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शनिवार, 7 अप्रैल 2018

गायत्री मन्त्र की शक्ति जानकर हैरान हो जाओगे आप -You'll be shocked to learn the power of Gayatri Mantra

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गायत्री मन्त्र की शक्ति जानकर हैरान हो जाओगे आप -gaytri mantr ki shakti jankar hairan ho jaoge aap-You'll be shocked to learn the power of Gayatri Mantra-जीवन की हर मुश्किल समस्या का हल है इस गायत्री मन्त्र में गायत्री साधना से साधारण और विशिष्ठ श्रेणी के अनेक प्रयोजनों की सिद्धि होती है। जो कम संसार के किसी अन्य मन्त्र से नहीं हो सकता, वह निश्चित रूप से गायत्री मन्त्र द्वारा हो सकता है। 

-गायत्री मन्त्र की शक्ति जानकर हैरान हो जाओगे आप -You'll be shocked to learn the power of Gayatri Mantra

1.    बुद्धि तीव्र होती है, एकाग्रता का विकास होता है।
2.    सद्गुणों में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है। दोष दुर्गुणों में कमी आने लगती है। कुसंस्कार छटने लगता है।
3.    जीभ का चटोरापन, दुव्र्यसन, कामेन्द्रिय उत्तेजना आदि संयमित होने लगती है, ब्रह्मचर्य में मन लगता है।
4.    दिनचर्या में स्वच्छता, सुव्यवस्था और श्रम के प्रति रूचि जागने लगती है।
5.    विद्यार्थियों को पढ़ाई में मन लगता है।
6.    बुरी संगत, नशा, आलस्य, प्रमाद आदि छूटने लगते हैं।
7.    मन में उत्साह, प्रसन्नता एवं श्रेष्ठ कार्यों व विचारों के प्रति लगाव बढ़ाता जाता है।
8.    आपत्तियों का निवारण होता है।
संसारिक प्रयोजनों के लिए जैसे - रोग निवारण, बुद्धि वृद्धि, राजकीय सफलता, दरिद्रता का नाश, सुसन्तति की प्राप्ति, शत्रुता का संहार, भूतबाधा की शांति, दूसरों को प्रभावित करना, रक्षा कवच, बुरे मुहुर्त आदि के लिए विशेष अनुष्ठान किया जाना आवश्यक होता है।

अत: उन सभी मनुष्यों को गायत्री मन्त्र की जप साधना या लेखन साधना अवश्य करनी चाहिए जिन्हें संसारिक उपलब्धियों एवं आत्मिक उन्नति की अकांक्षा हो। (यहां महात्मा आनन्द की कहानी सुनाएं) यदि अभिष्ठ फल न भी मिले तो गायत्री साधना कभी निष्फल नहीं जाती। उससे दूसरे प्रकार के लाभ मिल जाते हैं। (यहां माधवाचार्य की कहानी सुनाएं।)

गायत्री साधना का स्त्री व पुरुष दोनों को समान अधिकार है। वैदिक काल में अनेक मंत्रदृष्टा ऋषिकाएं हुई हैं। गार्गी, मैत्रेयी, कात्यायनी, यमी, शची, अपाला, घेषा, विश्ववारा, इला, भारती देवी आदि गायत्री साधना व वेदाध्ययन के लिए प्रसिद्ध रही हैं। जो स्त्री गायत्री साधना करती है उनकी गृहस्थी सुन्दर सुव्यवस्थित, सन्ताने सुसंस्कृत होती है। पति, परिवार आदि उसके अनुकूल बन जाते हैं।

गायत्री मन्त्र के जप के ही समान मन्त्रलेखन साधना भी अतिफलदायी होती है। गायत्री मंत्र लेखन के समय हाथ, आँखें, मस्तिष्क एवं सभी चित्तवृत्तियाँ एकाग्र हो जाती हैं क्योंकि लिखने का कार्य एकाग्रता चाहता है। कहा गया है - ‘‘हवन से मन्त्र में प्राण आते हैं, जप से मन्त्र जागृत होता है, और लिखने से मन्क्ष् की शक्ति आत्मा में प्रकाशित होती है। श्रद्धापूर्वक यदि शुद्ध मन्त्र लेखन किया जाए तो उसका प्रभाव जप से दस गुना अधिक होता है’’

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मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

मरने के बाद रावण के शव का क्या हुआ था-What happened after the death of Ravana's body

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मरने के बाद रावण के शव का क्या हुआ था-What happened after the death of Ravana's body-  Ravan ke body shav ka kya huwa tha?

रामायण में भगवान श्रीराम और रावण के बीच हुए युद्ध का विस्तृत वर्णन है। युद्ध में श्रीराम ने रावण का वध कर दिया था और लंका का शासन विभीषण को सौंप दिया। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि रावण के शव का क्या हुआ? उसका अंतिम संस्कार कहां किया गया?

मरने के बाद रावण के शव का क्या हुआ था-What happened after the death of Ravana's body

ऐसे तमाम सवाल आज भी बरकरार हैं लेकिन श्रीलंका के अनेक लोगों का मानना है कि रावण का शव आज भी धरती पर मौजूद है। उसे ‘ममी’ बनाकर सुरक्षित रखा हुआ है जैसे मिस्र के पिरामिडों में प्राचीन काल के राजाओं के शव रखे जाते थे। श्रीलंका के पुरातत्व विभाग ने भी इस बात का जिक्र किया था।
यह ममी वहां के रागला जंगलों में रखी हुई बताई जाती है। माना जाता है कि जब रावण का वध कर दिया गया तो उसके सैनिकों ने उसे पुनर्जीवित करने के अनेक प्रयास किए, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली।
वे अपने प्रिय राजा का शव जलाना नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने शव को सुरक्षित रखने के लिए विभिन्न रसायनों का इस्तेमाल किया और उसे ममी के रूप में रख दिया।
माना जाता है कि रागला के जंगलों में रावण की ममी आज भी रखी हुई है। यह काफी घना जंगल है जहां अनेक हिंसक पशु रहते हैं। ममी के आसपास के इलाके में कई जहरीले सांप निवास करते हैं।
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि ममी के नीचे रावण का खजाना है। हालांकि कई लोग इस बात से सहमत नहीं हैं, क्योंकि कि इतने वर्षों तक किसी खजाने की जानकारी होने के बाद वहां उसका शेष रहना संभव नहीं लगता।
रावण बहुत ताकतवर और पराक्रमी था। माना जाता है कि रावण की ममी की लंबाई करीब 18 फीट है। इसके अलावा भी श्रीलंका में रावण से जुड़े अनेक प्रमाण बताए जाते हैं। श्रीलंका के लोग अपने पूर्वजों से ये बातें सुनते आए हैं।
हो सकता है कि इनमें कई बातें विज्ञान की कसौटी पर खरी न उतरें लेकिन वहां के लोगों की अपनी मान्यताएं हैं और मान्यताएं प्रायः किसी वैज्ञानिक कसौटी की परवाह नहीं करतीं।

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

ॐ उच्चारण का जादू और रहस्य जानकर हैरान हो जाओगे आप-You'll be shocked to learn the magic and mystery of pronunciation

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ॐ को ओम लिखने की मजबूरी है अन्यथा तो यह ॐ ही है। अब आप ही सोचे इसे कैसे उच्चारित करें? ओम का यह चिन्ह 'ॐ' अद्भुत है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है। ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना। ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं। यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है।

ॐ उच्चारण का जादू और रहस्य जानकर हैरान हो जाओगे आप-You'll be shocked to learn the magic and mystery of pronunciation ॐ उच्चारण का जादू और रहस्य जानकर हैरान हो जाओगे आप-You'll be shocked to learn the magic and mystery of pronunciation-ॐ का रहस्य-ॐ mp3-ॐ wikipedia-ॐ का अर्थ क्या है-ॐ meaning-ओम का उच्चारण-ओम का ध्यान-ओम का नियम-ॐ उच्चारण का जादू  और रहस्य जानकर हेरान हो जाओगे आप You'll be surprised to learn the magic and mystery of pronunciation,ॐ को ओम लिखने की मजबूरी है अन्यथा तो यह ॐ ही है। अब आप ही सोचे इसे कैसे उच्चारित करें? ओम का यह चिन्ह 'ॐ' अद्भुत है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है। ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना। ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं। यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है।


ओंकार ध्वनि 'ॐ' को दुनिया के सभी मंत्रों का सार कहा गया है। यह उच्चारण के साथ ही शरीर पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ती है। भारतीय सभ्यता के प्रारंभ से ही ओंकार ध्वनि के महत्त्व से सभी परिचित रहे हैं। पांच अवयव- ‘अ’ से अकार, ‘उ’ से उकार एवं ‘म’ से मकार, ‘नाद’ और ‘बिंदु’ इन पांचों को मिलाकर ‘ओम’ एकाक्षरी मंत्र बनता है।
आइंसटाइन भी यही कह कर गए हैं कि ब्राह्मांड फैल रहा है। आइंसटाइन से पूर्व भगवान महावीर ने कहा था। महावीर से पूर्व वेदों में इसका उल्लेख मिलता है। महावीर ने वेदों को पढ़कर नहीं कहा, उन्होंने तो ध्यान की अतल गहराइयों में उतर कर देखा तब कहा।
ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त 'ओ' पर ज्यादा जोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। । इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है।
तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम।
साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी है। जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगता है। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है ॐ का उच्चारण करते रहना।
ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है।
तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि। इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं।
सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है।
प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं।
इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं। इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है।

प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है जिससे रक्त में 'टॉक्सिक' पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरह आल्हादकारी रसायन की वर्षा करती है

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धूप में है ऐसी शक्ति जो करदे जीवन को मंगलमय - The power to give a nice life The dhup

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teg-धूप में है ऐसी शक्ति जो करदे जीवन को मंगलमय - The power to give a nice life The dhup-धूप बत्ती-धूप के फायदे-धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो-धूप से बचाव-धूप में निकलो-धूप बत्ती बनाने की विधि-धूप में क्या चीज नही सूखती-धूप से एलर्जी-
हमारे हिन्दू धर्म में धूप देने व दीप जलाने का महत्व बहुत अधिक है धूप दीप करने से मन को शांति मिलती है घर से सारी नकारात्मक उर्जा समाप्त हो जाती है और सकारात्मक उर्जा का आगमन होता है जिससे घर में सुख शांति मिलती है धूप देने से आकस्मिक दुर्घटनाये नहीं होती है रोगों से मुक्ति मिलती है सभी दोष समाप्त हो जाते है जिस घर में धूप दी जाती हो वंहा गृहकलह नहीं होती- 

धूप में है ऐसी शक्ति जो करदे जीवन को मंगलमय - The power to give a nice life The dhup धूप में है ऐसी शक्ति जो करदे जीवन को मंगलमय - The power to give a nice life The dhup-धूप बत्ती-धूप के फायदे-धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो-धूप से बचाव-धूप में निकलो-धूप बत्ती बनाने की विधि-धूप में क्या चीज नही सूखती-धूप से एलर्जी-धूप में है ऐसी शक्ति जो करदे जीवन को मंगलमय - The power to give a nice life The dhup-हिन्दू धर्म में धूप देने व दीप जलाने का महत्व गूगल dhoop लोबान धूप गूगल की धूप गुग्गल धूप धूप के फायदे गूगल धूप कैसे बनाये गुगल धूप धूप बनाने की विधि

धूप के असर से वास्तु दोष का निवारण होता है ! ग्रह नक्षत्र से होने वाले अशुभ प्रभाव भी धूप देने से शुभ प्रभाव देना शुरू कर देते है ! सम्पूर्ण पितृपक्ष में धूप देने से पितृ तृप्त हो जाते है और मुक्ति को प्रदान होते है जिससे पित्र दोष समाप्त हो जाता है 
तो क्या है ये धूप आइये जानते, जिसे हम सब बहुत पीछे छोड़ आये है जी है ये वाही धूप जो कई वर्षो पहले मंदिरों आदि में प्रयोग की जाती थी लेकिन अब बिलकुल ही धूमिल होती जा रही है ! धूप में बड़ी शक्ति होती है ऐसी ही धूप की विधि हम आपको बता रहे है ताकि आप बाजार में आने वाली उन नकली धूप से बच सके-
सामग्री विधि
तंत्रसार के अनुसार अगर, तगर, कुष्ठ, शैलज, शर्करा, नागरमाथा, चंदन, इलाइची, तज, नखनखी, मुशीर, जटामांसी, कर्पूर, ताली, सदलन और गुग्गुल ये सोलह प्रकार के धूप माने गए हैं। इसे षोडशांग धूप कहते हैं। मदरत्न के अनुसार चंदन, कुष्ठ, नखल, राल, गुड़, शर्करा, नखगंध, जटामांसी, लघु और क्षौद्र सभी को समान मात्रा में मिलाकर जलाने से उत्तम धूप बनती है। इसे दशांग धूप कहते हैं-

सभी को सामान भाग में लेकर कूट कर मिक्स कर ले इस प्रकार एक अच्छी धूप तेयार हो जाएगी-

गाय के गोबर का कंडा जलाये और जब उसमे धुआं ना रहे तब उस अंगारे पर उपरोक्त धूप को इशायन कोण में जलाये! धूप देने पर उसके आस पास जल का अर्पण कर, अंगुली से अर्पण करने पर धूप देवताओ को लगती है और अंगूठे से अर्पण करने पर पितरों को प्राप्त होती है सुबह की धूप देवताओ को और शाम की धूप पितरों को प्राप्त होती है जब भी आप धूप दे स्वच्छ हो कर ही दे, धूप देते समय किसी भी संगीत को नहीं बजाना चाहिए और हो सके तो उस समय ज्यादा बोलना भी नहीं चाहिए - 

यह भी ध्यान रखे की धूप का धुआं घर के सभी कोनो में पहुच जाये -

महाभारत के गुप्त रहस्य -secret About Mahabharat

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 महाभारत के बारे में अनसुने बातें --Mahabharata about things unheard  secret About Mahabharatin hindi-
महाभारत हिंदू संस्कृति की एक अमूल्य धरोहर है। शास्त्रों में इसे पांचवा वेद भी कहा गया है। इसके रचयिता महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास हैं। महर्षि वेदव्यास ने इस ग्रंथ के बारे में स्वयं कहा है- यन्नेहास्ति न कुत्रचित्। अर्थात जिस विषय की चर्चा इस ग्रंथ में नहीं की गई है, उसकी चर्चा अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है। श्रीमद्भागवतगीता जैसा अमूल्य रत्न भी इसी महासागर की देन है। इस ग्रंथ में कुल मिलाकर एक लाख श्लोक है, इसलिए इसे शतसाहस्त्री संहिता भी कहा जाता है-

महाभारत के गुप्त रहस्य -secret About Mahabharat

महाभारत के गुप्त रहस्य -secret About Mahabharat


1- महाभारत ग्रंथ की रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी लेकिन इसका लेखन भगवान श्रीगणेश ने किया था। भगवान श्रीगणेश ने इस शर्त पर महाभारत का लेखन किया था कि महर्षि वेदव्यास बिना रुके ही लगातार इस ग्रंथ के श्लोक बोलते रहे। तब महर्षि वेदव्यास ने भी एक शर्त रखी कि मैं भले ही बिना सोचे-समझे बोलूं लेकिन आप किसी भी श्लोक को बिना समझे लिखे नहीं। बीच-बीच में महर्षि वेदव्यास ने कुछ ऐसे श्लोक बोले जिन्हें समझने में श्रीगणेश को थोड़ा समय लगा और इस दौरान महर्षि वेदव्यास अन्य श्लोकों की रचना कर लेते थे।

2- महाभारत ग्रंथ का वाचन सबसे पहले महर्षि वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन ने राजा जनमेजय की सभा में किया था। राजा जनमेजय अभिमन्यु के पौत्र तथा परीक्षित के पुत्र थे। इन्होंने ने ही अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए एसा किया था |

3- भीष्म पितामह के पिता का नाम शांतनु था, उनका पहला विवाह गंगा से हुआ था। पूर्वजन्म में शांतनु राजा महाभिष थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ करके स्वर्ग प्राप्त किया। एक दिन बहुत से देवता और राजर्षि, जिनमें महाभिष भी थे, ब्रह्माजी की सेवा में उपस्थित थे। उसी समय वहां देवी गंगा का आना हुआ। गंगा को देखकर राजा महाभिष मोहित हो गए और एकटक उन्हें देखने लगे। इससे क्रुद्ध होकर ब्रह्मा जी ने महाभिष को श्राप दे दिया।  जब महाभिष ने उनसे क्षमा याचना की तब ब्रह्माजी ने कहा- महाभिष तुम मृत्युलोक जाओ, जिस गंगा को तुम देख रहे हो, वह तुम्हारा अप्रिय करेगी और तुम जब उस पर क्रोध करोगे तब इस शाप से मुक्त हो जाओगे।

4- ब्रह्माजी के श्राप के कारण अगले जन्म में महाभिष, राजा प्रतीप के पुत्र शांतनु बने। इनका विवाह देवी गंगा से हुआ। विवाह से पहले गंगा ने शांतनु से यह प्रतिज्ञा करवाई थी कि वे कभी कोई प्रश्न नहीं पूछेंगे। शांतनु ने उनकी यह बात मान ली। राजा शांतनु और गंगा की आठ संतान हुई। पहली सातों संतानों को गंगा ने जन्म लेते ही नदी में प्रवाहित कर दिया। वचनबद्ध होने के कारण राजा शांतनु गंगा से कुछ नहीं पूछ पाए।

5- जब गंगा आंठवी संतान को नदी में प्रवाहित करने जा रही थी तब राजा शांतनु ने क्रोध में आकर उससे इसका कारण पूछा। तब देवी गंगा ने उन्हें पिछले जन्म की पूरी बात बताई और वह शांतनु की आठवी संतान को लेकर अन्यत्र चली गई।

6- धर्म ग्रंथों के अनुसार तैंतीस देवता प्रमुख माने गए हैं। इनमें अष्ट वसु भी हैं। ये ही अष्ट वसु शांतनु व गंगा के पुत्र के रूप में अवतरित हुए क्योंकि इन्हें वशिष्ठ ऋषि ने मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दिया था। गंगा ने अपने सात पुत्रों को जन्म लेते ही नदी में बहा कर उन्हें मनुष्य योनि से मुक्त कर दिया था। राजा शांतनु व गंगा का आठवां पुत्र भीष्म के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

7- राजा शांतनु का दूसरा विवाह निषाद कन्या सत्यवती से हुआ। शांतनु और सत्यवती के दो पुत्र हुए- चित्रांगद और वित्रिचवीर्य। चित्रांगद बहुत ही वीर और पराक्रमी था। एक युद्ध में उसी के नाम के गंर्धवराज चित्रांगद ने उसका वध कर दिया। चित्रांगद के बाद विचित्रवीर्य को राजा बनाया गया। इनका विवाह काशी की राजकुमारी अंबिका और अंबालिका से हुआ। लेकिन कुछ समय बाद ही वित्रिचवीर्य की मृत्यु हो गई।

8- महाभारत में विदुर यमराज के अवतार थे। यमराज को ऋषि माण्डव्य के श्राप के कारण मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ा। विदुर धर्म शास्त्र और अर्थशास्त्र में बड़े निपुण थे। उन्होंने जीवनभर कुरुवंश के हित के लिए कार्य किया।

9- यदुवंशी राजा शूरसेन की पृथा नामक कन्या व वसुदेव नामक पुत्र था। इस कन्या को राजा शूरसेन अपनी बुआ के संतानहीन लड़के कुंतीभोज को गोद दे दिया था। कुंतीभोज ने इस कन्या का नाम कुंती रखा। कुंती का विवाह राजा पाण्डु से हुआ था।

10- जब कुंती बाल्यावस्था में थी, उस समय उसने ऋषि दुर्वासा की सेवा की थी। सेवा से प्रसन्न होकर ऋषि दुर्वासा ने कुंती को एक मंत्र दिया जिससे वह किसी भी देवता का आह्वान कर उससे पुत्र प्राप्त कर सकती थी। विवाह से पूर्व इस मंत्र की शक्ति देखने के लिए एक दिन कुंती ने सूर्यदेव का आह्वान किया जिसके फलस्वरूप कर्ण का जन्म हुआ।

11- महाराज पाण्डु का दूसरा विवाह मद्रदेश की राजकुमारी माद्री से हुआ। एक बार राजा पाण्डु शिकार खेल रहे थे। उस समय किंदम नामक ऋषि अपनी पत्नी के साथ हिरन के रूप में सहवास कर रहे थे। उसी अवस्था में राजा पाण्डु ने उन पर बाण चला दिए। मरने से पहले ऋषि किंदम ने राजा पाण्डु को श्राप दिया कि जब भी वे अपनी पत्नी के साथ सहवास करेंगे तो उसी अवस्था में उनकी मृत्यु हो जाएगी।

12- ऋषि किंदम के श्राप से दु:खी होकर राजा पाण्डु ने राज-पाट का त्याग कर दिया और वनवासी हो गए। कुंती और माद्री भी अपने पति के साथ ही वन में रहने लगीं। जब पाण्डु को ऋषि दुर्वासा द्वारा कुंती को दिए गए मंत्र के बारे में पता चला तो उन्होंने कुंती से धर्मराज का आवाह्न करने के लिए कहा जिसके फलस्वरूप धर्मराज युधिष्ठिर का जन्म हुआ। इसी प्रकार वायुदेव के अंश से भीम और देवराज इंद्र के अंश से अर्जुन का जन्म हुआ। कुंती ने यह मंत्र माद्री को बताया। तब माद्री ने अश्विनकुमारों का आवाह्न किया, जिसके फलस्वरूप नकुल व सहदेव का जन्म हुआ।

13- धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी को महर्षि वेदव्यास ने सौ पुत्रों की माता होने का वरदान दिया था। समय आने पर गांधारी को गर्भ ठहरा लेकिन वह दो वर्ष तक पेट में रुका रहा। घबराकर गांधारी ने गर्भ गिरा दिया। उसके पेट से लोहे के गोले के समान एक मांस पिंड निकला। तब महर्षि वेदव्यास वहां पहुंचे और उन्होंने कहा कि तुम सौ कुण्ड बनवाकर उन्हें घी से भर दो और उनकी रक्षा के लिए प्रबंध करो। इसके बाद महर्षि वेदव्यास ने गांधारी को उस मांस पिण्ड पर ठंडा जल छिड़कने के लिए कहा। जल छिड़कते ही उस मांस पिण्ड के 101 टुकड़े हो गए।

14- महर्षि की आज्ञानुसार गांधारी ने उन सभी मांस पिंडों को घी से भरे कुंडों में रख दिया। फिर महर्षि ने कहा कि इन कुण्डों को दो साल के बाद खोलना। समय आने पर उन कुण्डों से पहले दुर्योधन का जन्म हुआ और उसके बाद अन्य गांधारी पुत्रों का। जिस दिन दुर्योधन का जन्म हुआ था उसी दिन भीम का भी जन्म हुआ था।

15- जन्म लेते ही दुर्योधन गधे की तरह रेंकने लगा। उसका शब्द सुनकर गधे, गीदड़, गिद्ध और कौए भी चिल्लाने लगे, आंधी चलने लगी, कई स्थानों पर आग लग गई। यह देखकर विदुर ने राजा धृतराष्ट्र से कहा कि आपका यह पुत्र निश्चित ही कुल का नाश करने वाला होगा अत: आप इस पुत्र का त्याग कर दीजिए लेकिन पुत्र स्नेह के कारण धृतराष्ट्र ऐसा नहीं कर पाए।

16- गांधारी का सबसे बड़ा पुत्र था - दुर्योधन। उसके बाद दु:शासन, दुस्सह, दुश्शल, जलसंध, सम, सह, विंद, अनुविंद, दुद्र्धर्ष, सुबाहु, दुष्प्रधर्षण, दुर्मुर्षण, दुर्मुख, दुष्कर्ण, कर्ण, विविंशति, विकर्ण, शल, सत्व,सुलोचन, चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, चारुचित्र, शरासन, दुर्मुद, दुर्विगाह, विवित्सु, विकटानन, ऊर्णनाभ, सुनाभ, नंद, उपनंद, चित्रबाण, चित्रवर्मा, सुवर्मा, दुर्विमोचन, आयोबाहु, महाबाहु,चित्रांग, चित्रकुंडल, भीमवेग, भीमबल, बलाकी, बलवद्र्धन, उग्रायुध, सुषेण, कुण्डधार, महोदर, चित्रायुध, निषंगी, पाशी, वृंदारक, दृढ़वर्मा, दृढ़क्षत्र, सोमकीर्ति, अनूदर, दृढ़संध, जरासंध,सत्यसंध, सद:सुवाक, उग्रश्रवा, उग्रसेन, सेनानी, दुष्पराजय, अपराजित, कुण्डशायी, विशालाक्ष, दुराधर, दृढ़हस्त, सुहस्त, बातवेग, सुवर्चा, आदित्यकेतु, बह्वाशी, नागदत्त, अग्रयायी, कवची, क्रथन,कुण्डी, उग्र, भीमरथ, वीरबाहु, अलोलुप, अभय, रौद्रकर्मा, दृढऱथाश्रय, अनाधृष्य, कुण्डभेदी, विरावी, प्रमथ, प्रमाथी, दीर्घरोमा, दीर्घबाहु, महाबाहु, व्यूढोरस्क, कनकध्वज, कुण्डाशी, और विरजा।

17- 100 पुत्रों के अलावा गांधारी की एक पुत्री भी थी जिसका नाम दुुश्शला था, इसका विवाह राजा जयद्रथ के साथ हुआ था।

18 - कौरवों के अतिरिक्त धृतराष्ट्र का एक पुत्र और था, उसका नाम युयुत्सु था। जिस समय गांधारी गर्भवती थी और धृतराष्ट्र की सेवा करने में असमर्थ थी। उन दिनों एक वैश्य कन्या ने धृतराष्ट्र की सेवा की, उसके गर्भ से उसी साल युयुस्तु नामक पुत्र हुआ था। वह बहुत ही यशस्वी और विचारशील था।

19 - एक बार दुर्योधन ने धोखे से भीम को विष खिलाकर गंगा नदी में फेंक दिया। बेहोशी की अवस्था में भीम बहते हुए नागलोक पहुंच गए। वहां विषैले नागों ने भीम को खूब डंसा, जिससे भीम के शरीर का जहर कम हो गया और वे होश में आ गए और नागों को पटक-पटक कर मारने लगे। यह सुनकर नागराज वासुकि स्वयं भीम के पास आए। उनके साथी आर्यक नाग में भीमसेन को पहचान लिया। आर्यक नाग भीमसेन के नाना का नाना था। आर्यक नाग ने प्रसन्न होकर भीम को हजारों हाथियों का बल प्रदान करने वाले कुंडों का रस पिलाया, जिससे भीमसेन और भी शक्तिशाली हो गए।

20 - पांडवों के कुलगुरु कृपाचार्य थे। इनके पिता का नाम शरद्वान था, वे महर्षि गौतम के पुत्र थे। महर्षि शरद्वान ने घोर तपस्या कर दिव्य अस्त्र प्राप्त किए और धनुर्वेद में निपुणता प्राप्त की। यह देखकर देवराज इंद्र भी घबरा गए और उन्होंने शरद्वान की तपस्या तोडऩे के लिए जानपदी नाम की अप्सरा भेजी। इस सुंदरी को देखकर महर्षि शरद्वान का वीर्यपात हो गया। उनका वीर्य सरकंड़ों पर गिरा वह दो भागों में बंट गया। उससे एक कन्या और एक बालक उत्पन्न हुआ। वही बालक कृपाचार्य बना और कन्या कृपी के नाम से प्रसिद्ध हुई।

21 - गुरु द्रोणाचार्य महर्षि भरद्वाज के पुत्र थे। एक बार वे सुबह गंगा स्नान करने गए, वहां उन्होंने घृताची नामक अप्सरा को जल से निकलते देखा। यह देखकर उनके मन में विकार आ गया और उनका वीर्य स्खलित होने लगा। यह देखकर उन्होंने अपने वीर्य को द्रोण नामक एक बर्तन में संग्रहित कर लिया। उसी में से द्रोणाचार्य का नाम हुआ।

22 - गुरु द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी से हुआ। कृपी के गर्भ से अश्वत्थामा का जन्म हुआ। उसने जन्म लेते ही अच्चै:श्रवा अश्व के समान शब्द किया, इसी कारण उसका नाम अश्वत्थामा हुआ। वह महादेव, यम, काल और क्रोध के सम्मिलित अंश से उत्पन्न हुआ था।

23 - जब द्रोणाचार्य शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तब उन्हें पता चला कि भगवान परशुराम ब्राह्मणों को अपना सर्वस्व दान कर रहे हैं। द्रोणाचार्य भी उनके पास गए और अपना परिचय दिया। द्रोणाचार्य ने भगवान परशुराम से उनके सभी दिव्य अस्त्र-शस्त्र मांग लिए और उनका प्रयोग, रहस्य व उपसंहार की विधि भी सीख ली।

24 - द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामा को अधिक प्रेम करते थे। उन्होंने शिष्यों को पानी लाने के लिए जो बर्तन दिए थे, उनमें औरों के तो देर से भरते लेकिन अश्वत्थामा का बर्तन सबसे पहले भर जाता, जिससे वह अपने पिता के पास पहले पहुंचकर गुप्त रहस्य सीख लेता। यह बात अर्जुन ने ताड़ ली। अब वह वारुणास्त्र से अपना बर्तन झटपट भरकर द्रोणाचार्य के पास पहुंच जाता। यही कारण था कि अर्जुन और अश्वत्थामा की शिक्षा एक समान हुई।

25 - पांडव जब युवा हुए थे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। यह देखकर दुर्योधन ने उन्हें मारने की योजना बनाई और वारणावत नामक स्थान पर अपने मंत्री पुरोचन से एक महल बनवाया। वह महल सन, राल व लकड़ी से बना था जिससे की वह पलभर में जलकर राख हो जाए। दुर्योधन ने किसी तरह पांडवों को वहां जाने के लिए राजी कर लिया।

26 - जब पाण्डव वारणावत जाने लगे तो विदुरजी ने युधिष्ठिर को सांकेतिक भाषा में उस महल का रहस्य युधिष्ठिर को बता दिया और उससे बचने के उपाय भी दिए। विदुरजी की सारी बात युधिष्ठिर ने अच्छी तरह से समझ ली। तब विदुरजी हस्तिनापुर लौट गए। यह घटना फाल्गुन शुक्ल अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र की है।

27 - पांडव एक साल तक वारणावत नगर में रहे। एक दिन कुंती ने ब्राह्ण भोज कराया। जब सब लोग खा-पीकर चले गए तो वहां एक भील स्त्री अपने पांच पुत्रों के साथ भोजन मांगने आई और वे सब उस रात वहीं सो गए। उसी रात भीम ने स्वयं महल में आग लगा दी और गुप्त रास्ते से बाहर निकल गए। लोगों ने जब सुबह भील स्त्री और अन्य पांच शव देखे तो उन्हें लगा कि पांडव कुंती सहित जल कर मर गए हैं।
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गुरुवार, 4 जनवरी 2018

महिला नागा साधू की रहस्यमय दुनिया ।Naga sadhus mysterious woman in the world.

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महिला या औरत जो नागा साधू बनती है ये कोन होती है ये क्या होती है कैसे बनती है -ये जानकारी हम आपको देने जा रहे है -नागा साधू कैसे होते है आप जानते है लेकिन औरत या स्त्री भी नागा साधू बनती है ये आप नही जानते होंगे -महिला नागा साधू की रहस्यमय दुनिया ।Naga sadhus mysterious woman in the world.in hindi -कुम्भ कुंभ के मेले में बहुत राज रहस्य होते है -इसका कारण भी जाने 
महिला नागा साधू रहस्यमय दुनिया ।Naga sadhus mysterious woman in the world.महिला नागा साधू रहस्यमय दुनिया ।Naga sadhus mysterious woman in the world. महिला नागा सन्यासिन बनाने से पहले अखाड़े के साधु-संत महिला के घर परिवार और पिछले जीवन की जांच-पड़ताल करते है।  4. महिला को भी नागा सन्यासिन बनने से पहले खुद का पिंडदान और तर्पण करना पड़ता है।  5. नागा साधुओं के अखाड़ों में महिला संन्यासियों को एक अलग पहचान और खास महत्व दिया जाता है। ये महिला साधु पुरुष नागाओं की तरह नग्न रहने के बजाए अपने तन पर एक गेरूआ वस्त्र लपेटे रहती हैं। बिना वस्त्रों के शाही स्नान में नहाना प्रतिबंधित होता है, इसलिए यह गेरूआ वस्त्र धारण कर ही स्नान करती हैं। जिस अखाड़े से महिला सन्यास की दीक्षा लेना चाहती है नागा साधु फोटो गैलरी नागा साध्वी महिला साधु नागा साधुओं का रहस्य नागा साधु बनने की प्रक्रिया महिला नागा साधु फोटो नागा बाबा का इतिहास नागा बाबा का वीडियो

         
      1. सन्यासिन बनने से पहले महिला को 6 से 12 साल तक कठिन बृह्मचर्य का पालन करना होता है। इसके बाद गुरु यदि इस बात से संतुष्ट हो जाते है कि महिला बृह्मचर्य का पालन कर सकती है तो उसे दीक्षा देते है।


2 – प्रयाग महाकुंभ में शुरू हुई परंपरा इलाहाबाद(प्रयाग) में संपन्न हुए 2013 महाकुंभ के दौरान महिला नागा सन्यासियों के स्नान और अखाड़े बनाने के लिए अलग से जगह दी गई थी। उस दौरान इसका विरोध भी हुआ था। महाकुंभ में ही पहली बार पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े ने साध्वी वेदगिरी को महामंडलेश्वर की उपाधि दी थी।

3. महिला नागा सन्यासिन बनाने से पहले अखाड़े के साधु-संत महिला के घर परिवार और पिछले जीवन की जांच-पड़ताल करते है।

4. महिला को भी नागा सन्यासिन बनने से पहले खुद का पिंडदान और तर्पण करना पड़ता है।

5. नागा साधुओं के अखाड़ों में महिला संन्यासियों को एक अलग पहचान और खास महत्व दिया जाता है। ये महिला साधु पुरुष नागाओं की तरह नग्न रहने के बजाए अपने तन पर एक गेरूआ वस्त्र लपेटे रहती हैं। बिना वस्त्रों के शाही स्नान में नहाना प्रतिबंधित होता है, इसलिए यह गेरूआ वस्त्र धारण कर ही स्नान करती हैं।

6. जिस अखाड़े से महिला सन्यास की दीक्षा लेना चाहती है, उसके आचार्य महामंडलेष्वर ही उसे दीक्षा देते है।
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सोमवार, 1 जनवरी 2018

जाने इस्लाम (मुस्लिम) धर्म के बारे में -।know about islam(muslim)

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क्या है इस्लाम का इतिहास-
आमतौर पर यह समझा जाता है कि इस्लाम 1400 वर्ष पुराना धर्म है, और इसके ‘प्रवर्तक’ पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) हैं। लेकिन वास्तव में इस्लाम 1400 वर्षों से काफ़ी पुराना धर्म है; उतना ही पुराना जितना धर्ती पर स्वयं मानवजाति का इतिहास और हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) इसके प्रवर्तक (Founder) नहीं, बल्कि इसके आह्वाहक हैं। आपका काम उसी चिरकालीन (सनातन) धर्म की ओर, जो सत्यधर्म के रूप में आदिकाल से ‘एक’ ही रहा है, लोगों को बुलाने, आमंत्रित करने और स्वीकार करने के आह्वान का था। आपका मिशन, इसी मौलिक मानव धर्म को इसकी पूर्णता के साथ स्थापित कर देना था ताकि मानवता के समक्ष इसका व्यावहारिक रूप साक्षात् रूप में आ जाए।

जाने इस्लाम (मुस्लिम) धर्म के बारे में -।know about islam(muslim) जाने इस्लाम (मुस्लिम) धर्म के बारे में -।know about islam(muslim)-हिन्दू धर्म की स्थापना इस्लाम की सच्चाई इस्लाम का उदय इस्लाम में नारी इस्लाम का अंत कब होगा इस्लाम की असलियत इस्लाम का सच इस्लाम का पूरा सच  इस्लाम का अंत-इस्लाम का सच-इस्लाम का इतिहास-इस्लामिक स्टेट-ईसाई धर्म-हिन्दू-कुरान-isis-मुस्लिम-औरतो का खतना-मुस्लिम लडकियाँ-मुस्लिम धर्म-मुस्लिम इतिहास-मुस्लिम नाम-मुस्लिम लीग-हिन्दू-पाकिस्तान-जाने इस्लाम (मुस्लिम) धर्म के बारे में ।know about islam(muslim) इस्लाम का उदय इस्लाम की सच्चाई इस्लाम में नारी हिन्दू धर्म की स्थापना इस्लाम का सच इस्लाम का अंत कब होगा इस्लाम का पूरा सच इस्लाम धर्म का सच इस्लाम धर्म के संस्थापक  इस्लाम का अंत  इस्लाम धर्म का सच  इस्लाम की सच्चाई  इस्लाम की असलियत  इस्लाम क्या है  इस्लाम में नारी  मुहम्मद साहब का इतिहास
इस्लाम का इतिहास जानने का अस्ल माध्यम स्वयं इस्लाम का मूल ग्रंथ ‘क़ुरआन’ है। और क़ुरआन, इस्लाम का आरंभ प्रथम  मनुष्य ‘आदम’ से होने का ज़िक्र करता है। इस्लाम धर्म के अनुयायियों के लिए क़ुरआन ने ‘मुस्लिम’ शब्द का प्रयोग हज़रत इबराहीम (अलैहि॰) के लिए किया है जो लगभग 4000 वर्ष पूर्व एक महान पैग़म्बर (सन्देष्टा) हुए थे। हज़रत आदम (अलैहि॰) से शुरू होकर हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) तक हज़ारों वर्षों पर फैले हुए इस्लामी इतिहास में असंख्य ईशसंदेष्टा ईश्वर के संदेश के साथ, ईश्वर द्वारा विभिन्न युगों और विभिन्न क़ौमों में नियुक्त किए जाते रहे। उनमें से 26 के नाम कु़रआन में आए हैं और बाक़ी के नामों का वर्णन नहीं किया गया है। इस अतिदीर्घ श्रृंखला में हर ईशसंदेष्टा ने जिस सत्यधर्म का आह्वान दिया वह ‘इस्लाम’ ही था; भले ही उसके नाम विभिन्न भाषाओं में विभिन्न रहे हों। बोलियों और भाषाओं के विकास का इतिहास चूंकि क़ुरआन ने बयान नहीं किया है इसलिए ‘इस्लाम’ के नाम विभिन्न युगों में क्या-क्या थे, यह ज्ञात नहीं है।

इस्लामी इतिहास के आदिकालीन होने की वास्तविकता समझने के लिए स्वयं ‘इस्लाम’ को समझ लेना आवश्यक है। 

इस्लाम क्या है, यह कुछ शैलियों में क़ुरआन के माध्यम से हमारे सामने आता है, जैसे:-

1. इस्लाम, अवधारणा के स्तर पर ‘विशुद्ध एकेश्वरवाद’ का नाम है। यहां ‘विशुद्ध’ से अभिप्राय है: ईश्वर के व्यक्तित्व, उसकी सत्ता व प्रभुत्व, उसके अधिकारों (जैसे उपास्य व पूज्य होने के अधिकार आदि) में किसी अन्य का साझी न होना। विश्व का...बल्कि पूरे ब्रह्माण्ड और अपार सृष्टि का यह महत्वपूर्ण व महानतम सत्य मानवजाति की उत्पत्ति से लेकर उसके हज़ारों वर्षों के इतिहास के दौरान अपरिवर्तनीय, स्थायी और शाश्वत रहा है।

2. इस्लाम शब्द का अर्थ ‘शान्ति व सुरक्षा’ और ‘समर्पण’ है। इस प्रकार इस्लामी परिभाषा में इस्लाम नाम है, ईश्वर के समक्ष, मनुष्यों का पूर्ण आत्मसमर्पण; और इस आत्मसमर्पण के द्वारा व्यक्ति, समाज तथा मानवजाति के द्वारा ‘शान्ति व सुरक्षा’ की उपलब्धि का। यह अवस्था आरंभ काल से तथा मानवता के इतिहास हज़ारों वर्ष लंबे सफ़र तक, हमेशा मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता रही है।

3- इस्लाम की वास्तविकता, एकेश्वरवाद की हक़ीक़त, इन्सानों से एकेश्वरवाद के तक़ाज़े, मनुष्य और ईश्वर  के बीच अपेक्षित संबंध, इस जीवन के पश्चात (मरणोपरांत) जीवन की वास्तविकता आदि जानना एक शान्तिमय, सफल तथा समस्याओं, विडम्बनाओं व त्रासदियों से रहित जीवन बिताने के लिए हर युग में अनिवार्य रहा है; अतः ईश्वर ने हर युग में अपने सन्देष्टा (ईशदूत, नबी, रसूल, पैग़म्बर) नियुक्त करने (और उनमें से कुछ पर अपना ‘ईशग्रंथ’ अवतरित करने) का प्रावधान किया है। इस प्रक्रम का इतिहास, मानवजाति के पूरे इतिहास पर फैला हुआ है।

4. शब्द ‘धर्म’ (Religion) को, इस्लाम के लिए क़ुरआन ने शब्द ‘दीन’ से अभिव्यक्त किया है। क़ुरआन में कुछ ईशसन्देष्टाओं के हवाले से कहा गया है (42:13) कि ईश्वर ने उन्हें आदेश दिया कि वे ‘दीन’ को स्थापित (क़ायम) करें और इसमें भेद पैदा न करें, इसे (अनेकानेक धर्मों के रूप में) टुकड़े-टुकड़े न करें।

इससे सिद्ध हुआ कि इस्लाम ‘दीन’ हमेशा से ही रहा है। उपरोक्त संदेष्टाओं में हज़रत नूह (Noah) का उल्लेख भी हुआ है और हज़रत नूह (अलैहि॰) मानवजाति के इतिहास के आरंभिक काल के ईशसन्देष्टा हैं। क़ुरआन की उपरोक्त आयत (42:13) से यह तथ्य सामने आता है कि अस्ल ‘दीन’ (इस्लाम) में भेद, अन्तर, विभाजन, फ़र्क़ आदि करना सत्य-विरोधी है-जैसा कि बाद के ज़मानों में ईशसन्देष्टाओं का आह्वान व शिक्षाएं भुलाकर, या उनमें फेरबदल, कमी-बेशी, परिवर्तन-संशोधन करके इन्सानों ने अनेक विचारधाराओं व मान्यताओं के अन्तर्गत ‘बहुत से धर्म’ बना लिए।

मानव प्रकृति प्रथम दिवस से आज तक एक ही रही है। उसकी मूल प्रवृत्तियों में तथा उसकी मौलिक आध्यात्मिक, नैतिक, भौतिक आवश्यकताओं में कोई भी परिवर्तन नहीं आया है। अतः मानव का मूल धर्म भी मानवजाति के पूरे इतिहास में उसकी प्रकृति व प्रवृत्ति के ठीक अनुकूल ही होना चाहिए। इस्लाम इस कसौटी पर पूरा और खरा उतरता है। इसकी मूल धारणाएं, शिक्षाएं, आदेश, नियम...सबके सब मनुष्य की प्रवृत्ति व प्रकृति के अनुकूल हैं।

अतः यही मानवजाति का आदिकालीन तथा शाश्वत धर्म है।

क़ुरआन ने कहीं भी हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) को ‘इस्लाम धर्म का प्रवर्तक’ नहीं कहा है। क़ुरआन में हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) का परिचय नबी (ईश्वरीय ज्ञान की ख़बर देने वाला), रसूल (मानवजाति की ओर भेजा गया), रहमतुल्-लिल-आलमीन (सारे संसारों के लिए रहमत व साक्षात् अनुकंपा, दया), हादी (सत्यपथ-प्रदर्शक) आदि शब्दों से कराया है।

स्वयं पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने इस्लाम धर्म के ‘प्रवर्तक’ होने का न दावा किया, न इस रूप में अपना परिचय कराया। आप (सल्ल॰) के एक कथन के अनुसार ‘इस्लाम के भव्य भवन में एक ईंट की कमी रह गई थी, मेरे (ईशदूतत्व) द्वारा वह कमी पूरी हो गई और इस्लाम अपने अन्तिम रूप में सम्पूर्ण हो गया’ (आपके कथन का भावार्थ।) इससे सिद्ध हुआ कि आप (सल्ल॰) इस्लाम धर्म के प्रवर्तक नहीं हैं। (इसका प्रवर्तक स्वयं अल्लाह है, न कि कोई भी पैग़म्बर, रसूल, नबी आदि)। और आप (सल्ल॰) ने उसी इस्लाम का आह्वान किया जिसका, इतिहास के हर चरण में दूसरे रसूलों ने किया था। इस प्रकार इस्लाम का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना मानवजाति और उसके बीच नियुक्त होने वाले असंख्य रसूलों के सिलसिले (श्रृंखला) का इतिहास।

यह ग़लतफ़हमी फैलने और फैलाने में, कि इस्लाम धर्म की उम्र कुल 1400 वर्ष है दो-ढाई सौ वर्ष पहले लगभग पूरी दुनिया पर छा जाने वाले यूरोपीय (विशेषतः ब्रिटिश) साम्राज्य की बड़ी भूमिका है। ये साम्राज्यी, जिस ईश-सन्देष्टा (पैग़म्बर) को मानते थे ख़ुद उसे ही अपने धर्म का प्रवर्तक बना दिया और उस पैग़म्बर के अस्ल ईश्वरीय धर्म को बिगाड़ कर, एक नया धर्म उसी पैग़म्बर के नाम पर बना दिया। (ऐसा इसलिए किया कि पैग़म्बर के आह्वाहित अस्ल ईश्वरीय धर्म के नियमों, आदेशों, नैतिक शिक्षाओं और हलाल-हराम के क़ानूनों की पकड़ (Grip) से स्वतंत्र हो जाना चाहते थे, अतः वे ऐसे ही हो भी गए।) यही दशा इस्लाम की भी हो जाए, इसके लिए उन्होंने इस्लाम को ‘मुहम्मडन-इज़्म (Muhammadanism)’ का और मुस्लिमों को ‘मुहम्मडन्स (Muhammadans)’ का नाम दिया जिससे यह मान्यता बन जाए कि मुहम्मद ‘इस्लाम के प्रवर्तक (Founder)’ थे और इस प्रकार इस्लाम का इतिहास केवल 1400 वर्ष पुराना है। न क़ुरआन में, न हदीसों (पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल॰ के कथनों) में, न इस्लामी इतिहास-साहित्य में, न अन्य इस्लामी साहित्य में...कहीं भी इस्लाम के लिए ‘मुहम्मडन-इज़्म’ शब्द और इस्लाम के अनुयायियों के लिए ‘मुहम्मडन’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, लेकिन साम्राज्यिों की सत्ता-शक्ति, शैक्षणिक तंत्र और मिशनरी-तंत्र के विशाल व व्यापक उपकरण द्वारा, उपरोक्त मिथ्या धारणा प्रचलित कर दी गई।

भारत के बाशिन्दों में इस दुष्प्रचार का कुछ प्रभाव भी पड़ा, और वे भी इस्लाम को ‘मुहम्मडन-इज़्म’ मान बैठे। ऐसा मानने में इस तथ्य का भी अपना योगदान रहा है कि यहां पहले से ही सिद्धार्थ गौतम बुद्ध जी, ‘‘बौद्ध धर्म’’ के; और महावीर जैन जी ‘‘जैन धर्म’’ के ‘प्रवर्तक’ के रूप में सर्वपरिचित थे। इन ‘धर्मों’ (वास्तव में ‘मतों’) का इतिहास लगभग पौने तीन हज़ार वर्ष पुराना है। इसी परिदृश्य में भारतवासियों में से कुछ ने पाश्चात्य साम्राज्यिों की बातों (मुहम्मडन-इज़्म, और इस्लाम का इतिहास मात्र 1400 वर्ष की ग़लत अवधारणा) पर विश्वास कर लिया।
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महाभारत के रहस्यमय और अमर किरदार जो अब तक जिन्दा है - Mahabharata still alive immortal character

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जिस व्यक्ति ने जन्म लिया है उसकी मृत्यु अवश्य होगी गीता में भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही ज्ञान दिया था कि सिर्फ आत्मा अमर है और यह निश्चित समय के लिए अलग-अलग शरीर धारण करती है ये शरीर नश्वर है मगर  शास्त्रों में आठ ऐसे लोग भी बताए गए हैं जिन्होंने जन्म लिया है और वे हजारों सालों से देह धारण किए हुए हैं यानी वे अभी भी सशरीर जीवित हैं- 


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आपने सुना भी होगा कि महाभारत काल का अश्वथामा भी अभी तक जीवित है। श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था-


हनुमान -  

कलियुग में हनुमानजी सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता माने गए हैं और हनुमानजी भी इन अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं। सीता ने हनुमान को लंका की अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनने के बाद आशीर्वाद दिया था कि वे अजर-अमर रहेंगे। अजर-अमर का अर्थ है कि जिसे ना कभी मौत आएगी और ना ही कभी बुढ़ापा। इस कारण भगवान हनुमान को हमेशा शक्ति का स्रोत माना गया है क्योंकि वे चीरयुवा हैं- 

कृपाचार्य- 

महाभारत के अनुसार कृपाचार्य कौरवों और पांडवों के कुलगुरु थे। कृपाचार्य गौतम ऋषि पुत्र हैं और इनकी बहन का नाम है कृपी। कृपी का विवाह द्रोणाचार्य से हुआ था। कृपाचार्य, अश्वथामा के मामा हैं। महाभारत युद्ध में कृपाचार्य ने भी पांडवों के विरुद्ध कौरवों का साथ दिया था- 

अश्वथामा- 

ग्रंथों में भगवान शंकर के अनेक अवतारों का वर्णन भी मिलता है। उनमें से एक अवतार ऐसा भी है, जो आज भी पृथ्वी पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहा है। ये अवतार हैं गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का। द्वापरयुग में जब कौरव व पांडवों में युद्ध हुआ था, तब अश्वत्थामा ने कौरवों का साथ दिया था। महाभारत के अनुसार अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के सम्मिलित अंशावतार थे। अश्वत्थामा अत्यंत शूरवीर, प्रचंड क्रोधी स्वभाव के योद्धा थे। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने ही अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था।

अश्वत्थामा के संबंध में एक प्रचलित मान्यता भी है भारत में मध्य प्रदेश के बुरहानपुर शहर से 20 किलोमीटर दूर एक किला है। इसे असीरगढ़ का किला कहते हैं। इस किले में भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है। यहां के स्थानीय निवासियों का कहना है कि अश्वत्थामा प्रतिदिन इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आते हैं- 

ऋषि मार्कण्डेय- 


भगवान शिव के परम भक्त हैं ऋषि मार्कण्डेय। इन्होंने शिवजी को तप कर प्रसन्न किया और महामृत्युंजय मंत्र सिद्धि के कारण चिरंजीवी बन गए-

विभीषण- 

राक्षस राज रावण के छोटे भाई हैं विभीषण। विभीषण श्रीराम के अनन्य भक्त हैं। जब रावण ने माता सीता हरण किया था, तब विभीषण ने रावण को श्रीराम से शत्रुता न करने के लिए बहुत समझाया था। इस बात पर रावण ने विभीषण को लंका से निकाल दिया था। विभीषण श्रीराम की सेवा में चले गए और रावण के अधर्म को मिटाने में धर्म का साथ दिया-

राजा बलि- 

शास्त्रों के अनुसार राजा बलि भक्त प्रहलाद के वंशज हैं। बलि ने भगवान विष्णु के वामन अवतार को अपना सब कुछ दान कर दिया था। इसी कारण इन्हें महादानी के रूप में जाना जाता है। राजा बलि से श्रीहरि अतिप्रसन्न थे। इसी वजह से श्री विष्णु राजा बलि के द्वारपाल भी बन गए थे-

ऋषि व्यास- 

ऋषि व्यास भी अष्ट चिरंजीवी हैँ और इन्होंने चारों वेद (ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद और यजुर्वेद) का सम्पादन किया था। साथ ही, इन्होंने ही सभी 18 पुराणों की रचना भी की थी। महाभारत और श्रीमद्भागवत् गीता की रचना भी वेद व्यास द्वारा ही की गई है। इन्हें वेद व्यास के नाम से भी जाना जाता है। वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र थे। इनका जन्म यमुना नदी के एक द्वीप पर हुआ था और इनका रंग सांवला था। इसी कारण ये कृष्ण द्वैपायन कहलाए-

परशुराम- 

भगवान विष्णु के छठें अवतार हैं परशुराम। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका थीं। इनका जन्म हिन्दी पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ था। इसलिए वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली तृतीया को अक्षय तृतीया कहा जाता है। परशुराम का जन्म समय सतयुग और त्रेता के संधिकाल में माना जाता है। परशुराम ने 21 बार पृथ्वी से समस्त क्षत्रिय राजाओं का अंत किया था-परशुराम का प्रारंभिक नाम राम था। राज ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। शिवजी तपस्या से प्रसन्न हुए और राम को अपना फरसा (एक हथियार) दिया था। इसी वजह से राम परशुराम कहलाने लगे-  


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जाने कुछ रामायण के गुप्त रहस्य - Some of the Ramayana secret in hindi-

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teg-जाने कुछ रामायण के गुप्त रहस्य - Some of the Ramayana secret in hindi-रामायण का सच-रामायण के पात्र-पौराणिक रहस्य-रावण की असली लंका-अशोक वाटिका-महाभारत के प्रमाण-रावण का शव-लंका का इतिहास
कम लोग जानते है की श्री रामचरित मानस और रामायण में कुछ बातें अलग है जबकि कुछ बातें ऐसी है जिनका वर्णन केवल वाल्मीकि कृत रामायण में है-

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भगवान राम को समर्पित दो ग्रंथ मुख्यतः लिखे गए है एक तुलसीदास द्वारा रचित 'श्री रामचरित मानस' और दूसरा वाल्मीकि कृत 'रामायण'। इनके अलावा भी कुछ अन्य ग्रन्थ लिखे गए है पर इन सब में वाल्मीकि कृत रामायण को सबसे सटीक और प्रामाणिक माना जाता है यह महाकाव्य को भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय निधियों में से एक कहा जा सकता है-

आइये जाने दोनों रामायण के कुछ प्रसंगो में क्या विशेष अंतर है -


विशेष तथ्य :-

1- तुलसीदास द्वारा श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष को उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया, जबकि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में सीता स्वयंवर का वर्णन नहीं है। रामायण के अनुसार भगवान राम व लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिला पहुंचे थे। विश्वामित्र ने ही राजा जनक से श्रीराम को वह शिवधनुष दिखाने के लिए कहा। तब भगवान श्रीराम ने खेल ही खेल में उस धनुष को उठा लिया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। राजा जनक ने यह प्रण किया था कि जो भी इस शिव धनुष को उठा लेगा, उसी से वे अपनी पुत्री सीता का विवाह कर देंगे।


2- रामायण के अनुसार राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था। इस यज्ञ को मुख्य रूप से ऋषि ऋष्यश्रृंग ने संपन्न किया था। ऋष्यश्रृंग के पिता का नाम महर्षि विभाण्डक था। एक दिन जब वे नदी में स्नान कर रहे थे तब नदी में उनका वीर्यपात हो गया। उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था, जिसके फलस्वरूप ऋषि ऋष्यश्रृंग का जन्म हुआ था।

3- विश्व विजय करने के लिए जब रावण स्वर्ग लोक पहुंचा तो उसे वहां रंभा नाम की अप्सरा दिखाई दी। अपनी वासना पूरी करने के लिए रावण ने उसे पकड़ लिया। तब उस अप्सरा ने कहा कि आप मुझे इस तरह से स्पर्श न करें, मैं आपके बड़े भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर के लिए आरक्षित हूं।

इसलिए मैं आपकी पुत्रवधू के समान हूं,  लेकिन रावण नहीं माना और उसने रंभा से दुराचार किया। यह बात जब नलकुबेर को पता चली तो उसने रावण को श्राप दिया कि आज के बाद रावण बिना किसी स्त्री की इच्छा के उसे स्पर्श करेगा तो उसका मस्तक सौ टुकड़ों में बंट जाएगा।

4- ये बात सभी जानते हैं कि लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के नाक-कान काटे जाने से क्रोधित होकर ही रावण ने सीता का हरण किया था, लेकिन स्वयं शूर्पणखा ने भी रावण का सर्वनाश होने का श्राप दिया था। क्योंकि रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था। वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।

5- श्रीरामचरित मानस के अनुसार सीता स्वयंवर के समय भगवान परशुराम वहां आए थे, जबकि रामायण के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे, तब परशुराम वहां आए और उन्होंने श्रीराम से अपने  धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम के द्वारा बाण चढ़ा देने पर परशुराम वहां से चले गए थे।

6- वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था, तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, उसका नाम वेदवती था। वह भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण ने उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा। उस तपस्विनी ने उसी क्षण अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी। उसी स्त्री ने दूसरे जन्म में सीता के रूप में जन्म लिया।

7- जिस समय भगवान श्रीराम वनवास गए, उस समय उनकी आयु लगभग 27 वर्ष की थी। राजा दशरथ श्रीराम को वनवास नहीं भेजना चाहते थे, लेकिन वे वचनबद्ध थे। जब श्रीराम को रोकने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने श्रीराम से यह भी कह दिया कि तुम मुझे बंदी बनाकर स्वयं राजा बन जाओ।

8- अपने पिता राजा दशरथ की मृत्यु का आभास भरत को पहले ही एक स्वप्न के माध्यम से हो गया था। सपने में भरत ने राजा दशरथ को काले वस्त्र पहने हुए देखा था। उनके ऊपर पीले रंग की स्त्रियां प्रहार कर रही थीं। सपने में राजा दशरथ लाल रंग के फूलों की माला पहने और लाल चंदन लगाए गधे जुते हुए रथ पर बैठकर तेजी से दक्षिण (यम की दिशा) की ओर जा रहे थे।

9- हिंदू धर्म में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की मान्यता है, जबकि रामायण के अरण्यकांड के चौदहवे सर्ग के चौदहवे श्लोक में सिर्फ तैंतीस देवता ही बताए गए हैं। उसके अनुसार बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनी कुमार, ये ही कुल तैंतीस देवता हैं।

10- रघुवंश में एक परम प्रतापी राजा हुए थे, जिनका नाम अनरण्य था। जब रावण विश्वविजय करने निकला तो राजा अनरण्य से उसका भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में राजा अनरण्य की मृत्यु हो गई, लेकिन मरने से पहले उन्होंने रावण को श्राप दिया कि मेरे ही वंश में उत्पन्न एक युवक तेरी मृत्यु का कारण बनेगा।

11- रावण जब विश्व विजय पर निकला तो वह यमलोक भी जा पहुंचा। वहां यमराज और रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जब यमराज ने रावण के प्राण लेने के लिए कालदण्ड का प्रयोग करना चाहा तो ब्रह्मा ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया क्योंकि किसी देवता द्वारा रावण का वध संभव नहीं था।

12- सीताहरण करते समय जटायु नामक गिद्ध ने रावण को रोकने का प्रयास किया था। रामायण के अनुसार जटायु के पिता अरुण बताए गए हैं। ये अरुण ही भगवान सूर्यदेव के रथ के सारथी हैं।

13- जिस दिन रावण सीता का हरण कर अपनी अशोक वाटिका में लाया। उसी रात को भगवान ब्रह्मा के कहने पर देवराज इंद्र माता सीता के लिए खीर लेकर आए, पहले देवराज ने अशोक वाटिका में उपस्थित सभी राक्षसों को मोहित कर सुला दिया। उसके बाद माता सीता को खीर अर्पित की, जिसके खाने से सीता की भूख-प्यास शांत हो गई।

14- जब भगवान राम और लक्ष्मण वन में सीता की खोज कर रहे थे। उस समय कबंध नामक राक्षस का राम-लक्ष्मण ने वध कर दिया। वास्तव में कबंध एक श्राप के कारण ऐसा हो गया था। जब श्रीराम ने उसके शरीर को अग्नि के हवाले किया तो वह श्राप से मुक्त हो गया। कबंध ने ही श्रीराम को सुग्रीव से मित्रता करने के लिए कहा था।

15-  श्रीरामचरितमानस के अनुसार समुद्र ने लंका जाने के लिए रास्ता नहीं दिया तो लक्ष्मण बहुत क्रोधित हो गए थे, जबकि वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि लक्ष्मण नहीं बल्कि भगवान श्रीराम समुद्र पर क्रोधित हुए थे और उन्होंने समुद्र को सुखा देने वाले बाण भी छोड़ दिए थे। तब लक्ष्मण व अन्य लोगों ने भगवान श्रीराम को समझाया था।

16- सभी जानते हैं कि समुद्र पर पुल का निर्माण नल और नील नामक वानरों ने किया था। क्योंकि उसे श्राप मिला था कि उसके द्वारा पानी में फेंकी गई वस्तु पानी में डूबेगी नहीं, जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार नल देवताओं के शिल्पी (इंजीनियर) विश्वकर्मा के पुत्र थे और वह स्वयं भी शिल्पकला में निपुण था। अपनी इसी कला से उसने समुद्र पर सेतु का निर्माण किया था।

17- रामायण के अनुसार समुद्र पर पुल बनाने में पांच दिन का समय लगा। पहले दिन वानरों ने 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवे दिन 23 योजन पुल बनाया था। इस प्रकार कुल 100 योजन लंबाई का पुल समुद्र पर बनाया गया। यह पुल 10 योजन चौड़ा था। (एक योजन लगभग 13-16 किमी होता है)

18- एक बार रावण जब भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।

19- रामायण के अनुसार जब रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत उठा लिया तब माता पार्वती भयभीत हो गई थी और उन्होंने रावण को श्राप दिया था कि तेरी मृत्यु किसी स्त्री के कारण ही होगी।

20- जिस समय राम-रावण का अंतिम युद्ध चल रहा था, उस समय देवराज इंद्र ने अपना दिव्य रथ श्रीराम के लिए भेजा था। उस रथ में बैठकर ही भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था।

21- जब काफी समय तक राम-रावण का युद्ध चलता रहा तब अगस्त्य मुनि ने श्रीराम से आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ करने को कहा, जिसके प्रभाव से भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया।

22- रामायण के अनुसार रावण जिस सोने की लंका में रहता था वह लंका पहले रावण के भाई कुबेर की थी। जब रावण ने विश्व विजय पर निकला तो उसने अपने भाई कुबेर को हराकर सोने की लंका तथा पुष्पक विमान पर अपना कब्जा कर लिया।

23- रावण ने अपनी पत्नी की बड़ी बहन माया के साथ भी छल किया था। माया के पति वैजयंतपुर के शंभर राजा थे। एक दिन रावण शंभर के यहां गया। वहां रावण ने माया को अपनी बातों में फंसा लिया। इस बात का पता लगते ही शंभर ने रावण को बंदी बना लिया। उसी समय शंभर पर राजा दशरथ ने आक्रमण कर दिया। उस युद्ध में शंभर की मृत्यु हो गई। जब माया सती होने लगी तो रावण ने उसे अपने साथ चलने को कहा। तब माया ने कहा कि तुमने वासनायुक्त मेरा सतित्व भंग करने का प्रयास किया इसलिए मेरे पति की मृत्यु हो गई, अत: तुम्हारी मृत्यु भी इसी कारण होगी।

24- रावण के पुत्र मेघनाद ने जब युद्ध में इंद्र को बंदी बना लिया तो ब्रह्माजी ने देवराज इंद्र को छोडऩे को कहा। इंद्र पर विजय प्राप्त करने के कारण ही मेघनाद इंद्रजीत के नाम से विख्यात हुआ।

25- रावण जब विशव विजय पर निकला तब वह यमलोक भी जा पहुंचा।  वहां रावण और यमराज के बीच भयंकर युद्ध हुआ।  जब यमराज ने कालदंड के प्रयोग द्वारा रावण के प्राण लेने चाहे तो ब्रह्मा ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया क्योंकि किसी देवता द्वारा रावण का वध संभव नहीं था।

26- वाल्मीकि रामायण में 24 हज़ार श्लोक, 500 उपखण्ड, तथा सात कांड है।
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बुधवार, 20 दिसंबर 2017

रावण के ऐसे गुप्त राज जो कोई भी नहीं जानता -Anyone who knows the secret rule of Ravana -

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रावण की 10 अच्छाइयां जानकर रह जाएंगे हैरान आप।You will be surprised to learn the qualities of Ravana 10-रावण का जन्म 

आज से वर्ष 7129 वर्ष पूर्व हुए थे भगवान राम अर्थात रावण का जन्म 5,114 ईस्वी पूर्व हुआ था। 
एक बुराई आपकी सारी अच्छाइयों पर पानी फेर देती है और आप देवताओं की नजरों में भी नीचे ‍गिर जाते हैं। विद्वान और प्रकांड पंडित होने से आप अच्छे साबित नहीं हो जाते। अच्छा होने के लिए नैतिक बल का होना जरूरी है। कर्मों का शुद्ध होना जरूरी है। शिव का परम भक्त, यम और सूर्य तक को अपना प्रताप झेलने के लिए विवश कर देने वाला, प्रकांड विद्वान, सभी जातियों को समान मानते हुए भेदभावरहित रक्ष समाज की स्थापना करने वाला रावण आज बुराई का प्रतीक माना जाता है इसलिए कि उसने दूसरे की स्त्री का हरण किया था। आओ जानते हैं कि रावण के क्या क्या राज है  थी।
रावण की 10 अच्छाइयां जानकर रह जाएंगे हैरान आप।You will be surprised to learn the qualities of Ravana 10.रावण का राज ,रावण के काम-रावण के ऐसे गुप्त राज जो कोई भी नहीं जानता -Anyone who knows the secret rule of Ravana -रावण संहिता रावण का शव रावण की कहानी रावण का इतिहास रावण की लंका हनुमान राम सीता रावण का जन्म रावण के माता पिता का नाम रावण का जन्म कब हुआ था रावण के गुण रावण का इतिहास रावण की कहानी रावण का गोत्र क्या था रावण का शव रावण मूवी रावण का महल रावण का अंतिम संस्कार रावण की ममी रावण की लाश रावण शव रावण का शव कहा है रावण का शव कहां रखा है रावण की फोटो


महापंडित रावण -
कहा जाता है कि जब राम वानरों की सेना लेकर समुद्र तट पर पहुंचे, तब राम रामेश्वरम के पास गए और वहां उन्होंने विजय यज्ञ की तैयारी की। उसकी पूर्णाहुति के लिए देवताओं के गुरु बृहस्पति को बुलावा भेजा गया, मगर उन्होंने आने में अपनी असमर्थता व्यक्त की।अब सोच-विचार होने लगा कि किस पंडित को बुलाया जाए ताकि विजय यज्ञ पूर्ण हो सके। तब प्रभु राम ने सुग्रीव से कहा- 'तुम लंकापति रावण के पास जाओ।' सभी आश्चर्यचकित थे किंतु सुग्रीव प्रभु राम के आदेश से लंकापति रावण के पास गए। रावण यज्ञ पूर्ण करने लिए आने के लिए तैयार हो गया और कहा- 'तुम तैयारी करो, मैं समय पर आ जाऊंगा।'रावण पुष्पक विमान में माता सीता को साथ लेकर आया और सीता को राम के पास बैठने को कहा, फिर रावण ने यज्ञ पूर्ण किया और राम को विजय का आशीर्वाद दिया। फिर रावण सीता को लेकर लंका चला गया। लोगों ने रावण से पूछा- 'आपने राम को विजय होने का आशीर्वाद क्यों दिया?' तब रावण ने कहा- 'महापंडित रावण ने यह आशीर्वाद दिया है, राजा रावण ने नहीं।'
शिवभक्त रावण -
एक बार रावण जब अपने पुष्पक विमान से यात्रा कर रहा था तो रास्ते में एक वन क्षेत्र से गुजर रहा था। उस क्षेत्र के पहाड़ पर शिवजी ध्यानमग्न बैठे थे। शिव के गण नंदी ने रावण को रोकते हुए कहा कि इधर से गुजरना सभी के लिए निषिद्ध कर दिया गया है, क्योंकि भगवान तप में मग्न हैं।
रावण को यह सुनकर क्रोध उत्पन्न हुआ। उसने अपना विमान नीचे उतारकर नंदी के समक्ष खड़े होकर नंदी का अपमान किया और फिर जिस पर्वत पर शिव विराजमान थे, उसे उठाने लगा। यह देख शिव ने अपने अंगूठे से पर्वत को दबा दिया जिस कारण रावण का हाथ भी दब गया और फिर वह शिव से प्रार्थना करने लगा कि मुझे मुक्त कर दें। इस घटना के बाद वह शिव का भक्त बन गया।
रावण की रचना : रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने के अलावा अन्य कई तंत्र ग्रंथों की रचना की। कुछ का मानना है कि लाल किताब (ज्योतिष का प्राचीन ग्रंथ) भी रावण संहिता का अंश है। रावण ने यह विद्या भगवान सूर्य से सीखी थी।
राजनीति का ज्ञाता-
जब रावण मृत्युशैया पर पड़ा था, तब राम ने लक्ष्मण को राजनीति का ज्ञान लेने रावण के पास भेजा। जब लक्ष्मण रावण के सिर की ओर बैठ गए, तब रावण ने कहा- 'सीखने के लिए सिर की तरफ नहीं, पैरों की ओर बैठना चाहिए, यह पहली सीख है।' रावण ने राजनीति के कई गूढ़ रहस्य बताए।
कई शास्त्रों का रचयिता रावण : रावण बहुत बड़ा शिवभक्त था। उसने ही शिव की स्तुति में तांडव स्तोत्र लिखा था। रावण ने ही अंक प्रकाश, इंद्रजाल, कुमारतंत्र, प्राकृत कामधेनु, प्राकृत लंकेश्वर, ऋग्वेद भाष्य, रावणीयम, नाड़ी परीक्षा आदि पुस्तकों की रचना की थी।

शिव तांडव स्तोत्र -
रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने के अलावा अन्य कई तंत्र ग्रंथों की रचना की। रावण ने कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब पूरे पर्वत को ही लंका ले जाने लगा, तो भगवान शिव ने अपने अंगूठे से तनिक-सा जो दबाया तो कैलाश पर्वत फिर जहां था वहीं अवस्थित हो गया। इससे रावण का हाथ दब गया और वह क्षमा करते हुए कहने लगा- 'शंकर-शंकर'- अर्थात क्षमा करिए, क्षमा करिए और स्तुति करने लग गया। यह क्षमा याचना और स्तुति ही कालांतर में 'शिव तांडव स्तोत्र' कहलाया।
अरुण संहिता -
 संस्कृत के इस मूल ग्रंथ को अकसर ‘लाल-किताब’ के नाम से जाना जाता है। इस का अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका है। मान्यता है कि इस का ज्ञान सूर्य के सार्थी अरुण ने लंकाधिपति रावण को दिया था। यह ग्रंथ जन्म कुण्डली, हस्त रेखा तथा सामुद्रिक शास्त्र का मिश्रण है।
रावण संहिता -
 रावण संहित जहां रावण के संपूर्ण जीवन के बारे में बताती है वहीं इसमें ज्योतिष की बेहतर जानकारियों का भंडार है।
रावण पर रचना -
 पुराणों सहित इतिहास ग्रंथ वाल्मीकि रामायण और रामचरित रामायण में तो रावण का वर्णन मिलता ही है किंतु आधुनिक काल में आचार्य चतुरसेन द्वारा रावण पर 'वयम् रक्षामः' नामक बहुचर्चित उपन्यास लिखा गया है। इसके अलावा पंडित मदनमोहन शर्मा शाही द्वारा तीन खंडों में 'लंकेश्वर' नामक उपन्यास भी पठनीय है।
मायावी था रावण : शक्तियां दो तरह की होती हैं- एक दिव्य और दूसरी मायावी। रावण मायावी शक्तियों का स्वामी था। रावण एक त्रिकालदर्शी था। उसे मालूम हुआ कि प्रभु ने राम के रूप में अवतार लिया है और वे पृथ्वी को राक्षसविहीन करना चाहते हैं, तब रावण ने राम से बैर लेने की सोची।
परिजनों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध : भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण ने रावण की बहन शूर्पणखा की नाक काट दी थी। पंचवटी में लक्ष्मण से अपमानित शूर्पणखा ने अपने भाई रावण से अपनी व्यथा सुनाई और उसके कान भरते कहा, 'सीता अत्यंत सुंदर है और वह तुम्हारी पत्नी बनने के सर्वथा योग्य है।'
तब रावण ने अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए अपने मामा मारीच के साथ मिलकर सीता अपहरण की योजना रची। इसके अनुसार मारीच का सोने के हिरण का रूप धारण करके राम व लक्ष्मण को वन में ले जाने और उनकी अनुपस्थिति में रावण द्वारा सीता का अपहरण करने की योजना थी।
इस पर जब राम हिरण के पीछे वन में चले गए, तब लक्ष्मण सीता के पास थे लेकिन बहुत देर होने के बाद भी जब राम नहीं आए तो सीता माता को चिंता होने लगी, तब उन्होंने लक्ष्मण को भेजा। राम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में रावण सीता का अपहरण करके ले उड़ा। अपहरण के बाद आकाश मार्ग से जाते समय पक्षीराज जटायु के रोकने पर रावण ने उसके पंख काट दिए।
रावण ने सीता को लंकानगरी के अशोक वाटिका में रखा और त्रिजटा के नेतृत्व में कुछ राक्षसियों को उनकी देख-रेख का भार दिया।

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बुधवार, 6 दिसंबर 2017

खजुराहो के रहस्यमय मंदिर और नग्न मूर्तियो का राज।The secret of the mysterious temple sculptures of Khajuraho and naked.

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खजुराहो के रहस्यमय मंदिर और उसका इतिहास बहुत प्राचीन है --खजुराहो के रहस्यमय मंदिर और नग्न मूर्तियो का राज।The secret of the mysterious temple sculptures of Khajuraho and naked.
कलाकृति का उत्कृष्ट नमूना होने के बावजूद खजुराहो के मंदिर की मूर्तियों के विषय में बात करना भी अमर्यादित माना जाता है। इसके पीछे कारण है उन मूर्तियों का नग्न होना और संभोग की स्थिति को दर्शाना।
2. आकर्षण आकर्षण
खजुराहो के रहस्यमय मंदिर और नग्न मूर्तियो का राज।The secret of the mysterious temple sculptures of Khajuraho and naked.खजुराहो के रहस्यमय मंदिर और नग्न मूर्तियो का राज।The secret of the mysterious temple sculptures of Khajuraho and naked.मतंगेश्वर मंदिर खजुराहो मध्य प्रदेश खजुराहो मंदिर फोटो खजुराहो मंदिर की फोटो लक्ष्मण मंदिर khajuraho, madhya pradesh कंदरिया महादेव मंदिर खजुराहो, मध्य प्रदेश खजुराहो की मूर्तियां खजुराहो के चित्र खजुराहो मंदिर khajuraho, madhya pradesh 471606 नग्न मूर्ति के लिए इमेज खजुराहो मंदिर की नग्न मूर्तियों का रहस्य,,खजुराहो की नग्न और कामुक मूर्तियों के पीछे,


लेकिन खजुराहो की मूर्तियों की पहचान बस उसकी नग्न मूर्तियों तक ही सीमित नहीं है क्योंकि आज तो फिर भी हम खुद को खुले विचारों वाला मानते हैं और बहुत हद तक समाज में महिला-पुरुष के बीच पनपने वाले आकर्षण को मान्यता भी मिलने लगी है। लेकिन जब इन मूर्तियों का निर्माण हुआ था तब के हालात वर्तमान हालातों से पूरी तरह भिन्न थे।
3. अनसुलझी पहेली
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अनसुलझी पहेली
ये वह दौर था जब सेक्स या इससे संबंधित कोई भी विषय सामाजिक तौर पर पूरी तरह निषेध था। लेकिन इसके बावजूद खजुराहो के मंदिर में नग्न मूर्तियों का निर्माण हुआ। सदियों से यह एक अनसुलझी पहेली ही है कि आखिर खजुराहो की नग्न मूर्तियां कहना क्या चाहती हैं अर्थात इन्हें बनवाने के पीछे उद्देश्य क्या रहा होगा?
4. हिन्दू-जैन धर्म
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हिन्दू-जैन धर्म
हिन्दू और जैन धर्म से प्रेरित खजुराहो के अधिकांश मंदिरों का निर्माण चंदेलों के शासनकाल में हो गया था। लिखित दस्तावेजों के अनुसार 12वीं शताब्दी में खजुराहो में करीब 85 मंदिरों का अस्तित्व मौजूद था लेकिन समय के साथ-साथ ये ध्वस्त होते गए और आज मात्र 20 मंदिर ही शेष रह गए हैं।
5. कला का नमूना
कला का नमूना
खजुराहो के मंदिर कला का एक अद्भुत नमूना हैं जिनमें करीब 10 प्रतिशत कामुक और संभोग की कृतियां दर्शाई गई हैं।
6. तंत्र साधना
तंत्र साधना
भारत में सदियों से तंत्र साधना प्रचलित रही है, अघोरी और तंत्र साधक श्मशान भूमि पर इन साधनाओं के जरिए अलग-अलग सिद्धियां प्राप्त करते रहे हैं। इन तांत्रिक साधनाओं में सेक्स एक अभिन्न रूप के तौर पर अपनाया गया है और खजुराहो की ये मूर्तियां इसी तंत्र साधना के दौरान संभोग की मुद्राओं को दर्शा रही हैं।
7. सेक्स और अध्यात्म
सेक्स और अध्यात्म
इन मूर्तियों के माध्यम से तंत्र द्वारा सेक्स को अध्यात्म से जोड़ने का प्रयास किया गया है और कुछ हद तक वे इनमें सफल भी रहे हैं। खजुराहो की मूर्तियां इस बात का एक बेजोड़ प्रमाण हैं। खजुराहो की मूर्तियों की सबसे खास बात यह है कि नग्न संभोग की प्रतिमाएं होने के बावजूद इनमें कुछ ऐसा नहीं है जिसे देखकर किसी की आंखें झुक जाएं।
8. पवित्रता का अनुभव
पवित्रता का अनुभव
इन्हें देखने पर ऐसा नहीं लगता कि इनमें कुछ भद्दा या अश्लील है। जबकि इसके उलट इन प्रतिमाओं को देखकर मानसिक सुकून और पवित्रता का एहसास होता है।
9. खजुराहो की मूर्तियों का निर्माण
खजुराहो की मूर्तियों का निर्माण
आपको यकीन नहीं होगा लेकिन खजुराहो की इन मूर्तियों का निर्माण भी उन्हीं लोगों ने किया था जिन्होंने आध्यात्मिक सेक्स का अनुभव कर लिया था। सामान्य व्यक्ति की धारणा है कि खजुराहो की मूर्तियों को देखकर व्यक्ति के भीतर वासना का प्रचार होता है।
10. शांत होती है वासना
शांत होती है वासना
लेकिन असल बात ये है कि खजुराहो की ये मूर्तियां अगर कोई लगातार देखता रहे तो उसके मस्तिष्क के सभी विकार स्वत: ही गायब हो जाएंगे। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण करवाने वाले लोगों का भी यही ख्याल था कि इन प्रतिमाओं को अगर कोई शांत मन से देखे तो उसका अंतर्मन वासना शून्य हो जाएगा।
11. खजुराहो पर विवाद
खजुराहो पर विवाद
हालांकि कुछ विद्वान इस बात की पैरवी कर चुके हैं कि खजुराहो की ये मूर्तियां अश्लीलता की हद पार कर रही हैं इसलिए इन्हें मिट्टी से पुतवा देना चाहिए।
12. अर्थपूर्ण हैं ये मंदिर
अर्थपूर्ण हैं ये मंदिर
वहीं कुछ विद्वान ये भी कहते हैं कि खजुराहो के मंदिर जैसी प्रतिमाएं देशभर में होंगी तो बाकी किसी भी मंदिर की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। क्योंकि बाकी मंदिरों में न कोई वैज्ञानिकता है, न कोई अर्थ, जबकि खजुराहो के मंदिर जरूर अर्थपूर्ण हैं।
13. कामना और मोक्ष
कामना और मोक्ष
एक गृहस्थ व्यक्ति के जीवन में संपूर्ण तृप्ति के बाद ही मोक्ष की कामना जन्म लेती है। पहले संपूर्ण तृप्ति और उसके बाद मोक्ष, ये दो ही व्यक्ति के जीवन के लक्ष्य हैं।
14. काम से ऊपर उठना
काम से ऊपर उठना
शायद काम को पार कर समाधिलीन होने की इससे बेहतर भौतिक स्थिति की कल्पना दुर्लभ है। खजुराहो के मंदिर के बाहरी द्वार या दीवारों पर उत्कीर्ण इन्द्रीय मूर्तियां जीवन की प्रथम सीढ़ी, काम तृप्ति को पार करने का संकेत कराती हैं और यह बताती हैं कि जिस व्यक्ति ने जीवन के इस प्रथम चरण को पार नहीं किया है, वो देव दर्शन अर्थात मोक्ष के द्वितीय स्तर पर पैर रखने का अधिकारी नहीं है।
15. ईश्वर की प्राप्ति
ईश्वर की प्राप्ति
साधना के आरंभिक चरण में सर्वप्रथम बाधा कामवासना ही बनती है। इन मूर्तियों की अध्यात्मिकता मनुष्य के भीतरतम की इसी कामवासना को बाहर निकाल कर उसे जड़ से चेतन बनाने में है। अपने सार्थक रूप में ये मूर्तियां मनुष्य को हमेशा ईश्वर या मोक्ष की प्राप्ति के लिए काम से ऊपर उठने के लिए प्रेरित करती हैं।

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रविवार, 16 जुलाई 2017

भारत में इंडियन मुजाहिद्दीन की सच्चाई और मुसलमान The truth of the Indian Mujahideen and the Muslims

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छद्मयुद्ध और मुसलमान :-
भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दो दिन पहले आधा सच बोला कि
"विश्व की दूसरी सबसे अधिक मुस्लिम आबादी होने के बावजूद "आईएसआईएस" भारत में पैर जमाने में नाकाम रहा"
भारत में इंडियन मुजाहिद्दीन की सच्चाई और मुसलमान The truth of the Indian Mujahideen and the Muslims

दरअसल राजनाथ सिंह को पूरी बात कहनी चाहिए थी और वह यह थी कि इस देश के मुसलमानों की इतनी बड़ी आबादी के बावजूद "अलकायदा" भी इस देश में कभी पैर ना जमा सका।
संपुर्ण बात तो यह होती कि "इस देश का मुसलमान "आतंकवाद" से सदैव ही दूर रहा।"
मेरी इस बात का आधार यह है कि कांग्रेस के समय में या अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के समय एक एक करके "इंडियन मुजाहिद्दीन" के नाम पर पकड़ॆ गये मुसलमान भारत की अदालतों से एक एक करके 12 से 20 साल बाद अपना बहुत बड़ा जीवन जेल की अँधेरी काल कोठरी में गुजार कर बाइज्ज़त बरी होते जा रहे हैं।
यदि आप यह सोचेंगे कि अदालतों से एक एक करके बाइज्ज़त बरी होते यह मुसलमान यदि निर्दोष हैं तो इनको जिन आतंकवादी घटनाओं में फँसाया गया उन्हें दरअसल किसने अंजाम दिया ? तो सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा कि यह खेल कितना साजिश भरा है और गहरा है।

महाराष्ट्र के पूर्व आईजी एस एम मुशरिफ ने अपनी किताब "करकरे के हत्यारे कौन" में इस बात का खुलासा साल 2009 में ही कर दिया था कि यह साजिश किसकी है।
दरअसल , आतंकवाद का हौव्वा जब इस देश और दुनिया में खड़ा हुआ तो आतंकवादी घटनाओं में पुलिस और जाँच एजेंसियां अपना नाकारापन छुपाने के लिए छद्म रूप से गढ़ी गये एक आतंकवादी संगठन "इंडियन मुजाहिद्दीन" से उन आतंकवादी घटनाओं को छोड़कर यहाँ से वहाँ तक जहाँ दिल किया मुस्लिम लड़कों को उस संगठन का सदस्य बता कर और उस आतंकवादी घटनाओं में शामिल बता कर जेलों में ठूस दिया जो अब एक एक करके सब बाइज्ज़त बरी हो रहे हैं।
ताज़ी रिहाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शोध के छात्र गुलज़ार वाणी की हुई है जिन्हें ट्रेन धमाकों में फँसाया गया था।

सवाल फिर वही है कि फिर इन सभी घटनाओं को किया किसने ?
महाराष्ट्र पुलिस के पूर्व आईजी एस एम मुशरिफ अपने कार्यकाल के अनुभव पर कहते हैं कि यह सभी कारनामे भारत की खूफिया जाँच एजेंसी "इंटेलिजेंस ब्यूरो" कराती है इसीलिए इन घटनाओं के असली अपराधी पकड़े नहीं जाते और मुसलमानों को इन घटनाओं के नाम पर यहाँ वहाँ से उठा कर जेल में ठूस दिया जाता है और फिर भाँड मीडिया के ज़रिए यह माहौल बनवाया जाता है कि "मुसलमान आतंकवादी होता है" और इसका कारण उसका कट्टर होना और कुरान के प्रति उसकी अपार श्रृद्धा होता है। ऐसे ही छद्म खेल खेलकर मुसलमान और इस्लाम को डरावना बनाने की कोशिशें की गयीं।

दरअसल ऊपर से नीचे तक "इंटेलिजेंस ब्यूरो" में बैठे संघी यह साजिश करते हैं जिसको एस एम मुशरिफ ने सबके सामने नंगा करके रख दिया है , वह भी तमाम प्रमाणों के साथ।
आज "इंडियन मुजाहिद्दीन" का कुछ अता पता नहीं , कौन थे लोग ? कहाँ था हेडक्वार्टर ? सब बातें हवा हो गयीं , और वह यूँ कि इस संगठन का कोई वजूद कभी रहा ही नहीं , इसके वजूद को पुलिस और जाँच एजेंसी अदालतों में सिद्ध ही नहीं कर सकी। इसके नाम से फँसाए गये मुसलमान एक एक करके बाइज्ज़त बरी होते गये तो आईबी का गढ़ा "इंडियन मुजाहिद्दीन" भी हवा हो गया।

कभी कभी मुझे लगता है कि "आइएस" भी झूठ का पुलिंदा है , ठीक "इंडियन मुजाहिद्दीन" की तरह जिससे इसके नाम के सहारे पूरी दुनिया में मुसलमानों का कत्ले-आम किया जा सके।
केवल दुनिया को डराने के लिए इसके मुखिया को रोज मारा जाता है रोज जिन्दा किया जाता है और यह सारी दुनिया की भाँड मीडिया के माध्यम से किया जाता है , प्रतिदिन उसके खौफनाक किस्सों से देश और दुनिया को डराया जाता है और उसके लिए इस्लाम को जिम्मेदार ठहराया जाता है। ओसामा बिन लादेन तो सदैव दुनिया के सामने रहा परन्तु "बगदादी" अदृश्य ही रहा जैसे भारत में "इंडियन मुजाहिद्दीन" अदृश्य रहा।
दरअसल यह छद्म युद्ध कहा जाता है और यहूदी अपने जन्म से यह युद्ध लड़ते रहे हैं , सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हज़रत मुहम्मद के समय से ही , और तब इनकी रणनीति दूसरी थी , ये युद्ध विराम के समझौते करके मुसलमानों को युद्ध करने से रोकते थे और अपनी औरतों और बच्चों को आगे करके समझौता तोड़ कर लोगों को मारते थे।

यही छद्मयुद्ध आज पूरी दुनिया में खेला जा रहा है जो यहूदी सदैव से खेलते आएँ हैं , अब यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं कि "संघी" और "यहूदियों" का डीएनए एक है।
सच तो यह है कि देश का जो मुसलमान अपने विरुद्ध हो रहे इतने उत्पीड़न पर सड़क पर एक विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकता वह अपनी और अपने परिवार की जान जोखिम में डाल कर आतंकवादी क्या बनेगा।
दरअसल आज के मुसलमानों को हक और संघर्ष से अधिक जरूरत "दो वक्त की रोटी" की है , वह झंडा लेकर हक के लिए खड़ा हो जाएगा तो उसके घर में रात की रोटी नहीं बन पाएगी , दो वक्त की रोटी उसके सभी संघर्ष और हक की माँग पर भारी पड़ जाती है , उसे रोज़ कूँआ खोदना होता है रोज़ पानी पीना होता है , वह कूँआ खोदना छोड़कर आंदोलन करेगा तो पानी कहाँ से मिलेगा ? वह पंचर नहीं बनाएगा , कपड़े नहीं सिलेगा , मोटर मशीन नहीं बनाएगा तो रात में घर की रोटी कैसे बनेगी ?  वह इस कारण आंदोलन नहीं करता तो आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने की बात तो बहुत दूर की बात है।

दरअसल , आंदोलन भरे पेट के लोग करते हैं जिनको घर की रोटी की चिंता नहीं होती , 50 साल पहले दलित भी आंदोलन नहीं करते थे , क्युँकि वह भी तब आज के मुसलमान जैसे ही थे , आरक्षण और तमाम योजनाओं ने उनको समृद्ध किया उनको नौकरी मिली और उन्हीं नौकरी वालों से हर दफ्तर में जा जा कर कांशीराम ने दलित आंदोलन को जन्म दिया। दलित आंदोलन कोई भूखे पेट से नहीं जन्मा।
मुसलमानों के संदर्भ में ऐसे आरक्षण और लाभ संविधान में या तो प्रतिबंधित किया या तुस्टीकरण की गाली बना कर सभी को डराया गया कि वह मुसलमान के साथ खड़े होने की हिम्मत ना कर सकें। राहुल हों अखिलेश हों या मायावती , सब इसी कारण डरते हैं।
राजनाथ सिंह जी पूरा सच बोलिए , आप गृहमंत्री हैं आपको तो सब सच पता ही है ?
इस छद्म युद्ध में मारे जाना ही फिलहाल देश के मुसलमानों की किस्मत है। आज कहीं कल कहीं परसों कहीं।
बेसहारा
एक लेखक के दुवरा लिखा गया पोस्ट 
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