्न राष्ट्रवादी आन्दोलनों से जुड़े रहे।
 राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे नाथ सम्प्रदाय के महंथ अबैद्य नाथ ने योगी को न सिर्फ दीक्षा देकर गोरखनाथ मंदिर का उत्तराधिकारी बनाया बल्कि अपने ही नेतृत्व में देश की सबसे बड़ी पंचायत में वर्ष 1998 में सांसद बनवाने का काम किया। वर्ष 2007 के गोरखपुर में हुए दंगों में योगी का नाम भी आया और उन्हें मुलायम सरकार में गिरफ्तार भी किया गया।

कौन हैं योगी आदित्यनाथ जी -

योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश की गोरखपुर से सांसद है.. लोकसभा चुनाव में उन्होंने लगातार सातवें बार जीत दर्ज की... योगी आदित्यनाथ बीएससी पास हैं | 26साल की उम्र से ही सांसद हैं सातवें बार संसद पहुंचे हैं,लेकिन उनकी इस चमत्कारी जीत के पीछे उनका कट्टर हिंदुत्व का एजेंडा हैं ऐसा एजेंडा जिससे उनकी ताकत लगातार बढ़ती गई. इतनी कि आखिरकार गोरखपुर में जो योगी कहे वही नियम है, वही कानून है.तभी तो उनके समर्थक नारा भी लगाते हैं,'गोरखपुर में रहना है तो योगी-योगीकहना होगा. |

राजनीतिक पारी-

1998 में शुरू हुई राजनीतिक पारी योगी आदित्यनाथ का असली नाम है अजय सिंह. वह मूल रूप से उत्तराखंड के रहने वाले हैं. गढ़वाल यूनिवर्सिटी से उन्होंने बीएससी की पढ़ाई की. गोरखनाथ मंदिर के महंत अवैद्यनाथ ने उन्हें दीक्षा देकर योगी बनाया था अवैद्यनाथ ने 1998 में राजनीति से संन्यास लिया और योगी आदित्यनाथ को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. यहीं से योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक पारी  शुरू हुई है.1998 में गोरखपुर से12वीं लोकसभा का चुनाव जीतकर योगी आदित्यनाथ संसद पहुंचे तो वह सबसे कमउम्र के सांसद थे हिंदू युवा वाहिनी का गठन राजनीति के मैदान में आते ही योगी आदित्यनाथ ने सियासत की दूसरी डगर भी पकड़ ली उन्होंने हिंदू युवा वाहिनी का गठन किया और धर्म परिवर्तन के खिलाफ मुहिम छेड़ दी कट्टर हिंदुत्व की राह पर चलते हुए उन्होंने कई बार विवादित बयान दिए.

विवाद -

योगी विवादों में बने रहे, लेकिन उनकी ताकत लगातार बढ़ती गई. 2007 में गोरखपुर में दंगे हुए तो योगी आदित्यनाथ को मुख्य आरोपी बनाया गया.गिरफ्तारी हुई और इस पर कोहराम भी मचा.योगी के खिलाफ कई अपराधिक मुकदमे भी दर्ज हुए. अब तक योगी आदित्यनाथ की हैसियत ऐसी बन गई कि जहां वो खड़े होते, वहाँ सभा शुरू हो जाती.वो जो बोल देते, उनके समर्थकों के लिए वो कानून हो जाता. यही नहीं,होली और दीपावली जैसे त्योहार कब नाया जाए, इसके लिए भी योगी आदित्यनाथ  गोरखनाथ मंदिर से फरमान जारी करते हैं इसलिए गोरखपुर में हिन्दूओं के त्योहार एक दिन बाद मनाए जाते हैं.

दबंग छवि -

उर्दू बन गई हिंदी, मियां बदलकर मायायोगी आदित्यनाथ के तौर-तरीकों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने गोरखपुर के कई ऐतिहासिक मुहल्लों के नाम बदलवा दिए. इसके तहत उर्दू बाजार हिंदी बाजार बन गया.अलीनगर आर्यनगर हो गया. मियां बाजार माया बाजार हो गया. इतना ही नहीं, योगी आदित्यनाथ तो आजमगढ़ का नाम भी बदलवाना चाहते हैं.इसके पीछे आदित्यनाथ का तर्क है कि देश की पहचान हिंदी से है उर्दू से नहीं, आर्य से है अली से नहीं. गोरखपुर और आसपास के इलाके में योगी आदित्यनाथ और उनकी हिंदू युवा वाहिनी की तूती बोलती है. बीजेपी में भी उनकी जबरदस्त धाक है.इसका प्रमाण यह है कि पिछले लोकसभा चुनावों में प्रचार के लिए योगी आदित्यनाथ को बीजेपी ने हेलीकॉप्टर मुहैया करवाया था

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रविवार, 26 फ़रवरी 2017

प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक और उनकी खोजे -Ancient India's great scientist and his search -

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भारत ने दुनिया को बहुत कुछ दिया आजकल के बच्चे ये नही जानते | भारत की दी हुयी महान खोजे और अविष्कार ही है जिनकी वजह से आगे होने वाली खोजो के लिए रास्ता बना और उन महान ऋषि मुनियों ने ये खोजे ऐसे ही अपने किसी शिष्य के पूछने पर या किसी के सवाल के जबाब में कर दी , वो सचमुच ही जीनियस थे तो जानिए उन महान पुरषों के बारे जो प्राचीन भारत में हुए थे -

सुश्रुत ---


सुश्रुत प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक और उनकी खोजे -Ancient India's great scientist and his search -

इनका जन्म 800 ईपू में कशी में हुआ था | ये प्राचीन भारत के महान चिकत्सा शास्त्री कहलाये जाते है | इन्हें शल्य चिकत्सा का जनक भी कहा जाता है | दुनिया की पहली शल्य चिकत्सा इन्होने ही की थी जब एक व्यक्ति का पैर में बड़ा घाव होने पर उसकी जांघ से थोड़ी चमड़ी काटकर उसके पैर में लगाई थी |शल्य चिकत्सा के लिए सुश्रुत 125 तरह के उपकरणों का प्रयोग करते थे

आर्यभट्ट --
आर्यभट्ट प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक और उनकी खोजे -Ancient India's great scientist and his search -

इनका जन्म 476 ई. में कुसुमपुर ( पाटलिपुत्र ) पटना में हुआ था | ये महान खगोलशास्त्र और व गणितज्ञ थे | इन्होने ही सबसे पहले सूर्ये और चन्द्र ग्रहण की वियाख्या की थी | और सबसे पहले इन्होने ही बताया था की धरती अपनी ही धुरी पर धूमती है | और इसे सिद्ध भी किया था | और यही नही इन्होने हे सबसे पहले पाई के मान को निरुपित किया

वराहमिहिर--
वराहमिहिर प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक और उनकी खोजे -Ancient India's great scientist and his search -

इनका जन्म 499 ई . में कपित्थ (उज्जेन ) में हुआ था | ये महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्र थे | इन्होने पंचसिद्धान्तका नाम की किताब लिखी थी जिसमे इन्होने बताया था की , अयनांश , का मान 50.32 सेकेण्ड के बराबर होता होता है | और इन्होने शून्य और ऋणात्मक संख्याओ के बीजगणितीय गुणों को परिभाषित किया |

हलायुध --
हलायुध प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक और उनकी खोजे -Ancient India's great scientist and his search -

इनका जन्म 1000 ई . में काशी में हुआ था | ये ज्योतिषविद , और गणितज्ञ व महान वैज्ञानिक भी थे | इन्होने अभिधानरत्नमाला या मृतसंजीवनी नमक ग्रन्थ की रचना की | इसमें इन्होने या की पास्कल त्रिभुज ( मेरु प्रस्तार ) का स्पष्ट वर्णन किया है
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रविवार, 25 दिसंबर 2016

जानिए दुनिया के नये सात अजूबों के बारे में-Learn about the New Seven Wonders of the World

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आज हम आपके लिए लाये आधुनिक दुनिया के सात अजूबे जो पिछले 100 साल से जाने जाते है इनमे कुछ अजूबे ऐसे है जो पुराने सात अजूबो में अपना स्थान रखते है .ये साथ अजूबे पूरी दुनिया में कराए गये एक सर्वे के आधार पर चयनित किये गये है ,जिनको पूरी दुनिया के लोगो ने आश्चर्यजनक माना ,तो जानिए इन के बारे में -
1. मसीह उद्धारक-Christ the Redeemer
जानिए दुनिया के नये सात अजूबों के बारे में-Learn about the New Seven Wonders of the World

ब्राज़ीलके रियो डी जेनेरो में स्थापित ईसा मसीह की एक प्रतिमा है जिसे दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आर्ट डेको स्टैच्यू माना जाता है। यह प्रतिमा अपने 5 मीटर (31 फीट) आधार सहित 39.6 मीटर (130 फ़ुट) लंबी और 30 मीटर (98 फ़ुट) चौड़ी है। इसका वजन 635 टन (700 शॉर्ट टन) है और तिजुका फोरेस्ट नेशनल पार्क में कोर्कोवाडो पर्वत की चोटी पर स्थित है 700 मीटर (2,300 फ़ुट) जहाँ से पूरा शहर दिखाई पड़ता है। यह दुनिया में अपनी तरह की सबसे ऊँची मूर्तियों में से एक है (बोलीविया के कोचाबम्बा में स्थित क्राइस्टो डी ला कोनकोर्डिया की प्रतिमा इससे थोड़ी अधिक ऊँची है)। ईसाई धर्म के एक प्रतीक के रूप में यह प्रतिमा रियो और ब्राजील की एक पहचान बन गयी है। यह मजबूत कांक्रीट और सोपस्टोन से बनी है, इसका निर्माण 1922 और 1931 के बीच किया गया था।

2.ताजमहल - Tajmahal
जानिए दुनिया के नये सात अजूबों के बारे में-Learn about the New Seven Wonders of the World

भारत केआगरा शहर में स्थित एक विश्व धरोहर मक़बरा है। इसका निर्माण मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने, अपनी पत्नी मुमताज़ महल की याद में करवाया था। ताजमहल मुग़ल वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। इसकी वास्तु शैली फ़ारसी, तुर्क, भारतीय और इस्लामी वास्तुकला के घटकों का अनोखा सम्मिलन है। सन् 1983 में, ताजमहल युनेस्को विश्व धरोहर स्थल बना। इसके साथ ही इसे विश्व धरोहर के सर्वत्र प्रशंसा पाने वाली, अत्युत्तम मानवी कृतियों में से एक बताया गया। ताजमहल को भारत की इस्लामी कला का रत्न भी घोषित किया गया है।

3. चीन की महान दीवार The Great Wall of China
जानिए दुनिया के नये सात अजूबों के बारे में-Learn about the New Seven Wonders of the World

मिट्टी और पत्थर से बनी एक किलेनुमा दीवार है जिसे चीन के विभिन्न शासको के द्वारा उत्तरी हमलावरों से रक्षा के लिए पाँचवीं शताब्दीईसा पूर्व से लेकर सोलहवी शताब्दी तक बनवाया गया। इसकी विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की इस मानव निर्मित ढांचे को अन्तरिक्ष से भी देखा जा सकता है। यह दीवार 6,400 किलोमीटर (10,000 ली, चीनी लंबाई मापन इकाई) के क्षेत्र में फैली है। इसका विस्तार पूर्व में शानहाइगुआन से पश्चिम में लोप नुर तक है और कुल लंबाई लगभग 6700 कि.मी. (4160 मील) है। हालांकि पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के हाल के सर्वेक्षण के अनुसार समग्र महान दीवार, अपनी सभी शाखाओं सहित 8,851.8 किमी (5,500.3 मील) तक फैली है। अपने उत्कर्ष पर मिंग वंश की सुरक्षा हेतु दस लाख से अधिक लोग नियुक्त थे। यह अनुमानित है, कि इस महान दीवार निर्माण परियोजना में लगभग 20 से 30 लाख लोगों ने अपना जीवन लगा दिया था।

4 .Machu Picchu मछु पिच्चु
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 दक्षिण अमेरिकी देशपेरू मे स्थित एक कोलम्बस-पूर्व युग, इंका सभ्यता से संबंधित ऐतिहासिक स्थल है। यह समुद्र तल से 2430 मीटर की ऊँचाई पर उरुबाम्बा घाटी, जिसमे से उरुबाम्बा नदी बहती है, के ऊपर एक पहाड़ पर स्थित है। यह कुज़्को से 80 किलोमीटर (50 मील) उत्तर पश्चिम में स्थित है। इसे अक्सर "इंकाओं का खोया शहर" भी कहा जाता है। माचू पिच्चू इंका साम्राज्य के सबसे परिचित प्रतीकों में से एक है। 7 जुलाई 2007 को घोषित विश्व के सात नए आश्चर्यों मे माचू पिच्चू भी एक है।



5. पेट्रा-Petra
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जार्डन के मआन प्रान्त में स्थित एक ऐतिहासिक नगरी है जो अपने पत्थर से तराशी गई इमारतों और पानी वाहन प्रणाली के लिए प्रसिद्ध है। इसे छठी शताब्दी ईसापूर्व में नबातियों ने अपनी राजधानी के तौर पर स्थापित किया था। माना जाता है कि इसका निर्माण कार्य 1200 ईसापूर्व के आसपास शुरू हुआ। आधुनिक युग में यह एक मशहूर पर्यटक स्थल है। पेत्रा एक "होर" नामक पहाड़ की ढलान पर बना हुई है और पहाड़ों से घिरी हुई एक द्रोणी में स्थित है। यह पहाड़ मृत सागर से अक़ाबा की खाड़ी तक चलने वाली "वादी अरबा" (وادي عربة) नामक घाटी की पूर्वी सीमा हैं। पेत्रा को युनेस्को द्वारा एक विश्व धरोहर होने का दर्जा मिला हुआ है। बीबीसी ने अपनी "मरने से पहले 40 देखने योग्य स्थान" में पेत्रा को भी शामिल किया हुआ है।

6. चीचेन इट्ज़ा-Chichén Itzá
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चीचेन इट्ज़ा: कोलम्बस-पूर्व युग में माया सभ्यता द्वारा बनाया गया एक बड़ा शहर था। चीचेन इट्ज़ा, उत्तर शास्त्रीय से होते हुए अंतिम शास्त्रीय में और आरंभिक उत्तरशास्त्रीय काल के आरंभिक भाग में उत्तरी माया की तराई में एक प्रमुख केंद्र था। यह स्थल वास्तु शैलियों के विविध रूपों का प्रदर्शन करता है, जिसमें शामिल है "मेक्सीक्नाइज़ड" कही जाने वाली शैली और केंद्रीय मेक्सिको में देखी जाने वाली शैलियों की याद दिलाने वाले से लेकर उत्तरी तराई के पक माया के बीच पाई जाने वाली पक (पक) शैली। केंद्रीय मैक्सिकन शैलियों की उपस्थिति को एक समय प्रत्यक्ष प्रवास या केंद्रीय मेक्सिको के विजय का प्रतिनिधित्व करने के लिए जाना जाता था, लेकिन सबसे समकालीन व्याख्याएं इन गैर-माया शैलियों की उपस्थिति को सांस्कृतिक प्रसार के परिणामो के रूप में देखती हैं।

7. कालीज़ीयम-Colosseum
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इटली देश के रोम नगर के मध्य निर्मित रोमन साम्राज्य का सबसे विशाल एलिप्टिकल एंफ़ीथियेटर है। यह रोमन स्थापत्य और अभियांत्रिकी का सर्वोत्कृष्ट नमूना माना जाता है। इसका निर्माण तत्कालीन शासक वेस्पियन ने 70 वीं - 72 वीं ईस्वी के मध्य प्रारंभ किया और 80 वीं ईस्वी में इसको सम्राट टाइटस ने पूरा किया। 81 और 96 वर्षों के बीच इसमें डोमीशियन के राज में इसमें कुछ और परिवर्तन करवाए गए। इस भवन का नाम एम्फ़ीथियेटरम् फ्लेवियम, वेस्पियन और टाइटस के पारिवारिक नाम फ्लेवियस के कारण है।
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मंगलवार, 15 नवंबर 2016

नरेन्द्र मोदी का जीवन परिचय और राज -Biography of Narendra Modi and secret

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जेसा की विकिपीडिया में  लिखा है -नरेन्द्र मोदी रोचक  बाते नरेन्द्र मोदी का जीवन परिचय और राज -Biography of Narendra Modi and secret
नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का जन्म 17 September 1 9 50 को हुवा था |भारत के वर्तमान प्रधानमन्त्री हैं। भारत के राष्‍ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें May 26, 2014 को भारत के प्रधानमन्त्री पद की शपथ दिलायी।वे स्वतन्त्र भारत के 15वें प्रधानमन्त्री हैं तथा इस पद पर आसीन होने वाले स्वतंत्र भारत में जन्मे प्रथम व्यक्ति हैं।
नरेन्द्र मोदी का जीवन परिचय और राज -Biography of Narendra Modi and secret

वह पूर्णत: शाकाहारी हैं। भारत पाकिस्तान के बीच द्वितीय युद्ध के दौरान अपने तरुणकाल में उन्होंने स्वेच्छा से रेलवे स्टेशनों पर सफ़र कर रहे सैनिकों की सेवा की। युवावस्था में वह छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में शामिल हुए | उन्होंने साथ ही साथ भ्रष्टाचार विरोधी नव निर्माण आन्दोलन में हिस्सा लिया। एक पूर्णकालिक आयोजक के रूप में कार्य करने के पश्चात् उन्हें भारतीय जनता पार्टी में संगठन का प्रतिनिधि मनोनीत किया गया। किशोरावस्था में अपने भाई के साथ एक चाय की दुकान चला चुके मोदी ने अपनी स्कूली शिक्षा वड़नगर में पूरी की। उन्होंने आरएसएस के प्रचारक रहते हुए 1980 में गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर परीक्षा दी और एम॰एससी॰ की डिग्री प्राप्त की।

अपने माता-पिता की कुल छ: सन्तानों में तीसरे पुत्र नरेन्द्र ने बचपन में रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने में अपने पिता का भी हाथ बँटाया। बड़नगर के ही एक स्कूल मास्टर के अनुसार नरेन्द्र हालाँकि एक औसत दर्ज़े का छात्र था, लेकिन वाद-विवाद और नाटक प्रतियोगिताओं में उसकी बेहद रुचि थी। इसके अलावा उसकी रुचि राजनीतिक विषयों पर नयी-नयी परियोजनाएँ प्रारम्भ करने की भी थी।

13 वर्ष की आयु में नरेन्द्र की सगाई जसोदा बेन चमनलाल के साथ कर दी गयी और जब उनका विवाह हुआ, वह मात्र 17 वर्ष के थे। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार पति-पत्नी ने कुछ वर्ष साथ रहकर बिताये।परन्तु कुछ समय बाद वे दोनों एक दूसरे के लिये अजनबी हो गये क्योंकि नरेन्द्र मोदी ने उनसे कुछ ऐसी ही इच्छा व्यक्त की थी।
नरेन्द्र जब विश्वविद्यालय के छात्र थे तभी से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में नियमित जाने लगे थे। इस प्रकार उनका जीवन संघ के एक निष्ठावान प्रचारक के रूप में प्रारम्भ हुआ[16][24] उन्होंने शुरुआती जीवन से ही राजनीतिक सक्रियता दिखलायी और भारतीय जनता पार्टी का जनाधार मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभायी। गुजरात में शंकरसिंह वाघेला का जनाधार मजबूत बनाने में नरेन्द्र मोदी की ही रणनीति थी।

अप्रैल 1990 में जब केन्द्र में मिली जुली सरकारों का दौर शुरू हुआ, मोदी की मेहनत रंग लायी, जब गुजरात में 1 99 5 के विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अपने बलबूते दो तिहाई बहुमत प्राप्त कर सरकार बना ली। इसी दौरान दो राष्ट्रीय घटनायें और इस देश में घटीं। पहली घटना थी सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक की रथयात्रा जिसमें आडवाणी के प्रमुख सारथी की मूमिका में नरेन्द्र का मुख्य सहयोग रहा। इसी प्रकार कन्याकुमारी से लेकर सुदूर उत्तर में स्थित काश्मीर तक की मुरली मनोहर जोशी की दूसरी रथ यात्रा भी नरेन्द्र मोदी की ही देखरेख में आयोजित हुई। इसके बाद शंकरसिंह वाघेला ने पार्टी से त्यागपत्र दे दिया, जिसके परिणामस्वरूप केशुभाई पटेल को गुजरात का मुख्यमन्त्री बना दिया गया और नरेन्द्र मोदी को दिल्ली बुला कर भाजपा में संगठन की दृष्टि से केन्द्रीय मन्त्री का दायित्व सौंपा गया।

गोआ में भाजपा कार्यसमिति द्वारा नरेन्द्र मोदी को 2014 के लोक सभा चुनाव अभियान की कमान सौंपी गयी थी।13 सितम्बर 2013 को हुई संसदीय बोर्ड की बैठक में आगामी लोकसभा चुनावों के लिये प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। इस अवसर पर पार्टी के शीर्षस्थ नेता लालकृष्ण आडवाणी मौजूद नहीं रहे और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इसकी घोषणा की। मोदी ने प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद चुनाव अभियान की कमान राजनाथ सिंह को सौंप दी। प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने के बाद मोदी की पहली रैली हरियाणा प्रान्त के रिवाड़ी शहर में हुई।
ये भी देखे -नरेंद्र मोदी की वो गुप्त बाते जो कोई नही जनता Narendra Modi not people who talk that secret
               -प्रधानमंत्री मोदी से बात करे इस उपाय से-This measuretalking with pm Modi-
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