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गायत्री मन्त्र की शक्ति जानकर हैरान हो जाओगे आप -gaytri mantr ki shakti jankar hairan ho jaoge aap-You'll be shocked to learn the power of Gayatri Mantra-जीवन की हर मुश्किल समस्या का हल है इस गायत्री मन्त्र में गायत्री साधना से साधारण और विशिष्ठ श्रेणी के अनेक प्रयोजनों की सिद्धि होती है। जो कम संसार के किसी अन्य मन्त्र से नहीं हो सकता, वह निश्चित रूप से गायत्री मन्त्र द्वारा हो सकता है।
1. बुद्धि तीव्र होती है, एकाग्रता का विकास होता है।
2. सद्गुणों में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है। दोष दुर्गुणों में कमी आने लगती है। कुसंस्कार छटने लगता है।
3. जीभ का चटोरापन, दुव्र्यसन, कामेन्द्रिय उत्तेजना आदि संयमित होने लगती है, ब्रह्मचर्य में मन लगता है।
4. दिनचर्या में स्वच्छता, सुव्यवस्था और श्रम के प्रति रूचि जागने लगती है।
5. विद्यार्थियों को पढ़ाई में मन लगता है।
6. बुरी संगत, नशा, आलस्य, प्रमाद आदि छूटने लगते हैं।
7. मन में उत्साह, प्रसन्नता एवं श्रेष्ठ कार्यों व विचारों के प्रति लगाव बढ़ाता जाता है।
8. आपत्तियों का निवारण होता है।
संसारिक प्रयोजनों के लिए जैसे - रोग निवारण, बुद्धि वृद्धि, राजकीय सफलता, दरिद्रता का नाश, सुसन्तति की प्राप्ति, शत्रुता का संहार, भूतबाधा की शांति, दूसरों को प्रभावित करना, रक्षा कवच, बुरे मुहुर्त आदि के लिए विशेष अनुष्ठान किया जाना आवश्यक होता है।
अत: उन सभी मनुष्यों को गायत्री मन्त्र की जप साधना या लेखन साधना अवश्य करनी चाहिए जिन्हें संसारिक उपलब्धियों एवं आत्मिक उन्नति की अकांक्षा हो। (यहां महात्मा आनन्द की कहानी सुनाएं) यदि अभिष्ठ फल न भी मिले तो गायत्री साधना कभी निष्फल नहीं जाती। उससे दूसरे प्रकार के लाभ मिल जाते हैं। (यहां माधवाचार्य की कहानी सुनाएं।)
गायत्री साधना का स्त्री व पुरुष दोनों को समान अधिकार है। वैदिक काल में अनेक मंत्रदृष्टा ऋषिकाएं हुई हैं। गार्गी, मैत्रेयी, कात्यायनी, यमी, शची, अपाला, घेषा, विश्ववारा, इला, भारती देवी आदि गायत्री साधना व वेदाध्ययन के लिए प्रसिद्ध रही हैं। जो स्त्री गायत्री साधना करती है उनकी गृहस्थी सुन्दर सुव्यवस्थित, सन्ताने सुसंस्कृत होती है। पति, परिवार आदि उसके अनुकूल बन जाते हैं।
गायत्री मन्त्र के जप के ही समान मन्त्रलेखन साधना भी अतिफलदायी होती है। गायत्री मंत्र लेखन के समय हाथ, आँखें, मस्तिष्क एवं सभी चित्तवृत्तियाँ एकाग्र हो जाती हैं क्योंकि लिखने का कार्य एकाग्रता चाहता है। कहा गया है - ‘‘हवन से मन्त्र में प्राण आते हैं, जप से मन्त्र जागृत होता है, और लिखने से मन्क्ष् की शक्ति आत्मा में प्रकाशित होती है। श्रद्धापूर्वक यदि शुद्ध मन्त्र लेखन किया जाए तो उसका प्रभाव जप से दस गुना अधिक होता है’’
