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रोहिंग्या मुसलमानों का मामला जून में नृशंस जनसंहार और लूटपाट की एक कार्यवाही के बाद दुनिया के ध्यान का केन्द्र बना किन्तू यह कोई अस्थाई विषय नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से विश्व के सबसे अत्याचारग्रस्त अल्पसंख्यक बताए जाने वाले रोहिग्या मुसलमानों के अतिरिक्त शायद दुनिया का कोई भी अल्पसंख्यक इस विषम स्थिति का शिकार नहीं हुआ।
जिस देश में वह शताब्दियों से आबाद हैं वह उन्हें अपना नागरिक स्वीकार करने और मूलभूत अधिकार देने को तैयार नहीं है बल्कि व्यवहारिक रूप से जातीय सफाए के प्रयास में है। म्यांमार के राष्ट्रपति थीन सेन का आदेश कि हम अपनी ही जाति के लोगों की ज़िम्मेदारी ले सकते हैं किन्तु अपने देश में ग़ैर क़ानूनी रूप से प्रविष्ट होने वाले रोहिग्या मुसलमानों की ज़िम्मेदारी स्वीकार करना हमारे लिए असंभव है जो हमारी जाती से संबंध नहीं रखते। यह बयान उन्होंने कुछ दिन पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार आयुक्त नवी पिल्ली के उस बयान के उत्तर में दिया जो उन्होंने रख़ाइन में बहुसंख्यक आबादी के हाथों जनसंहार और लूटपाट का निशाना बनने वाले रोहिग्या मुसलमानों की स्थिति की समीक्षा लेने के बाद किया था।
संयुक्त राष्ट्र संघ में मानवाधिकार आयुक्त की आशंकाओं के उत्तर में राष्ट्रपति थीन सेन ने आठ लाख मुसलमानों के विषय का “समाधान” यह पेश किया कि यदि कोई तीसरा देश उन्हें स्वीकार करे तो मैं उन्हें वहां भेज दूंगा, यह है वह चीज़ जो हमारी नज़र में विषय का समाधान है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या लाखों रोहिग्या मुसलमान राष्ट्रपति थीन सेन के क्षेत्र में रातों रात प्रविष्ट हो गये हैं जिन्हें देश से निकाल बाहर करना ही उनके अनुसार विषय का एकमात्र समाधान है या इन लोगों का कोई इतिहास या अतीत थी है? उनका अतीत क्या है और उनके पूर्वज कौन थे और अराकान में यह लोग कब से आबाद हैं।
इन प्रश्नों का प्रमाणित उत्तर करना, विषय को समझने के लिए अतिआवश्यक है। रोहिग्या शब्द कहां से निकला? इस बारे में रोहिग्या इतिहासकारों में मतभेद पाये जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह शब्द अरबी के शब्द रहमा अर्थात दया से लिया गया है और आठवीं शताब्दी ईसवी में जो अरब मुसलमान इस क्षेत्र में आये थे, उन्हें यह नाम दिया गया था जो बाद में स्थानीय प्रभाव के कारण रोहिग्या बन गया किन्तु दूसरे इतिहासकारों का मानना है कि इसका स्रोत अफ़ग़ानिस्तान का रूहा स्थान है और उनका कहना है कि अरब मुसलमानों की पीढ़ीयां अराकान के तटवर्ती क्षेत्र में आबाद हैं जबकि रोहिग्या अफ़ग़ानिस्तान के रूहा क्षेत्र से आने वाली मुसलमान जाती है। इसके मुक़ाबले में बर्मी इतिहासकारों का दावा है कि रोहिग्या शब्द बीसवीं शताब्दी के मध्य अर्थात 1950 के दशक से पहले कभी प्रयोग नहीं हुआ और इसका उद्देश्य वह बंगाली मुसलमान हैं जो अपना घर बार छोड़कर अराकान में आबाद हुए।
राष्ट्रपति थीन सेन और उनके समर्थक इस दावे को आधार बनाकर रोहिग्या मुसलमानों को नागरिक अधिकार देने से इन्कार कर रहे हैं किन्तु यह दावा सही नहीं है रोहिग्या शब्द का प्रयोग अट्ठारहवीं शताब्दी में प्रयोग होने का ठोस प्रमाण मौजूद है। बर्मा में अरब मुसलमानों के प्रविष्ट होने और रहने पर सभी एकमत हैं। उनकी बस्तियां अराकीन के मध्यवर्ती क्षेत्रों में हैं जबकि रोहिग्या मुसलमानों की अधिकांश आबादी बांग्लादेश के चटगांव डिविजन से मिली अराकान के सीमावर्ती क्षेत्र मायो में आबाद है। अराकान में बंगाली मुसलमानों के बसने के प्रथम प्रमाण पंद्रहवीं ईसवी शताब्दी के चौथे दशक से मिलते हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा पर जापान के क़ब्ज़े के बाद आराकान में बौद्धमत के अनुयाई रख़ाइन और रोहिंग्या मुसलमानों के मध्य रक्तरंजित झड़पें हुईं। रख़ाइन की जनता जापानियों की सहायता कर रही थी और रोहिंग्या अंग्रेज़ों के समर्थक थे इसीलिए जापान ने भी रोहिंग्या मुसलमानों पर जम कर अत्याचार किया। जनवरी वर्ष 1948 में बर्मा स्वतंत्र हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1948 में कुछ रोहिंग्या मुसलमानों ने अराकान को एक मुस्लिम देश बनाने के लिए सशस्त्र संघर्ष आरंभ किया। वर्ष 1962 में जनरल नी विंग की सैन्य क्रांति तक यह आंदोलन बहुत सक्रिय था। जनरल नी विंग की सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध व्यापक स्तर पर सैन्य कार्यवाही की जिसके कारण कई लाख मुसलमानों ने वर्तमान बांग्लादेश में शरण ली।
उनमें से बहुत से लोगों ने बाद में कराची का रूख़ किया और उन लोगों ने पाकिस्तान की नागरिकता लेकर पाकिस्तान को अपना देश मान लिया। मलेशिया में भी पच्चीस से तीस हज़ार रोहिंग्या मुसलमान आबाद हैं। बर्मा के लोगों ने लंबे संघर्ष के बाद तानाशाह से मुक्ति प्राप्त कर ली है और देश में लोकतंत्र की बेल पड़ गयी है। वर्ष 2012 के चुनाव में लोकतंत्र की सबसे बड़ी समर्थक आन सांग सू की की पार्टी की सफलता के बावजूद रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिक के दरवाज़े बंद हैं और उन पर निरंतर अत्याचार जारी है जो लोकतंत्र के बारे में सू के बयानों से पूर्ण रूप से विरोधाभास रखता है। अब भी विश्व जनमत के मन में यह प्रश्न उठता है कि बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना के बाद क्या रोहिंग्या मुसलमानों का उनका अधिकार मिल पायेगा?
ये भीं देखे -
जिस देश में वह शताब्दियों से आबाद हैं वह उन्हें अपना नागरिक स्वीकार करने और मूलभूत अधिकार देने को तैयार नहीं है बल्कि व्यवहारिक रूप से जातीय सफाए के प्रयास में है। म्यांमार के राष्ट्रपति थीन सेन का आदेश कि हम अपनी ही जाति के लोगों की ज़िम्मेदारी ले सकते हैं किन्तु अपने देश में ग़ैर क़ानूनी रूप से प्रविष्ट होने वाले रोहिग्या मुसलमानों की ज़िम्मेदारी स्वीकार करना हमारे लिए असंभव है जो हमारी जाती से संबंध नहीं रखते। यह बयान उन्होंने कुछ दिन पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार आयुक्त नवी पिल्ली के उस बयान के उत्तर में दिया जो उन्होंने रख़ाइन में बहुसंख्यक आबादी के हाथों जनसंहार और लूटपाट का निशाना बनने वाले रोहिग्या मुसलमानों की स्थिति की समीक्षा लेने के बाद किया था।
संयुक्त राष्ट्र संघ में मानवाधिकार आयुक्त की आशंकाओं के उत्तर में राष्ट्रपति थीन सेन ने आठ लाख मुसलमानों के विषय का “समाधान” यह पेश किया कि यदि कोई तीसरा देश उन्हें स्वीकार करे तो मैं उन्हें वहां भेज दूंगा, यह है वह चीज़ जो हमारी नज़र में विषय का समाधान है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या लाखों रोहिग्या मुसलमान राष्ट्रपति थीन सेन के क्षेत्र में रातों रात प्रविष्ट हो गये हैं जिन्हें देश से निकाल बाहर करना ही उनके अनुसार विषय का एकमात्र समाधान है या इन लोगों का कोई इतिहास या अतीत थी है? उनका अतीत क्या है और उनके पूर्वज कौन थे और अराकान में यह लोग कब से आबाद हैं।
इन प्रश्नों का प्रमाणित उत्तर करना, विषय को समझने के लिए अतिआवश्यक है। रोहिग्या शब्द कहां से निकला? इस बारे में रोहिग्या इतिहासकारों में मतभेद पाये जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह शब्द अरबी के शब्द रहमा अर्थात दया से लिया गया है और आठवीं शताब्दी ईसवी में जो अरब मुसलमान इस क्षेत्र में आये थे, उन्हें यह नाम दिया गया था जो बाद में स्थानीय प्रभाव के कारण रोहिग्या बन गया किन्तु दूसरे इतिहासकारों का मानना है कि इसका स्रोत अफ़ग़ानिस्तान का रूहा स्थान है और उनका कहना है कि अरब मुसलमानों की पीढ़ीयां अराकान के तटवर्ती क्षेत्र में आबाद हैं जबकि रोहिग्या अफ़ग़ानिस्तान के रूहा क्षेत्र से आने वाली मुसलमान जाती है। इसके मुक़ाबले में बर्मी इतिहासकारों का दावा है कि रोहिग्या शब्द बीसवीं शताब्दी के मध्य अर्थात 1950 के दशक से पहले कभी प्रयोग नहीं हुआ और इसका उद्देश्य वह बंगाली मुसलमान हैं जो अपना घर बार छोड़कर अराकान में आबाद हुए।
राष्ट्रपति थीन सेन और उनके समर्थक इस दावे को आधार बनाकर रोहिग्या मुसलमानों को नागरिक अधिकार देने से इन्कार कर रहे हैं किन्तु यह दावा सही नहीं है रोहिग्या शब्द का प्रयोग अट्ठारहवीं शताब्दी में प्रयोग होने का ठोस प्रमाण मौजूद है। बर्मा में अरब मुसलमानों के प्रविष्ट होने और रहने पर सभी एकमत हैं। उनकी बस्तियां अराकीन के मध्यवर्ती क्षेत्रों में हैं जबकि रोहिग्या मुसलमानों की अधिकांश आबादी बांग्लादेश के चटगांव डिविजन से मिली अराकान के सीमावर्ती क्षेत्र मायो में आबाद है। अराकान में बंगाली मुसलमानों के बसने के प्रथम प्रमाण पंद्रहवीं ईसवी शताब्दी के चौथे दशक से मिलते हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा पर जापान के क़ब्ज़े के बाद आराकान में बौद्धमत के अनुयाई रख़ाइन और रोहिंग्या मुसलमानों के मध्य रक्तरंजित झड़पें हुईं। रख़ाइन की जनता जापानियों की सहायता कर रही थी और रोहिंग्या अंग्रेज़ों के समर्थक थे इसीलिए जापान ने भी रोहिंग्या मुसलमानों पर जम कर अत्याचार किया। जनवरी वर्ष 1948 में बर्मा स्वतंत्र हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1948 में कुछ रोहिंग्या मुसलमानों ने अराकान को एक मुस्लिम देश बनाने के लिए सशस्त्र संघर्ष आरंभ किया। वर्ष 1962 में जनरल नी विंग की सैन्य क्रांति तक यह आंदोलन बहुत सक्रिय था। जनरल नी विंग की सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध व्यापक स्तर पर सैन्य कार्यवाही की जिसके कारण कई लाख मुसलमानों ने वर्तमान बांग्लादेश में शरण ली।
उनमें से बहुत से लोगों ने बाद में कराची का रूख़ किया और उन लोगों ने पाकिस्तान की नागरिकता लेकर पाकिस्तान को अपना देश मान लिया। मलेशिया में भी पच्चीस से तीस हज़ार रोहिंग्या मुसलमान आबाद हैं। बर्मा के लोगों ने लंबे संघर्ष के बाद तानाशाह से मुक्ति प्राप्त कर ली है और देश में लोकतंत्र की बेल पड़ गयी है। वर्ष 2012 के चुनाव में लोकतंत्र की सबसे बड़ी समर्थक आन सांग सू की की पार्टी की सफलता के बावजूद रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिक के दरवाज़े बंद हैं और उन पर निरंतर अत्याचार जारी है जो लोकतंत्र के बारे में सू के बयानों से पूर्ण रूप से विरोधाभास रखता है। अब भी विश्व जनमत के मन में यह प्रश्न उठता है कि बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना के बाद क्या रोहिंग्या मुसलमानों का उनका अधिकार मिल पायेगा?
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