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शनिवार, 7 अप्रैल 2018

गायत्री मन्त्र की शक्ति जानकर हैरान हो जाओगे आप -You'll be shocked to learn the power of Gayatri Mantra

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गायत्री मन्त्र की शक्ति जानकर हैरान हो जाओगे आप -gaytri mantr ki shakti jankar hairan ho jaoge aap-You'll be shocked to learn the power of Gayatri Mantra-जीवन की हर मुश्किल समस्या का हल है इस गायत्री मन्त्र में गायत्री साधना से साधारण और विशिष्ठ श्रेणी के अनेक प्रयोजनों की सिद्धि होती है। जो कम संसार के किसी अन्य मन्त्र से नहीं हो सकता, वह निश्चित रूप से गायत्री मन्त्र द्वारा हो सकता है। 

-गायत्री मन्त्र की शक्ति जानकर हैरान हो जाओगे आप -You'll be shocked to learn the power of Gayatri Mantra

1.    बुद्धि तीव्र होती है, एकाग्रता का विकास होता है।
2.    सद्गुणों में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है। दोष दुर्गुणों में कमी आने लगती है। कुसंस्कार छटने लगता है।
3.    जीभ का चटोरापन, दुव्र्यसन, कामेन्द्रिय उत्तेजना आदि संयमित होने लगती है, ब्रह्मचर्य में मन लगता है।
4.    दिनचर्या में स्वच्छता, सुव्यवस्था और श्रम के प्रति रूचि जागने लगती है।
5.    विद्यार्थियों को पढ़ाई में मन लगता है।
6.    बुरी संगत, नशा, आलस्य, प्रमाद आदि छूटने लगते हैं।
7.    मन में उत्साह, प्रसन्नता एवं श्रेष्ठ कार्यों व विचारों के प्रति लगाव बढ़ाता जाता है।
8.    आपत्तियों का निवारण होता है।
संसारिक प्रयोजनों के लिए जैसे - रोग निवारण, बुद्धि वृद्धि, राजकीय सफलता, दरिद्रता का नाश, सुसन्तति की प्राप्ति, शत्रुता का संहार, भूतबाधा की शांति, दूसरों को प्रभावित करना, रक्षा कवच, बुरे मुहुर्त आदि के लिए विशेष अनुष्ठान किया जाना आवश्यक होता है।

अत: उन सभी मनुष्यों को गायत्री मन्त्र की जप साधना या लेखन साधना अवश्य करनी चाहिए जिन्हें संसारिक उपलब्धियों एवं आत्मिक उन्नति की अकांक्षा हो। (यहां महात्मा आनन्द की कहानी सुनाएं) यदि अभिष्ठ फल न भी मिले तो गायत्री साधना कभी निष्फल नहीं जाती। उससे दूसरे प्रकार के लाभ मिल जाते हैं। (यहां माधवाचार्य की कहानी सुनाएं।)

गायत्री साधना का स्त्री व पुरुष दोनों को समान अधिकार है। वैदिक काल में अनेक मंत्रदृष्टा ऋषिकाएं हुई हैं। गार्गी, मैत्रेयी, कात्यायनी, यमी, शची, अपाला, घेषा, विश्ववारा, इला, भारती देवी आदि गायत्री साधना व वेदाध्ययन के लिए प्रसिद्ध रही हैं। जो स्त्री गायत्री साधना करती है उनकी गृहस्थी सुन्दर सुव्यवस्थित, सन्ताने सुसंस्कृत होती है। पति, परिवार आदि उसके अनुकूल बन जाते हैं।

गायत्री मन्त्र के जप के ही समान मन्त्रलेखन साधना भी अतिफलदायी होती है। गायत्री मंत्र लेखन के समय हाथ, आँखें, मस्तिष्क एवं सभी चित्तवृत्तियाँ एकाग्र हो जाती हैं क्योंकि लिखने का कार्य एकाग्रता चाहता है। कहा गया है - ‘‘हवन से मन्त्र में प्राण आते हैं, जप से मन्त्र जागृत होता है, और लिखने से मन्क्ष् की शक्ति आत्मा में प्रकाशित होती है। श्रद्धापूर्वक यदि शुद्ध मन्त्र लेखन किया जाए तो उसका प्रभाव जप से दस गुना अधिक होता है’’

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बुधवार, 14 मार्च 2018

इच्छाधारी नागिन या नागकन्या है ये औरत -Wishful serpent or snake today is this lady

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इच्छाधारी नागिन या नागकन्या है ये औरत -.ichadhari nagin ya nagknya hai ye-Wishful serpent or snake today is this lady

आज तक आपने इच्छाधारी नागिन या नागकन्या का रूप फिल्मों में ही देखा होगा, परंतु आज हम आपको ऐसी इच्छाधारी नागिन से रूबरू कराने जा रहे हैं, जो अपने नाग पति को पाने के लिए इस मृत्युलोक में साधना कर रही है।

इच्छाधारी नागिन या नागकन्या है ये औरत -Wishful serpent or snake today is this lady


स्वयं नागकन्या होने का दावा करने वाली माया का कहना है कि वह हर 24 घंटे में हवन के दौरान नागिन का रूप धारण कर अपनी तीन बहनों से मिलने जाती है जो उसे अपने नाग पति को पाने के लिए किस तरह साधना की जाए, यह निर्देश देती हैं। माया के मुताबिक ये तीनों बहनें भी इच्छाधारी नागिनें हैं।



खुद को बचपन से शादीशुदा समझने वाली माया नाग के नाम का सिंदूर भरती है और उसे पूरा विश्वास है कि जल्द ही उसके पति के साथ उसका मिलन होगा। माया कहती है कि फिलहाल उसका पति इस मृत्युलोक में उसके परिवार के मोह में फँसा हुआ है और उससे सारी शक्तियाँ छीनी जा चुकी हैं।

अपने पूर्व जन्म की कहानी सुनाते हुए वह कहती है कि द्वापर युग के दौरान वह एक खाई में गिर गई थी तब किसी बाबा ने गोपाल नामक नाग को उसकी मदद के ‍लिए भेजा था, तभी से उन दोनों में प्रेम हो गया था। परंतु शादी न हो पाने की वजह से उसने आत्महत्या कर ली थी। ...और तब से आज तक अपने साथी को पाने के लिए भटक रही है।

नागलोक और मृत्युलोक की अजीबो-गरीब कहानियाँ सुनाने वाली यह इच्छाधारी नागिन माया मध्यप्रदेश के बड़नगर स्थित एक आश्रम में निवास करती है। इन कहानियों से प्रभावित वहाँ के निवासी इनकी महामाया माँ भगवती के रूप में आराधना करते हैं।
इच्छाधारी नागिन या नागकन्या है ये औरत -Wishful serpent or snake today is this lady

लोगों द्वारा माया की पूजा करना आस्था का प्रतीक है या उसका इच्छाधारी नागिन होने के अंधविश्वास का प्रभाव है? आज के इस वैज्ञानिक युग में यह घटना कितनी प्रासंगिक है,

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गुरुवार, 1 मार्च 2018

ये है चालू स्त्रियों के लक्षण जाने -These are the symptoms of the current women

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ये है चालू स्त्रियों के लक्षण जाने -These are the symptoms of the current women
ये है चालू स्त्रियों के लक्षण जाने -These are the symptoms of the current womenये है चालू स्त्रियों के लक्षण जाने These are the symptoms of the current women,चालू लड़की ,चालू ओरत . जिस महिला की आंखें डरी हुई सी,किसी स्त्री की गर्दन छोटी हो,किसी स्त्री की हथेली किसी महिला का माथा,स्त्री के पैर ,जिन स्त्रियों में हों ऐसे लक्षण उन्हें शास्त्रों में शुभ नहीं माना गया है-स्त्री के प्रकार स्त्री को क्या चाहिए स्त्री के प्रकार स्त्री की कमजोरी चरित्रहीन स्त्री स्त्री वशीकरण त्रिया चरित्र चरित्रहीन पत्नी की पहचान नारी के प्रकार चरित्रहीन स्त्री के लक्षण  चरित्रहीन पत्नी के लक्षण  स्त्री चरित्र  भाग्यशाली स्त्री के लक्षण  स्त्री के प्रकार  चरित्रहीन महिलाओं की पहचान  चरित्रहीन लड़कियों की पहचान  चरित्रहीन पत्नी की पहचान

जिन स्त्रियों में हों ऐसे लक्षण उन्हें शास्त्रों में शुभ नहीं माना गया है-


स्त्री को हमारे ग्रंथों में लक्ष्मी कहा गया है। ज्योतिष के ग्रंथों में भी स्त्रियों के स्वभाव और उनके भविष्य से जुड़ी बातों के बारे में रोचक वर्णन मिलता है। प्रसिद्ध ग्रंथ बृहद संहिता में स्त्रियों के दो प्रकार बताए गए है शुभ लक्षणा और अशुभ लक्षणा।शुभ लक्षणा को साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। वहीं अशुभ लक्षणा को अलक्ष्मी कहा जा सकता है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं स्त्रियों के कुछ ऐसे ही शारीरिक लक्षणों के बारे में जिन्हें इस ग्रंथ में शुभ नही माना गया है-
कनिष्ठिका वा तदनन्तरा वा महीं न यस्या: स्पृशति स्त्रिया: स्यात्।
गताथवङ्गुष्ठमतीत्य यस्या: प्रदेशिनी सा कुलटातिपापा।।

स्त्री के पैर की सबसे छोटी या उसके बराबर वाली अंगुली भूमि पर न टिकती हो या अंगूठे के बराबर वाली अंगुली, अंगूठे से बहुत लंबी हो तो ऐसी स्त्री का चरित्र परिस्थिति के अनुसार बदल सकता है। ऐसी महिलाएं नियंत्रण मेंं न रहने वाली, पाप करने वाली और गुस्सैल स्वभाव की होती हैं। जिस स्त्री की पिण्डली का पिछला भाग मोटा हो, बहुत ऊपर की ओर चढ़ा हुआ सा हो साथ ही नसें उभरी हों तो ऐसी स्त्रियों को शुभ नहीं माना जाता है।यदि यह भाग मांसहीन, सूखा सा हो, पिण्डली पर बहुत रोम हों तो ऐसी स्त्री बहुत दु:ख पाती है। गुहा भाग के बाल वामावर्त रोमों से युक्त हो या यह भाग दबा हुआ सा हो तो अशुभ होता है। यदि पेट घड़े के समान हो तो जीवन में हमेशा दरिद्रता बनी रहती है।  पेट पतला, लंबा या गड्ढेदार हो तब भी अच्छा नही माना जाता है-

प्रविलम्बिनि देवरं ललाटे, श्वसुर हन्त्युदरे स्फिजो: पतिं च।
अतिरोमचयाान्वितोत्तरोष्ठी, न शुभा भर्तुरतीव या च दीर्घा।। 

किसी महिला का माथा यदि लंबा हो तो देवर के लिए, पेट लंबा हो तो ससुर के लिए, कमर के नीचे वाला हिस्सा भारी हो तो पति के लिए अनिष्टकारक होता है। मूंछों के स्थान पर बहुत रोएं हो या स्त्री का कद बहुत लंबा हो तो पति के लिए शुभ नहीं होता है। स्त्री के कान रोएंदार हों, मैले हों असमान आकार के हों तो हमेशा क्लेश रहता है। दांत, मोटे चौड़े या बहुत लंबे हों, बाहर निकले हों तो जीवन में हमेशा दुख रहता है। काले मसूड़ों वाली महिलाओं का भाग्य उनका अधिक साथ नही देता है-

क्रव्यादरूपैर्वृककाकङ्सरीसृपोलूकसमानचिन्है:।
शुष्कै: शिरालैर्विषमैश्च हस्तैर्भवन्ति नार्य सुखवित्तहीना:।।

जिन स्त्रियों में हों ऐसे लक्षण उन्हें शास्त्रों में शुभ नहीं माना गया है-
किसी स्त्री की हथेली पर मांसभक्षी पक्षी का चिन्ह हो, भेडिय़ा, कौआ, सांप, उल्लू जैसा चिन्ह हों तो वह स्त्री दुख देने वाली होती है-
हथेलियां चपटी मांसहीन हों व नसें ज्यादा उभरी हुुई हों तो उन्हें अच्छा नहीं माना जाता है। दोनों हथेलियों के आकार में अंतर हो तो ऐसी महिलाएं सुख और धन से हीन होती हैं-

नेत्रे यस्या: केकरे पिङ्गले वा सा दु:शीला श्यामलेक्षणा च।
कूपौ यस्या गण्डयोश्च स्मितेषु नि:सन्दिग्धं बंधकी तां वदन्ति।।

जिस महिला की आंखें डरी हुई सी, पीली हों वह बुरे स्वभाव वाली होती है। जबकि चंचल और स्लेटी रंग की आंखों को भी शुभ नहीं माना जाता है। हंसते समय जिस स्त्री के गालों पर गड्ढे पड़ते हों उसका चरित्र बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता है-

ह्स्वयातिनि:स्वता दीर्घया कुलक्षय:।
ग्रीवया पृथूत्थया योषित: प्रचण्डता।।

किसी स्त्री की गर्दन छोटी हो तो वह जीवनभर दूसरों पर निर्भर रहती है। वह अपना कोई भी निर्णय स्वयं नहीं ले पाती। वहीं 4 अंगुल से अधिक लंबी गर्दन वाली स्त्री वंश का नाश करने वाली होती है। यदि गर्दन बहुत मोटी हो तो उसे शुभ नही माना जाती है। गर्दन चपटी हो तो ऐसी स्त्री का स्वभाव प्रचण्ड यानी गुस्सैल और जिद्दी होता है-

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

धूप में है ऐसी शक्ति जो करदे जीवन को मंगलमय - The power to give a nice life The dhup

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teg-धूप में है ऐसी शक्ति जो करदे जीवन को मंगलमय - The power to give a nice life The dhup-धूप बत्ती-धूप के फायदे-धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो-धूप से बचाव-धूप में निकलो-धूप बत्ती बनाने की विधि-धूप में क्या चीज नही सूखती-धूप से एलर्जी-
हमारे हिन्दू धर्म में धूप देने व दीप जलाने का महत्व बहुत अधिक है धूप दीप करने से मन को शांति मिलती है घर से सारी नकारात्मक उर्जा समाप्त हो जाती है और सकारात्मक उर्जा का आगमन होता है जिससे घर में सुख शांति मिलती है धूप देने से आकस्मिक दुर्घटनाये नहीं होती है रोगों से मुक्ति मिलती है सभी दोष समाप्त हो जाते है जिस घर में धूप दी जाती हो वंहा गृहकलह नहीं होती- 

धूप में है ऐसी शक्ति जो करदे जीवन को मंगलमय - The power to give a nice life The dhup धूप में है ऐसी शक्ति जो करदे जीवन को मंगलमय - The power to give a nice life The dhup-धूप बत्ती-धूप के फायदे-धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो-धूप से बचाव-धूप में निकलो-धूप बत्ती बनाने की विधि-धूप में क्या चीज नही सूखती-धूप से एलर्जी-धूप में है ऐसी शक्ति जो करदे जीवन को मंगलमय - The power to give a nice life The dhup-हिन्दू धर्म में धूप देने व दीप जलाने का महत्व गूगल dhoop लोबान धूप गूगल की धूप गुग्गल धूप धूप के फायदे गूगल धूप कैसे बनाये गुगल धूप धूप बनाने की विधि

धूप के असर से वास्तु दोष का निवारण होता है ! ग्रह नक्षत्र से होने वाले अशुभ प्रभाव भी धूप देने से शुभ प्रभाव देना शुरू कर देते है ! सम्पूर्ण पितृपक्ष में धूप देने से पितृ तृप्त हो जाते है और मुक्ति को प्रदान होते है जिससे पित्र दोष समाप्त हो जाता है 
तो क्या है ये धूप आइये जानते, जिसे हम सब बहुत पीछे छोड़ आये है जी है ये वाही धूप जो कई वर्षो पहले मंदिरों आदि में प्रयोग की जाती थी लेकिन अब बिलकुल ही धूमिल होती जा रही है ! धूप में बड़ी शक्ति होती है ऐसी ही धूप की विधि हम आपको बता रहे है ताकि आप बाजार में आने वाली उन नकली धूप से बच सके-
सामग्री विधि
तंत्रसार के अनुसार अगर, तगर, कुष्ठ, शैलज, शर्करा, नागरमाथा, चंदन, इलाइची, तज, नखनखी, मुशीर, जटामांसी, कर्पूर, ताली, सदलन और गुग्गुल ये सोलह प्रकार के धूप माने गए हैं। इसे षोडशांग धूप कहते हैं। मदरत्न के अनुसार चंदन, कुष्ठ, नखल, राल, गुड़, शर्करा, नखगंध, जटामांसी, लघु और क्षौद्र सभी को समान मात्रा में मिलाकर जलाने से उत्तम धूप बनती है। इसे दशांग धूप कहते हैं-

सभी को सामान भाग में लेकर कूट कर मिक्स कर ले इस प्रकार एक अच्छी धूप तेयार हो जाएगी-

गाय के गोबर का कंडा जलाये और जब उसमे धुआं ना रहे तब उस अंगारे पर उपरोक्त धूप को इशायन कोण में जलाये! धूप देने पर उसके आस पास जल का अर्पण कर, अंगुली से अर्पण करने पर धूप देवताओ को लगती है और अंगूठे से अर्पण करने पर पितरों को प्राप्त होती है सुबह की धूप देवताओ को और शाम की धूप पितरों को प्राप्त होती है जब भी आप धूप दे स्वच्छ हो कर ही दे, धूप देते समय किसी भी संगीत को नहीं बजाना चाहिए और हो सके तो उस समय ज्यादा बोलना भी नहीं चाहिए - 

यह भी ध्यान रखे की धूप का धुआं घर के सभी कोनो में पहुच जाये -

महाभारत के गुप्त रहस्य -secret About Mahabharat

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 महाभारत के बारे में अनसुने बातें --Mahabharata about things unheard  secret About Mahabharatin hindi-
महाभारत हिंदू संस्कृति की एक अमूल्य धरोहर है। शास्त्रों में इसे पांचवा वेद भी कहा गया है। इसके रचयिता महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास हैं। महर्षि वेदव्यास ने इस ग्रंथ के बारे में स्वयं कहा है- यन्नेहास्ति न कुत्रचित्। अर्थात जिस विषय की चर्चा इस ग्रंथ में नहीं की गई है, उसकी चर्चा अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है। श्रीमद्भागवतगीता जैसा अमूल्य रत्न भी इसी महासागर की देन है। इस ग्रंथ में कुल मिलाकर एक लाख श्लोक है, इसलिए इसे शतसाहस्त्री संहिता भी कहा जाता है-

महाभारत के गुप्त रहस्य -secret About Mahabharat

महाभारत के गुप्त रहस्य -secret About Mahabharat


1- महाभारत ग्रंथ की रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी लेकिन इसका लेखन भगवान श्रीगणेश ने किया था। भगवान श्रीगणेश ने इस शर्त पर महाभारत का लेखन किया था कि महर्षि वेदव्यास बिना रुके ही लगातार इस ग्रंथ के श्लोक बोलते रहे। तब महर्षि वेदव्यास ने भी एक शर्त रखी कि मैं भले ही बिना सोचे-समझे बोलूं लेकिन आप किसी भी श्लोक को बिना समझे लिखे नहीं। बीच-बीच में महर्षि वेदव्यास ने कुछ ऐसे श्लोक बोले जिन्हें समझने में श्रीगणेश को थोड़ा समय लगा और इस दौरान महर्षि वेदव्यास अन्य श्लोकों की रचना कर लेते थे।

2- महाभारत ग्रंथ का वाचन सबसे पहले महर्षि वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन ने राजा जनमेजय की सभा में किया था। राजा जनमेजय अभिमन्यु के पौत्र तथा परीक्षित के पुत्र थे। इन्होंने ने ही अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए एसा किया था |

3- भीष्म पितामह के पिता का नाम शांतनु था, उनका पहला विवाह गंगा से हुआ था। पूर्वजन्म में शांतनु राजा महाभिष थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ करके स्वर्ग प्राप्त किया। एक दिन बहुत से देवता और राजर्षि, जिनमें महाभिष भी थे, ब्रह्माजी की सेवा में उपस्थित थे। उसी समय वहां देवी गंगा का आना हुआ। गंगा को देखकर राजा महाभिष मोहित हो गए और एकटक उन्हें देखने लगे। इससे क्रुद्ध होकर ब्रह्मा जी ने महाभिष को श्राप दे दिया।  जब महाभिष ने उनसे क्षमा याचना की तब ब्रह्माजी ने कहा- महाभिष तुम मृत्युलोक जाओ, जिस गंगा को तुम देख रहे हो, वह तुम्हारा अप्रिय करेगी और तुम जब उस पर क्रोध करोगे तब इस शाप से मुक्त हो जाओगे।

4- ब्रह्माजी के श्राप के कारण अगले जन्म में महाभिष, राजा प्रतीप के पुत्र शांतनु बने। इनका विवाह देवी गंगा से हुआ। विवाह से पहले गंगा ने शांतनु से यह प्रतिज्ञा करवाई थी कि वे कभी कोई प्रश्न नहीं पूछेंगे। शांतनु ने उनकी यह बात मान ली। राजा शांतनु और गंगा की आठ संतान हुई। पहली सातों संतानों को गंगा ने जन्म लेते ही नदी में प्रवाहित कर दिया। वचनबद्ध होने के कारण राजा शांतनु गंगा से कुछ नहीं पूछ पाए।

5- जब गंगा आंठवी संतान को नदी में प्रवाहित करने जा रही थी तब राजा शांतनु ने क्रोध में आकर उससे इसका कारण पूछा। तब देवी गंगा ने उन्हें पिछले जन्म की पूरी बात बताई और वह शांतनु की आठवी संतान को लेकर अन्यत्र चली गई।

6- धर्म ग्रंथों के अनुसार तैंतीस देवता प्रमुख माने गए हैं। इनमें अष्ट वसु भी हैं। ये ही अष्ट वसु शांतनु व गंगा के पुत्र के रूप में अवतरित हुए क्योंकि इन्हें वशिष्ठ ऋषि ने मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दिया था। गंगा ने अपने सात पुत्रों को जन्म लेते ही नदी में बहा कर उन्हें मनुष्य योनि से मुक्त कर दिया था। राजा शांतनु व गंगा का आठवां पुत्र भीष्म के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

7- राजा शांतनु का दूसरा विवाह निषाद कन्या सत्यवती से हुआ। शांतनु और सत्यवती के दो पुत्र हुए- चित्रांगद और वित्रिचवीर्य। चित्रांगद बहुत ही वीर और पराक्रमी था। एक युद्ध में उसी के नाम के गंर्धवराज चित्रांगद ने उसका वध कर दिया। चित्रांगद के बाद विचित्रवीर्य को राजा बनाया गया। इनका विवाह काशी की राजकुमारी अंबिका और अंबालिका से हुआ। लेकिन कुछ समय बाद ही वित्रिचवीर्य की मृत्यु हो गई।

8- महाभारत में विदुर यमराज के अवतार थे। यमराज को ऋषि माण्डव्य के श्राप के कारण मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ा। विदुर धर्म शास्त्र और अर्थशास्त्र में बड़े निपुण थे। उन्होंने जीवनभर कुरुवंश के हित के लिए कार्य किया।

9- यदुवंशी राजा शूरसेन की पृथा नामक कन्या व वसुदेव नामक पुत्र था। इस कन्या को राजा शूरसेन अपनी बुआ के संतानहीन लड़के कुंतीभोज को गोद दे दिया था। कुंतीभोज ने इस कन्या का नाम कुंती रखा। कुंती का विवाह राजा पाण्डु से हुआ था।

10- जब कुंती बाल्यावस्था में थी, उस समय उसने ऋषि दुर्वासा की सेवा की थी। सेवा से प्रसन्न होकर ऋषि दुर्वासा ने कुंती को एक मंत्र दिया जिससे वह किसी भी देवता का आह्वान कर उससे पुत्र प्राप्त कर सकती थी। विवाह से पूर्व इस मंत्र की शक्ति देखने के लिए एक दिन कुंती ने सूर्यदेव का आह्वान किया जिसके फलस्वरूप कर्ण का जन्म हुआ।

11- महाराज पाण्डु का दूसरा विवाह मद्रदेश की राजकुमारी माद्री से हुआ। एक बार राजा पाण्डु शिकार खेल रहे थे। उस समय किंदम नामक ऋषि अपनी पत्नी के साथ हिरन के रूप में सहवास कर रहे थे। उसी अवस्था में राजा पाण्डु ने उन पर बाण चला दिए। मरने से पहले ऋषि किंदम ने राजा पाण्डु को श्राप दिया कि जब भी वे अपनी पत्नी के साथ सहवास करेंगे तो उसी अवस्था में उनकी मृत्यु हो जाएगी।

12- ऋषि किंदम के श्राप से दु:खी होकर राजा पाण्डु ने राज-पाट का त्याग कर दिया और वनवासी हो गए। कुंती और माद्री भी अपने पति के साथ ही वन में रहने लगीं। जब पाण्डु को ऋषि दुर्वासा द्वारा कुंती को दिए गए मंत्र के बारे में पता चला तो उन्होंने कुंती से धर्मराज का आवाह्न करने के लिए कहा जिसके फलस्वरूप धर्मराज युधिष्ठिर का जन्म हुआ। इसी प्रकार वायुदेव के अंश से भीम और देवराज इंद्र के अंश से अर्जुन का जन्म हुआ। कुंती ने यह मंत्र माद्री को बताया। तब माद्री ने अश्विनकुमारों का आवाह्न किया, जिसके फलस्वरूप नकुल व सहदेव का जन्म हुआ।

13- धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी को महर्षि वेदव्यास ने सौ पुत्रों की माता होने का वरदान दिया था। समय आने पर गांधारी को गर्भ ठहरा लेकिन वह दो वर्ष तक पेट में रुका रहा। घबराकर गांधारी ने गर्भ गिरा दिया। उसके पेट से लोहे के गोले के समान एक मांस पिंड निकला। तब महर्षि वेदव्यास वहां पहुंचे और उन्होंने कहा कि तुम सौ कुण्ड बनवाकर उन्हें घी से भर दो और उनकी रक्षा के लिए प्रबंध करो। इसके बाद महर्षि वेदव्यास ने गांधारी को उस मांस पिण्ड पर ठंडा जल छिड़कने के लिए कहा। जल छिड़कते ही उस मांस पिण्ड के 101 टुकड़े हो गए।

14- महर्षि की आज्ञानुसार गांधारी ने उन सभी मांस पिंडों को घी से भरे कुंडों में रख दिया। फिर महर्षि ने कहा कि इन कुण्डों को दो साल के बाद खोलना। समय आने पर उन कुण्डों से पहले दुर्योधन का जन्म हुआ और उसके बाद अन्य गांधारी पुत्रों का। जिस दिन दुर्योधन का जन्म हुआ था उसी दिन भीम का भी जन्म हुआ था।

15- जन्म लेते ही दुर्योधन गधे की तरह रेंकने लगा। उसका शब्द सुनकर गधे, गीदड़, गिद्ध और कौए भी चिल्लाने लगे, आंधी चलने लगी, कई स्थानों पर आग लग गई। यह देखकर विदुर ने राजा धृतराष्ट्र से कहा कि आपका यह पुत्र निश्चित ही कुल का नाश करने वाला होगा अत: आप इस पुत्र का त्याग कर दीजिए लेकिन पुत्र स्नेह के कारण धृतराष्ट्र ऐसा नहीं कर पाए।

16- गांधारी का सबसे बड़ा पुत्र था - दुर्योधन। उसके बाद दु:शासन, दुस्सह, दुश्शल, जलसंध, सम, सह, विंद, अनुविंद, दुद्र्धर्ष, सुबाहु, दुष्प्रधर्षण, दुर्मुर्षण, दुर्मुख, दुष्कर्ण, कर्ण, विविंशति, विकर्ण, शल, सत्व,सुलोचन, चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, चारुचित्र, शरासन, दुर्मुद, दुर्विगाह, विवित्सु, विकटानन, ऊर्णनाभ, सुनाभ, नंद, उपनंद, चित्रबाण, चित्रवर्मा, सुवर्मा, दुर्विमोचन, आयोबाहु, महाबाहु,चित्रांग, चित्रकुंडल, भीमवेग, भीमबल, बलाकी, बलवद्र्धन, उग्रायुध, सुषेण, कुण्डधार, महोदर, चित्रायुध, निषंगी, पाशी, वृंदारक, दृढ़वर्मा, दृढ़क्षत्र, सोमकीर्ति, अनूदर, दृढ़संध, जरासंध,सत्यसंध, सद:सुवाक, उग्रश्रवा, उग्रसेन, सेनानी, दुष्पराजय, अपराजित, कुण्डशायी, विशालाक्ष, दुराधर, दृढ़हस्त, सुहस्त, बातवेग, सुवर्चा, आदित्यकेतु, बह्वाशी, नागदत्त, अग्रयायी, कवची, क्रथन,कुण्डी, उग्र, भीमरथ, वीरबाहु, अलोलुप, अभय, रौद्रकर्मा, दृढऱथाश्रय, अनाधृष्य, कुण्डभेदी, विरावी, प्रमथ, प्रमाथी, दीर्घरोमा, दीर्घबाहु, महाबाहु, व्यूढोरस्क, कनकध्वज, कुण्डाशी, और विरजा।

17- 100 पुत्रों के अलावा गांधारी की एक पुत्री भी थी जिसका नाम दुुश्शला था, इसका विवाह राजा जयद्रथ के साथ हुआ था।

18 - कौरवों के अतिरिक्त धृतराष्ट्र का एक पुत्र और था, उसका नाम युयुत्सु था। जिस समय गांधारी गर्भवती थी और धृतराष्ट्र की सेवा करने में असमर्थ थी। उन दिनों एक वैश्य कन्या ने धृतराष्ट्र की सेवा की, उसके गर्भ से उसी साल युयुस्तु नामक पुत्र हुआ था। वह बहुत ही यशस्वी और विचारशील था।

19 - एक बार दुर्योधन ने धोखे से भीम को विष खिलाकर गंगा नदी में फेंक दिया। बेहोशी की अवस्था में भीम बहते हुए नागलोक पहुंच गए। वहां विषैले नागों ने भीम को खूब डंसा, जिससे भीम के शरीर का जहर कम हो गया और वे होश में आ गए और नागों को पटक-पटक कर मारने लगे। यह सुनकर नागराज वासुकि स्वयं भीम के पास आए। उनके साथी आर्यक नाग में भीमसेन को पहचान लिया। आर्यक नाग भीमसेन के नाना का नाना था। आर्यक नाग ने प्रसन्न होकर भीम को हजारों हाथियों का बल प्रदान करने वाले कुंडों का रस पिलाया, जिससे भीमसेन और भी शक्तिशाली हो गए।

20 - पांडवों के कुलगुरु कृपाचार्य थे। इनके पिता का नाम शरद्वान था, वे महर्षि गौतम के पुत्र थे। महर्षि शरद्वान ने घोर तपस्या कर दिव्य अस्त्र प्राप्त किए और धनुर्वेद में निपुणता प्राप्त की। यह देखकर देवराज इंद्र भी घबरा गए और उन्होंने शरद्वान की तपस्या तोडऩे के लिए जानपदी नाम की अप्सरा भेजी। इस सुंदरी को देखकर महर्षि शरद्वान का वीर्यपात हो गया। उनका वीर्य सरकंड़ों पर गिरा वह दो भागों में बंट गया। उससे एक कन्या और एक बालक उत्पन्न हुआ। वही बालक कृपाचार्य बना और कन्या कृपी के नाम से प्रसिद्ध हुई।

21 - गुरु द्रोणाचार्य महर्षि भरद्वाज के पुत्र थे। एक बार वे सुबह गंगा स्नान करने गए, वहां उन्होंने घृताची नामक अप्सरा को जल से निकलते देखा। यह देखकर उनके मन में विकार आ गया और उनका वीर्य स्खलित होने लगा। यह देखकर उन्होंने अपने वीर्य को द्रोण नामक एक बर्तन में संग्रहित कर लिया। उसी में से द्रोणाचार्य का नाम हुआ।

22 - गुरु द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी से हुआ। कृपी के गर्भ से अश्वत्थामा का जन्म हुआ। उसने जन्म लेते ही अच्चै:श्रवा अश्व के समान शब्द किया, इसी कारण उसका नाम अश्वत्थामा हुआ। वह महादेव, यम, काल और क्रोध के सम्मिलित अंश से उत्पन्न हुआ था।

23 - जब द्रोणाचार्य शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तब उन्हें पता चला कि भगवान परशुराम ब्राह्मणों को अपना सर्वस्व दान कर रहे हैं। द्रोणाचार्य भी उनके पास गए और अपना परिचय दिया। द्रोणाचार्य ने भगवान परशुराम से उनके सभी दिव्य अस्त्र-शस्त्र मांग लिए और उनका प्रयोग, रहस्य व उपसंहार की विधि भी सीख ली।

24 - द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामा को अधिक प्रेम करते थे। उन्होंने शिष्यों को पानी लाने के लिए जो बर्तन दिए थे, उनमें औरों के तो देर से भरते लेकिन अश्वत्थामा का बर्तन सबसे पहले भर जाता, जिससे वह अपने पिता के पास पहले पहुंचकर गुप्त रहस्य सीख लेता। यह बात अर्जुन ने ताड़ ली। अब वह वारुणास्त्र से अपना बर्तन झटपट भरकर द्रोणाचार्य के पास पहुंच जाता। यही कारण था कि अर्जुन और अश्वत्थामा की शिक्षा एक समान हुई।

25 - पांडव जब युवा हुए थे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। यह देखकर दुर्योधन ने उन्हें मारने की योजना बनाई और वारणावत नामक स्थान पर अपने मंत्री पुरोचन से एक महल बनवाया। वह महल सन, राल व लकड़ी से बना था जिससे की वह पलभर में जलकर राख हो जाए। दुर्योधन ने किसी तरह पांडवों को वहां जाने के लिए राजी कर लिया।

26 - जब पाण्डव वारणावत जाने लगे तो विदुरजी ने युधिष्ठिर को सांकेतिक भाषा में उस महल का रहस्य युधिष्ठिर को बता दिया और उससे बचने के उपाय भी दिए। विदुरजी की सारी बात युधिष्ठिर ने अच्छी तरह से समझ ली। तब विदुरजी हस्तिनापुर लौट गए। यह घटना फाल्गुन शुक्ल अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र की है।

27 - पांडव एक साल तक वारणावत नगर में रहे। एक दिन कुंती ने ब्राह्ण भोज कराया। जब सब लोग खा-पीकर चले गए तो वहां एक भील स्त्री अपने पांच पुत्रों के साथ भोजन मांगने आई और वे सब उस रात वहीं सो गए। उसी रात भीम ने स्वयं महल में आग लगा दी और गुप्त रास्ते से बाहर निकल गए। लोगों ने जब सुबह भील स्त्री और अन्य पांच शव देखे तो उन्हें लगा कि पांडव कुंती सहित जल कर मर गए हैं।
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रविवार, 7 जनवरी 2018

पत्नी को वश में करने के लिए वशीकरण मन्त्र-Wife love spells to tame

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किसी भी स्त्री या अपनी पत्नी को काबू करने के लिए मन्त्र -पत्नी को वश में करने के लिए वशीकरण मन्त्र-Wife love spells to tame
कहा जाता है दया की मूर्त है स्त्री पापनाशिनी है साक्षात् जगदम्बा है पर आज के इस आधुनिक युग में भी लोग अपनी बहु बेटियों को दहेज़ के लिए परेशान करते है ! ऐसे लोगो के लिए गुरु गोविन्द सिंह जी ने लिखा है !
पत्नी का वशीकरण मन्त्र  .....Captivate mantra wife .पत्नी को वश में करना ,पत्नी को समझना -काबू करना -काबू में रखना -वश में करना -नीबू से वशीकरण आसान वशीकरण मंत्र नाम से वशीकरण के उपाय फोटो से वशीकरण कैसे करे पानी से वशीकरण लौंग से वशीकरण कैसे करे स्त्री वशीकरण उपाय निम्बू से वशीकरण पत्नी को वश में करने का उपाय पत्नी को वश में करना स्त्री वशीकरण उपाय स्त्री वशीकरण तंत्र स्त्री वशीकरण करने के उपाय पति वशीकरण टोटके वशीकरण के आसान उपाय स्त्री वशीकरण मंत्र हिंदी में किसी को वश में करने के तरीके मोहनी टोटके ladki patane ka mantra hindi mein ladki ko vash me karne ka jadu ladki patane ke 101 tarike hindi स्त्री वशीकरण करने के उपाय काला जादू वशीकरण मंत्र वशीकरण के अचूक टोटके

धी भैन का पैसा खाए कहे गोविन्द सिंह यम धक्के खाए “
जो इन्सान दाज दहेज़ के लिए अपनी बहु बेटियों को परेशान करता है उसे यमराज के यमदूतो की मार खानी पड़ेगी ! दहेज़ के डर से कुछ लोग बेटियों को गर्भ में ही मार देते है ! पंजाब के इतिहासिक शहर फतेहगढ़ साहिब में सबसे अधिक भ्रूण हत्या होती है ! मेरे गुरुदेव ने मुझे एक ऐसी औषधि बनाना सिखाया है जिसे खाने के बाद स्त्री को केवल लड़का ही होता है और यदि एक बार वो दवाई किसी स्त्री को खिला दी जाये तो अगले तीन गर्भ तक पुत्र संतान ही होती है पर मै यह दवाई किसी को नहीं देता क्योंकि पंजाब में हर 1000 लडको के पीछे केवल 726 लडकिया है ! मै नहीं चाहता कि यह औसत और कम हो जाये !
आज के समय में यदि पुरुष बुरे है तो स्त्रिया भी कम नहीं कोई जमाना था जब लड़की अपने पति को ईश्वर मानती थी पर आज के समय में तो लोग ईश्वर को ईश्वर नहीं मानते तो बेचारे पति कि क्या औकात है ! हररोज किसी न किसी भाई की मेल आती है कि मेरी पत्नी मुझे छोड़कर चली गयी ! मेरी पत्नी ने मुझ पर 498 A का दहेज़ उत्पीडन का केस दर्ज करवा दिया है ! ऐसे भाईओं से मै सिर्फ इतना ही कहूँगा “” गाय माता होती है पर जब वो सिंग मारती है तो उसके सिंग तोड़ दिए जाते है “” आप भी ऐसा ही करे ! हमारे देश में एक और बहुत बड़ी समस्या है प्रेम केवल कविताओ और किताबो में ही अच्छा लगता है ! हमारे देश में यदि कोई सच्च में प्रेम करना चाहे तो समाज उसके खिलाफ खड़ा हो जाता है ! हमारा समाज चाहता है कि आज के समय में भी हीर और सोहनी जैसी सुंदर लडकिया पैदा हो पर हमारे घर में नहीं हमारे पडोसी के घर में पैदा हो ! ऐसे गंदे समाज की मै बिलकुल फ़िक्र नहीं करता जो कृष्ण की उपासना तो करता है पर प्रेम को बहुत बुरा मानता है !
ऐसे सभी आशिक भाई जो प्रेम में असफल हो चुके है और ऐसे भाई जो अपनी पत्नी से परेशान है उनके लिए मै एक साधना दे रहा हूँ पर इस साधना का प्रेम और वशीकरण के लिए दुरूपयोग न करे और मुझसे इस साधना का अपना अनुभव न पूछे !
|| मन्त्र  ||
जंगल की योगिनी पाताल के नाग
उठो मेरे वीरो …………….. को ल्याओ हमारे पास
यहाँ यहाँ हमारे सहाई
अब नाज़ भरी ताज भरी अग्नि तक फूक फिरो
मन विसरे मेरे गुरु गोरखनाथ की दुहाई !
||  विधि  ||
इस मन्त्र का ग्रहण काल में जप करे ! ग्रहण काल में जप करने से यह मन्त्र सिद्ध हो जायेगा !
||  प्रयोग विधि ||
जब किसी स्त्री पर प्रयोग करना हो तो उस स्त्री का नाम खाली स्थान पर कह दे और 21 दिन तक हररोज 1 माला जप करे ! वो स्त्री जरूर वशीभूत होकर दौड़ी चली आएगी !
इस मन्त्र का दुरूपयोग न करे ! मेरा विश्वास है यह प्रयोग करने के बाद आपके जीवन में बदलाव जरूर आएगा !

सोमवार, 1 जनवरी 2018

जाने इस्लाम (मुस्लिम) धर्म के बारे में -।know about islam(muslim)

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क्या है इस्लाम का इतिहास-
आमतौर पर यह समझा जाता है कि इस्लाम 1400 वर्ष पुराना धर्म है, और इसके ‘प्रवर्तक’ पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) हैं। लेकिन वास्तव में इस्लाम 1400 वर्षों से काफ़ी पुराना धर्म है; उतना ही पुराना जितना धर्ती पर स्वयं मानवजाति का इतिहास और हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) इसके प्रवर्तक (Founder) नहीं, बल्कि इसके आह्वाहक हैं। आपका काम उसी चिरकालीन (सनातन) धर्म की ओर, जो सत्यधर्म के रूप में आदिकाल से ‘एक’ ही रहा है, लोगों को बुलाने, आमंत्रित करने और स्वीकार करने के आह्वान का था। आपका मिशन, इसी मौलिक मानव धर्म को इसकी पूर्णता के साथ स्थापित कर देना था ताकि मानवता के समक्ष इसका व्यावहारिक रूप साक्षात् रूप में आ जाए।

जाने इस्लाम (मुस्लिम) धर्म के बारे में -।know about islam(muslim) जाने इस्लाम (मुस्लिम) धर्म के बारे में -।know about islam(muslim)-हिन्दू धर्म की स्थापना इस्लाम की सच्चाई इस्लाम का उदय इस्लाम में नारी इस्लाम का अंत कब होगा इस्लाम की असलियत इस्लाम का सच इस्लाम का पूरा सच  इस्लाम का अंत-इस्लाम का सच-इस्लाम का इतिहास-इस्लामिक स्टेट-ईसाई धर्म-हिन्दू-कुरान-isis-मुस्लिम-औरतो का खतना-मुस्लिम लडकियाँ-मुस्लिम धर्म-मुस्लिम इतिहास-मुस्लिम नाम-मुस्लिम लीग-हिन्दू-पाकिस्तान-जाने इस्लाम (मुस्लिम) धर्म के बारे में ।know about islam(muslim) इस्लाम का उदय इस्लाम की सच्चाई इस्लाम में नारी हिन्दू धर्म की स्थापना इस्लाम का सच इस्लाम का अंत कब होगा इस्लाम का पूरा सच इस्लाम धर्म का सच इस्लाम धर्म के संस्थापक  इस्लाम का अंत  इस्लाम धर्म का सच  इस्लाम की सच्चाई  इस्लाम की असलियत  इस्लाम क्या है  इस्लाम में नारी  मुहम्मद साहब का इतिहास
इस्लाम का इतिहास जानने का अस्ल माध्यम स्वयं इस्लाम का मूल ग्रंथ ‘क़ुरआन’ है। और क़ुरआन, इस्लाम का आरंभ प्रथम  मनुष्य ‘आदम’ से होने का ज़िक्र करता है। इस्लाम धर्म के अनुयायियों के लिए क़ुरआन ने ‘मुस्लिम’ शब्द का प्रयोग हज़रत इबराहीम (अलैहि॰) के लिए किया है जो लगभग 4000 वर्ष पूर्व एक महान पैग़म्बर (सन्देष्टा) हुए थे। हज़रत आदम (अलैहि॰) से शुरू होकर हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) तक हज़ारों वर्षों पर फैले हुए इस्लामी इतिहास में असंख्य ईशसंदेष्टा ईश्वर के संदेश के साथ, ईश्वर द्वारा विभिन्न युगों और विभिन्न क़ौमों में नियुक्त किए जाते रहे। उनमें से 26 के नाम कु़रआन में आए हैं और बाक़ी के नामों का वर्णन नहीं किया गया है। इस अतिदीर्घ श्रृंखला में हर ईशसंदेष्टा ने जिस सत्यधर्म का आह्वान दिया वह ‘इस्लाम’ ही था; भले ही उसके नाम विभिन्न भाषाओं में विभिन्न रहे हों। बोलियों और भाषाओं के विकास का इतिहास चूंकि क़ुरआन ने बयान नहीं किया है इसलिए ‘इस्लाम’ के नाम विभिन्न युगों में क्या-क्या थे, यह ज्ञात नहीं है।

इस्लामी इतिहास के आदिकालीन होने की वास्तविकता समझने के लिए स्वयं ‘इस्लाम’ को समझ लेना आवश्यक है। 

इस्लाम क्या है, यह कुछ शैलियों में क़ुरआन के माध्यम से हमारे सामने आता है, जैसे:-

1. इस्लाम, अवधारणा के स्तर पर ‘विशुद्ध एकेश्वरवाद’ का नाम है। यहां ‘विशुद्ध’ से अभिप्राय है: ईश्वर के व्यक्तित्व, उसकी सत्ता व प्रभुत्व, उसके अधिकारों (जैसे उपास्य व पूज्य होने के अधिकार आदि) में किसी अन्य का साझी न होना। विश्व का...बल्कि पूरे ब्रह्माण्ड और अपार सृष्टि का यह महत्वपूर्ण व महानतम सत्य मानवजाति की उत्पत्ति से लेकर उसके हज़ारों वर्षों के इतिहास के दौरान अपरिवर्तनीय, स्थायी और शाश्वत रहा है।

2. इस्लाम शब्द का अर्थ ‘शान्ति व सुरक्षा’ और ‘समर्पण’ है। इस प्रकार इस्लामी परिभाषा में इस्लाम नाम है, ईश्वर के समक्ष, मनुष्यों का पूर्ण आत्मसमर्पण; और इस आत्मसमर्पण के द्वारा व्यक्ति, समाज तथा मानवजाति के द्वारा ‘शान्ति व सुरक्षा’ की उपलब्धि का। यह अवस्था आरंभ काल से तथा मानवता के इतिहास हज़ारों वर्ष लंबे सफ़र तक, हमेशा मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता रही है।

3- इस्लाम की वास्तविकता, एकेश्वरवाद की हक़ीक़त, इन्सानों से एकेश्वरवाद के तक़ाज़े, मनुष्य और ईश्वर  के बीच अपेक्षित संबंध, इस जीवन के पश्चात (मरणोपरांत) जीवन की वास्तविकता आदि जानना एक शान्तिमय, सफल तथा समस्याओं, विडम्बनाओं व त्रासदियों से रहित जीवन बिताने के लिए हर युग में अनिवार्य रहा है; अतः ईश्वर ने हर युग में अपने सन्देष्टा (ईशदूत, नबी, रसूल, पैग़म्बर) नियुक्त करने (और उनमें से कुछ पर अपना ‘ईशग्रंथ’ अवतरित करने) का प्रावधान किया है। इस प्रक्रम का इतिहास, मानवजाति के पूरे इतिहास पर फैला हुआ है।

4. शब्द ‘धर्म’ (Religion) को, इस्लाम के लिए क़ुरआन ने शब्द ‘दीन’ से अभिव्यक्त किया है। क़ुरआन में कुछ ईशसन्देष्टाओं के हवाले से कहा गया है (42:13) कि ईश्वर ने उन्हें आदेश दिया कि वे ‘दीन’ को स्थापित (क़ायम) करें और इसमें भेद पैदा न करें, इसे (अनेकानेक धर्मों के रूप में) टुकड़े-टुकड़े न करें।

इससे सिद्ध हुआ कि इस्लाम ‘दीन’ हमेशा से ही रहा है। उपरोक्त संदेष्टाओं में हज़रत नूह (Noah) का उल्लेख भी हुआ है और हज़रत नूह (अलैहि॰) मानवजाति के इतिहास के आरंभिक काल के ईशसन्देष्टा हैं। क़ुरआन की उपरोक्त आयत (42:13) से यह तथ्य सामने आता है कि अस्ल ‘दीन’ (इस्लाम) में भेद, अन्तर, विभाजन, फ़र्क़ आदि करना सत्य-विरोधी है-जैसा कि बाद के ज़मानों में ईशसन्देष्टाओं का आह्वान व शिक्षाएं भुलाकर, या उनमें फेरबदल, कमी-बेशी, परिवर्तन-संशोधन करके इन्सानों ने अनेक विचारधाराओं व मान्यताओं के अन्तर्गत ‘बहुत से धर्म’ बना लिए।

मानव प्रकृति प्रथम दिवस से आज तक एक ही रही है। उसकी मूल प्रवृत्तियों में तथा उसकी मौलिक आध्यात्मिक, नैतिक, भौतिक आवश्यकताओं में कोई भी परिवर्तन नहीं आया है। अतः मानव का मूल धर्म भी मानवजाति के पूरे इतिहास में उसकी प्रकृति व प्रवृत्ति के ठीक अनुकूल ही होना चाहिए। इस्लाम इस कसौटी पर पूरा और खरा उतरता है। इसकी मूल धारणाएं, शिक्षाएं, आदेश, नियम...सबके सब मनुष्य की प्रवृत्ति व प्रकृति के अनुकूल हैं।

अतः यही मानवजाति का आदिकालीन तथा शाश्वत धर्म है।

क़ुरआन ने कहीं भी हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) को ‘इस्लाम धर्म का प्रवर्तक’ नहीं कहा है। क़ुरआन में हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) का परिचय नबी (ईश्वरीय ज्ञान की ख़बर देने वाला), रसूल (मानवजाति की ओर भेजा गया), रहमतुल्-लिल-आलमीन (सारे संसारों के लिए रहमत व साक्षात् अनुकंपा, दया), हादी (सत्यपथ-प्रदर्शक) आदि शब्दों से कराया है।

स्वयं पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने इस्लाम धर्म के ‘प्रवर्तक’ होने का न दावा किया, न इस रूप में अपना परिचय कराया। आप (सल्ल॰) के एक कथन के अनुसार ‘इस्लाम के भव्य भवन में एक ईंट की कमी रह गई थी, मेरे (ईशदूतत्व) द्वारा वह कमी पूरी हो गई और इस्लाम अपने अन्तिम रूप में सम्पूर्ण हो गया’ (आपके कथन का भावार्थ।) इससे सिद्ध हुआ कि आप (सल्ल॰) इस्लाम धर्म के प्रवर्तक नहीं हैं। (इसका प्रवर्तक स्वयं अल्लाह है, न कि कोई भी पैग़म्बर, रसूल, नबी आदि)। और आप (सल्ल॰) ने उसी इस्लाम का आह्वान किया जिसका, इतिहास के हर चरण में दूसरे रसूलों ने किया था। इस प्रकार इस्लाम का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना मानवजाति और उसके बीच नियुक्त होने वाले असंख्य रसूलों के सिलसिले (श्रृंखला) का इतिहास।

यह ग़लतफ़हमी फैलने और फैलाने में, कि इस्लाम धर्म की उम्र कुल 1400 वर्ष है दो-ढाई सौ वर्ष पहले लगभग पूरी दुनिया पर छा जाने वाले यूरोपीय (विशेषतः ब्रिटिश) साम्राज्य की बड़ी भूमिका है। ये साम्राज्यी, जिस ईश-सन्देष्टा (पैग़म्बर) को मानते थे ख़ुद उसे ही अपने धर्म का प्रवर्तक बना दिया और उस पैग़म्बर के अस्ल ईश्वरीय धर्म को बिगाड़ कर, एक नया धर्म उसी पैग़म्बर के नाम पर बना दिया। (ऐसा इसलिए किया कि पैग़म्बर के आह्वाहित अस्ल ईश्वरीय धर्म के नियमों, आदेशों, नैतिक शिक्षाओं और हलाल-हराम के क़ानूनों की पकड़ (Grip) से स्वतंत्र हो जाना चाहते थे, अतः वे ऐसे ही हो भी गए।) यही दशा इस्लाम की भी हो जाए, इसके लिए उन्होंने इस्लाम को ‘मुहम्मडन-इज़्म (Muhammadanism)’ का और मुस्लिमों को ‘मुहम्मडन्स (Muhammadans)’ का नाम दिया जिससे यह मान्यता बन जाए कि मुहम्मद ‘इस्लाम के प्रवर्तक (Founder)’ थे और इस प्रकार इस्लाम का इतिहास केवल 1400 वर्ष पुराना है। न क़ुरआन में, न हदीसों (पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल॰ के कथनों) में, न इस्लामी इतिहास-साहित्य में, न अन्य इस्लामी साहित्य में...कहीं भी इस्लाम के लिए ‘मुहम्मडन-इज़्म’ शब्द और इस्लाम के अनुयायियों के लिए ‘मुहम्मडन’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, लेकिन साम्राज्यिों की सत्ता-शक्ति, शैक्षणिक तंत्र और मिशनरी-तंत्र के विशाल व व्यापक उपकरण द्वारा, उपरोक्त मिथ्या धारणा प्रचलित कर दी गई।

भारत के बाशिन्दों में इस दुष्प्रचार का कुछ प्रभाव भी पड़ा, और वे भी इस्लाम को ‘मुहम्मडन-इज़्म’ मान बैठे। ऐसा मानने में इस तथ्य का भी अपना योगदान रहा है कि यहां पहले से ही सिद्धार्थ गौतम बुद्ध जी, ‘‘बौद्ध धर्म’’ के; और महावीर जैन जी ‘‘जैन धर्म’’ के ‘प्रवर्तक’ के रूप में सर्वपरिचित थे। इन ‘धर्मों’ (वास्तव में ‘मतों’) का इतिहास लगभग पौने तीन हज़ार वर्ष पुराना है। इसी परिदृश्य में भारतवासियों में से कुछ ने पाश्चात्य साम्राज्यिों की बातों (मुहम्मडन-इज़्म, और इस्लाम का इतिहास मात्र 1400 वर्ष की ग़लत अवधारणा) पर विश्वास कर लिया।
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महाभारत के रहस्यमय और अमर किरदार जो अब तक जिन्दा है - Mahabharata still alive immortal character

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जिस व्यक्ति ने जन्म लिया है उसकी मृत्यु अवश्य होगी गीता में भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही ज्ञान दिया था कि सिर्फ आत्मा अमर है और यह निश्चित समय के लिए अलग-अलग शरीर धारण करती है ये शरीर नश्वर है मगर  शास्त्रों में आठ ऐसे लोग भी बताए गए हैं जिन्होंने जन्म लिया है और वे हजारों सालों से देह धारण किए हुए हैं यानी वे अभी भी सशरीर जीवित हैं- 


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आपने सुना भी होगा कि महाभारत काल का अश्वथामा भी अभी तक जीवित है। श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था-


हनुमान -  

कलियुग में हनुमानजी सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता माने गए हैं और हनुमानजी भी इन अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं। सीता ने हनुमान को लंका की अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनने के बाद आशीर्वाद दिया था कि वे अजर-अमर रहेंगे। अजर-अमर का अर्थ है कि जिसे ना कभी मौत आएगी और ना ही कभी बुढ़ापा। इस कारण भगवान हनुमान को हमेशा शक्ति का स्रोत माना गया है क्योंकि वे चीरयुवा हैं- 

कृपाचार्य- 

महाभारत के अनुसार कृपाचार्य कौरवों और पांडवों के कुलगुरु थे। कृपाचार्य गौतम ऋषि पुत्र हैं और इनकी बहन का नाम है कृपी। कृपी का विवाह द्रोणाचार्य से हुआ था। कृपाचार्य, अश्वथामा के मामा हैं। महाभारत युद्ध में कृपाचार्य ने भी पांडवों के विरुद्ध कौरवों का साथ दिया था- 

अश्वथामा- 

ग्रंथों में भगवान शंकर के अनेक अवतारों का वर्णन भी मिलता है। उनमें से एक अवतार ऐसा भी है, जो आज भी पृथ्वी पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहा है। ये अवतार हैं गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का। द्वापरयुग में जब कौरव व पांडवों में युद्ध हुआ था, तब अश्वत्थामा ने कौरवों का साथ दिया था। महाभारत के अनुसार अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के सम्मिलित अंशावतार थे। अश्वत्थामा अत्यंत शूरवीर, प्रचंड क्रोधी स्वभाव के योद्धा थे। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने ही अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था।

अश्वत्थामा के संबंध में एक प्रचलित मान्यता भी है भारत में मध्य प्रदेश के बुरहानपुर शहर से 20 किलोमीटर दूर एक किला है। इसे असीरगढ़ का किला कहते हैं। इस किले में भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है। यहां के स्थानीय निवासियों का कहना है कि अश्वत्थामा प्रतिदिन इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आते हैं- 

ऋषि मार्कण्डेय- 


भगवान शिव के परम भक्त हैं ऋषि मार्कण्डेय। इन्होंने शिवजी को तप कर प्रसन्न किया और महामृत्युंजय मंत्र सिद्धि के कारण चिरंजीवी बन गए-

विभीषण- 

राक्षस राज रावण के छोटे भाई हैं विभीषण। विभीषण श्रीराम के अनन्य भक्त हैं। जब रावण ने माता सीता हरण किया था, तब विभीषण ने रावण को श्रीराम से शत्रुता न करने के लिए बहुत समझाया था। इस बात पर रावण ने विभीषण को लंका से निकाल दिया था। विभीषण श्रीराम की सेवा में चले गए और रावण के अधर्म को मिटाने में धर्म का साथ दिया-

राजा बलि- 

शास्त्रों के अनुसार राजा बलि भक्त प्रहलाद के वंशज हैं। बलि ने भगवान विष्णु के वामन अवतार को अपना सब कुछ दान कर दिया था। इसी कारण इन्हें महादानी के रूप में जाना जाता है। राजा बलि से श्रीहरि अतिप्रसन्न थे। इसी वजह से श्री विष्णु राजा बलि के द्वारपाल भी बन गए थे-

ऋषि व्यास- 

ऋषि व्यास भी अष्ट चिरंजीवी हैँ और इन्होंने चारों वेद (ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद और यजुर्वेद) का सम्पादन किया था। साथ ही, इन्होंने ही सभी 18 पुराणों की रचना भी की थी। महाभारत और श्रीमद्भागवत् गीता की रचना भी वेद व्यास द्वारा ही की गई है। इन्हें वेद व्यास के नाम से भी जाना जाता है। वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र थे। इनका जन्म यमुना नदी के एक द्वीप पर हुआ था और इनका रंग सांवला था। इसी कारण ये कृष्ण द्वैपायन कहलाए-

परशुराम- 

भगवान विष्णु के छठें अवतार हैं परशुराम। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका थीं। इनका जन्म हिन्दी पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ था। इसलिए वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली तृतीया को अक्षय तृतीया कहा जाता है। परशुराम का जन्म समय सतयुग और त्रेता के संधिकाल में माना जाता है। परशुराम ने 21 बार पृथ्वी से समस्त क्षत्रिय राजाओं का अंत किया था-परशुराम का प्रारंभिक नाम राम था। राज ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। शिवजी तपस्या से प्रसन्न हुए और राम को अपना फरसा (एक हथियार) दिया था। इसी वजह से राम परशुराम कहलाने लगे-  


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जाने कुछ रामायण के गुप्त रहस्य - Some of the Ramayana secret in hindi-

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कम लोग जानते है की श्री रामचरित मानस और रामायण में कुछ बातें अलग है जबकि कुछ बातें ऐसी है जिनका वर्णन केवल वाल्मीकि कृत रामायण में है-

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भगवान राम को समर्पित दो ग्रंथ मुख्यतः लिखे गए है एक तुलसीदास द्वारा रचित 'श्री रामचरित मानस' और दूसरा वाल्मीकि कृत 'रामायण'। इनके अलावा भी कुछ अन्य ग्रन्थ लिखे गए है पर इन सब में वाल्मीकि कृत रामायण को सबसे सटीक और प्रामाणिक माना जाता है यह महाकाव्य को भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय निधियों में से एक कहा जा सकता है-

आइये जाने दोनों रामायण के कुछ प्रसंगो में क्या विशेष अंतर है -


विशेष तथ्य :-

1- तुलसीदास द्वारा श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष को उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया, जबकि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में सीता स्वयंवर का वर्णन नहीं है। रामायण के अनुसार भगवान राम व लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिला पहुंचे थे। विश्वामित्र ने ही राजा जनक से श्रीराम को वह शिवधनुष दिखाने के लिए कहा। तब भगवान श्रीराम ने खेल ही खेल में उस धनुष को उठा लिया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। राजा जनक ने यह प्रण किया था कि जो भी इस शिव धनुष को उठा लेगा, उसी से वे अपनी पुत्री सीता का विवाह कर देंगे।


2- रामायण के अनुसार राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था। इस यज्ञ को मुख्य रूप से ऋषि ऋष्यश्रृंग ने संपन्न किया था। ऋष्यश्रृंग के पिता का नाम महर्षि विभाण्डक था। एक दिन जब वे नदी में स्नान कर रहे थे तब नदी में उनका वीर्यपात हो गया। उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था, जिसके फलस्वरूप ऋषि ऋष्यश्रृंग का जन्म हुआ था।

3- विश्व विजय करने के लिए जब रावण स्वर्ग लोक पहुंचा तो उसे वहां रंभा नाम की अप्सरा दिखाई दी। अपनी वासना पूरी करने के लिए रावण ने उसे पकड़ लिया। तब उस अप्सरा ने कहा कि आप मुझे इस तरह से स्पर्श न करें, मैं आपके बड़े भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर के लिए आरक्षित हूं।

इसलिए मैं आपकी पुत्रवधू के समान हूं,  लेकिन रावण नहीं माना और उसने रंभा से दुराचार किया। यह बात जब नलकुबेर को पता चली तो उसने रावण को श्राप दिया कि आज के बाद रावण बिना किसी स्त्री की इच्छा के उसे स्पर्श करेगा तो उसका मस्तक सौ टुकड़ों में बंट जाएगा।

4- ये बात सभी जानते हैं कि लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के नाक-कान काटे जाने से क्रोधित होकर ही रावण ने सीता का हरण किया था, लेकिन स्वयं शूर्पणखा ने भी रावण का सर्वनाश होने का श्राप दिया था। क्योंकि रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था। वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।

5- श्रीरामचरित मानस के अनुसार सीता स्वयंवर के समय भगवान परशुराम वहां आए थे, जबकि रामायण के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे, तब परशुराम वहां आए और उन्होंने श्रीराम से अपने  धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम के द्वारा बाण चढ़ा देने पर परशुराम वहां से चले गए थे।

6- वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था, तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, उसका नाम वेदवती था। वह भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण ने उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा। उस तपस्विनी ने उसी क्षण अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी। उसी स्त्री ने दूसरे जन्म में सीता के रूप में जन्म लिया।

7- जिस समय भगवान श्रीराम वनवास गए, उस समय उनकी आयु लगभग 27 वर्ष की थी। राजा दशरथ श्रीराम को वनवास नहीं भेजना चाहते थे, लेकिन वे वचनबद्ध थे। जब श्रीराम को रोकने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने श्रीराम से यह भी कह दिया कि तुम मुझे बंदी बनाकर स्वयं राजा बन जाओ।

8- अपने पिता राजा दशरथ की मृत्यु का आभास भरत को पहले ही एक स्वप्न के माध्यम से हो गया था। सपने में भरत ने राजा दशरथ को काले वस्त्र पहने हुए देखा था। उनके ऊपर पीले रंग की स्त्रियां प्रहार कर रही थीं। सपने में राजा दशरथ लाल रंग के फूलों की माला पहने और लाल चंदन लगाए गधे जुते हुए रथ पर बैठकर तेजी से दक्षिण (यम की दिशा) की ओर जा रहे थे।

9- हिंदू धर्म में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की मान्यता है, जबकि रामायण के अरण्यकांड के चौदहवे सर्ग के चौदहवे श्लोक में सिर्फ तैंतीस देवता ही बताए गए हैं। उसके अनुसार बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनी कुमार, ये ही कुल तैंतीस देवता हैं।

10- रघुवंश में एक परम प्रतापी राजा हुए थे, जिनका नाम अनरण्य था। जब रावण विश्वविजय करने निकला तो राजा अनरण्य से उसका भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में राजा अनरण्य की मृत्यु हो गई, लेकिन मरने से पहले उन्होंने रावण को श्राप दिया कि मेरे ही वंश में उत्पन्न एक युवक तेरी मृत्यु का कारण बनेगा।

11- रावण जब विश्व विजय पर निकला तो वह यमलोक भी जा पहुंचा। वहां यमराज और रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जब यमराज ने रावण के प्राण लेने के लिए कालदण्ड का प्रयोग करना चाहा तो ब्रह्मा ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया क्योंकि किसी देवता द्वारा रावण का वध संभव नहीं था।

12- सीताहरण करते समय जटायु नामक गिद्ध ने रावण को रोकने का प्रयास किया था। रामायण के अनुसार जटायु के पिता अरुण बताए गए हैं। ये अरुण ही भगवान सूर्यदेव के रथ के सारथी हैं।

13- जिस दिन रावण सीता का हरण कर अपनी अशोक वाटिका में लाया। उसी रात को भगवान ब्रह्मा के कहने पर देवराज इंद्र माता सीता के लिए खीर लेकर आए, पहले देवराज ने अशोक वाटिका में उपस्थित सभी राक्षसों को मोहित कर सुला दिया। उसके बाद माता सीता को खीर अर्पित की, जिसके खाने से सीता की भूख-प्यास शांत हो गई।

14- जब भगवान राम और लक्ष्मण वन में सीता की खोज कर रहे थे। उस समय कबंध नामक राक्षस का राम-लक्ष्मण ने वध कर दिया। वास्तव में कबंध एक श्राप के कारण ऐसा हो गया था। जब श्रीराम ने उसके शरीर को अग्नि के हवाले किया तो वह श्राप से मुक्त हो गया। कबंध ने ही श्रीराम को सुग्रीव से मित्रता करने के लिए कहा था।

15-  श्रीरामचरितमानस के अनुसार समुद्र ने लंका जाने के लिए रास्ता नहीं दिया तो लक्ष्मण बहुत क्रोधित हो गए थे, जबकि वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि लक्ष्मण नहीं बल्कि भगवान श्रीराम समुद्र पर क्रोधित हुए थे और उन्होंने समुद्र को सुखा देने वाले बाण भी छोड़ दिए थे। तब लक्ष्मण व अन्य लोगों ने भगवान श्रीराम को समझाया था।

16- सभी जानते हैं कि समुद्र पर पुल का निर्माण नल और नील नामक वानरों ने किया था। क्योंकि उसे श्राप मिला था कि उसके द्वारा पानी में फेंकी गई वस्तु पानी में डूबेगी नहीं, जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार नल देवताओं के शिल्पी (इंजीनियर) विश्वकर्मा के पुत्र थे और वह स्वयं भी शिल्पकला में निपुण था। अपनी इसी कला से उसने समुद्र पर सेतु का निर्माण किया था।

17- रामायण के अनुसार समुद्र पर पुल बनाने में पांच दिन का समय लगा। पहले दिन वानरों ने 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवे दिन 23 योजन पुल बनाया था। इस प्रकार कुल 100 योजन लंबाई का पुल समुद्र पर बनाया गया। यह पुल 10 योजन चौड़ा था। (एक योजन लगभग 13-16 किमी होता है)

18- एक बार रावण जब भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।

19- रामायण के अनुसार जब रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत उठा लिया तब माता पार्वती भयभीत हो गई थी और उन्होंने रावण को श्राप दिया था कि तेरी मृत्यु किसी स्त्री के कारण ही होगी।

20- जिस समय राम-रावण का अंतिम युद्ध चल रहा था, उस समय देवराज इंद्र ने अपना दिव्य रथ श्रीराम के लिए भेजा था। उस रथ में बैठकर ही भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था।

21- जब काफी समय तक राम-रावण का युद्ध चलता रहा तब अगस्त्य मुनि ने श्रीराम से आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ करने को कहा, जिसके प्रभाव से भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया।

22- रामायण के अनुसार रावण जिस सोने की लंका में रहता था वह लंका पहले रावण के भाई कुबेर की थी। जब रावण ने विश्व विजय पर निकला तो उसने अपने भाई कुबेर को हराकर सोने की लंका तथा पुष्पक विमान पर अपना कब्जा कर लिया।

23- रावण ने अपनी पत्नी की बड़ी बहन माया के साथ भी छल किया था। माया के पति वैजयंतपुर के शंभर राजा थे। एक दिन रावण शंभर के यहां गया। वहां रावण ने माया को अपनी बातों में फंसा लिया। इस बात का पता लगते ही शंभर ने रावण को बंदी बना लिया। उसी समय शंभर पर राजा दशरथ ने आक्रमण कर दिया। उस युद्ध में शंभर की मृत्यु हो गई। जब माया सती होने लगी तो रावण ने उसे अपने साथ चलने को कहा। तब माया ने कहा कि तुमने वासनायुक्त मेरा सतित्व भंग करने का प्रयास किया इसलिए मेरे पति की मृत्यु हो गई, अत: तुम्हारी मृत्यु भी इसी कारण होगी।

24- रावण के पुत्र मेघनाद ने जब युद्ध में इंद्र को बंदी बना लिया तो ब्रह्माजी ने देवराज इंद्र को छोडऩे को कहा। इंद्र पर विजय प्राप्त करने के कारण ही मेघनाद इंद्रजीत के नाम से विख्यात हुआ।

25- रावण जब विशव विजय पर निकला तब वह यमलोक भी जा पहुंचा।  वहां रावण और यमराज के बीच भयंकर युद्ध हुआ।  जब यमराज ने कालदंड के प्रयोग द्वारा रावण के प्राण लेने चाहे तो ब्रह्मा ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया क्योंकि किसी देवता द्वारा रावण का वध संभव नहीं था।

26- वाल्मीकि रामायण में 24 हज़ार श्लोक, 500 उपखण्ड, तथा सात कांड है।
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बुधवार, 20 दिसंबर 2017

हिन्दू धर्म के अनुसार हमारा का जन्म कैसे हुआ हम कहा से आये-According to Hinduism, we were born, how we came to the

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सृष्टि के आदिकाल में न सत् था न असत्, न वायु थी न आकाश, न मृत्यु थी न अमरता, न रात थी न दिन, उस समय केवल वही था, जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी शक्ति से सांस ले रहा था। उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।’ ‘ब्रह्म वह है, जिसमें से संपूर्ण सृष्टि और आत्माओं की उत्पत्ति हुई है या जिसमें से ये फूट पड़े हैं। विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का कारण ब्रह्म है।’ -(ऋग्वेद, उपनिषद)
हिन्दू ग्रंथो के अनुसार मानव का जनम,केसे जाने ज्ञान /According to Hindu scriptures of human birth, how the knowledge,इन्सान का जन्म ,पहला इन्सान ,पहला मानव ,कहा से आया ,हम कोण है ,हम कहा से आये है --kaise hui aadmi ki utpatti-मानव की उत्पत्ति-पृथ्वी का अंत-मानव की उत्पत्ति का इतिहास-मानव का इतिहास-पृथ्वी का निर्माण-पृथ्वी अ का इतिहास-पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति-मानव का विकास-हिन्दू धर्म के अनुसार हमारा का जन्म कैसे हुआ हम कहा से आये-According to Hinduism, we were born, how we came to the इंसान की उत्पत्ति मनुष्य कैसे बना manav ki पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति कैसे हुई धरती का पहला मानव कौन था?  मानव की उत्पत्ति और विकास धरती का पहला मानव कौन था मनुष्य कैसे बना पृथ्वी की उत्पत्ति video पृथ्वी की उत्पत्ति video download मानव का इतिहास पृथ्वी का निर्माण मनुष्य का जन्म कैसे हुआ


ब्रह्म से आत्मा। आत्मा से जगत की उत्पत्ति हुई। महर्षि अरविंद ने अपनी किताब ‘दिव्य जीवन’ में इस संबंध में बहुत अच्छे से लिखा है। उन्होंने जहां पुराणों के अनुसार धरती पर जीवन की उत्पत्ति, विकास और उत्थान के बारे में बताया है वहीं उन्होंने वेदों की पंचकोशों की धारणा को विज्ञान की कसौटी पर कसा है।
जब धरती ठंडी होने लगी तो उस पर बर्फ और जल का साम्राज्य हो गया। तब धरती पर जल ही जल हो गया। इस जल में ही जीवन की उत्पत्ति हुई। आत्मा ने ही खुद को जलरूप में व्यक्त किया। इस जलरूप ने ही करोड़ों रूप धरे। जल का यह रूप हिरण्यगर्भ में जन्मा अर्थात जल के गर्भ में जन्मा।
सर्वप्रथम : सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ से अंडे के रूप का एक मुख प्रकट हुआ। मुख से वाक् इन्द्री, वाक् इन्द्री से ‘अग्नि’ उत्पन्न हुई। तदुपरांत नाक के छिद्र प्रकट हुए। नाक के छिद्रों से ‘प्राण’ और प्राण से ‘वायु’ उत्पन्न हुई। फिर नेत्र उत्पन्न हुए। नेत्रों से चक्षु (देखने की शक्ति) प्रकट हुए और चक्षु से ‘आदित्य’ प्रकट हुआ। फिर ‘त्वचा’, त्वचा से ‘रोम’ और रोमों से वनस्पति-रूप ‘औषधियां’ प्रकट हुईं। उसके बाद ‘हृदय’, ‘हृदय’ से ‘मन, ‘मन से ‘चन्द्र’ उदित हुआ। तदुपरांत नाभि, नाभि से ‘अपान’ और अपान से ‘मृत्यु’ का प्रादुर्भाव हुआ। फिर ‘जननेन्द्रिय, ‘जननेन्द्रिय से ‘वीर्य’ और ‘वीर्य’ से ‘आप:’ (जल या सृजनशीलता) की उत्पत्ति हुई।
यहां वीर्य से पुन: ‘आप:’ की उत्पत्ति कही गई है। यह आप: ही सृष्टिकर्ता का आधारभूत प्रवाह है। वीर्य से सृष्टि का ‘बीज’ तैयार होता है। उसी के प्रवाह में चेतना-शक्ति पुन: आकार ग्रहण करने लगती है। सर्वप्रथम यह चेतना-शक्ति हिरण्य पुरुष के रूप में सामने आई।
अति सूक्ष्म रूप में जीवन की उत्पत्ति के बाद मोटेतौर पर वनस्पत्तियों, लताओं और फिर वृक्षों की उत्पत्ति हुई। इस क्रम में आगे चलकर एककोशीय और फिर बहुकोशीय जीवों की उत्पत्ति हुई।
कुछ ऐसे जीव उत्पन्न हुए जिसमें हड्डी न होती थी तथा ये किसी पतले इमली, नीम के पत्ते की तरह होते थे। प्रारंभ में ये सभी जल के भीतर की भूमि से जुड़े रहते थे। ऐसे जीव जो एकेंद्रीय थे अर्थात वे न देख सकते थे, न सुन सकते थे, न स्वाद ले सकते थे। बस स्पर्श ही उनकी अनुभूति थी।
इसी क्रम में आगे चलकर एक पत्तेनुमा मछली की उत्पत्ति हुई। फिर मछली ने कई रूप धरे। हिन्दू धर्म में मछली को पवित्र जलचर जंतु माना जाता है। जल के अंदर मछली की उत्पत्ति सबसे बड़ी घटना थी। संभवत: यह घटना 3 अरब वर्ष पहले की है।
वराह काल और कच्छप काल : जब वराह काल में धरती के कुछ भाग को जल से ऊपर प्रकट किया गया तो प्रारंभ में कुछ आदिकालीन शैवाल और वनस्पतियों ने धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। यही धीरे-धीरे वृक्ष का आकार लेने लगी।
इन छोटी-छोटी घासों के पीछे आए उभयचर प्राणी, कीट, कीड़े और सरीसृप आदि। यही धरती पर और जल में अपनी सत्ता जमाने लगे। इनमें से कई हिंसक प्राणियों से बचने के लिए कीटों ने वृक्षों पर चढ़ना सीखा और उनमें से ही कुछ कीटों में पंख निकलने लगे और इस तरह आकाश में कीट-पतंगों की भरमार होने लगी।
इधर कई उभयचर प्राणियों में कछुआ सबसे विकसित प्राणी था और उन्हीं आदिकालीन प्रजातियों में से कुछ उड़ना सीखकर पक्षी होने लगे। कुछ धरती पर नए-नए रूप धरने लगे। सर्वप्रथम जमीन पर बसने वाले प्राणियों ने अपनी जड़ें पानी में ही जमाए रखीं, उसी तरह जिस तरह कि वनस्पत्तियों और पौधों ने। ऐसा इसलिए कि वे धरती पर ज्यादा देर तक रह नहीं सकते थे। उन्हें सांस लेने के लिए जल में लौटना ही पड़ता था।
हिन्दू धर्म में सर्प को इसलिए महत्व दिया जाता है कि जहां जल में इसकी करोड़ों प्रजातियां थीं वहीं धरती पर सबसे पहले इसका ही साम्राज्य स्थापित हुआ। यह जल के बगैर भी धरती पर कई दिनों तक रहने में कामयाब रहा और इसने अन्य प्राणियों की अपेक्षा सबसे पहले जल पर अपनी निर्भरता छोड़ दी। इसकी ऐसी भी प्रजातियां थीं, जो उड़ने में सफल हो गई थीं।
वराह, कच्छप और सर्प ने धरती पर जीवन के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिस तरह सर्प की कुछ अन्य प्रजातियां उड़ने में सफल हो गई थीं उसी तरह कछुए की प्रजातियां भी कुछ इसमें सफल रहीं और इस तरह आकाश में कीट-पतंगों, मछलियों, कछुओं और सर्पों की भिन्न-भिन्न प्रजातियों ने आकाश को हरा-भरा कर दिया।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, धरा के पर्यावरण में भारी बदलाव आते गए। जो जीव इन परिवर्तनों के अनुसार अपने आपको ढाल नहीं सके, वे हमेशा के लिए विलुप्त हो गए और जिन्होंने खुद को बचाए रखा वे विजेता कहलाए। उनमें मछली, सर्प, कछु्आ, मगरमच्छ, कीट-पतंगें, चींटी, मकोड़े आदि जलचर और उभयचर प्राणी तो आज भी हैं, लेकिन अब सवाल यह उठता है कि मनुष्य कैसे और किससे बना?
इसके लिए हिन्दू धर्म में दो सिद्धांत हैं- 1. मनुष्य को ईश्वर ने बनाया, 2. क्रम विकास के तहत मनुष्य बना मछली जैसे प्राणी से।
1. मनुष्य को ईश्वर ने बनाया : ब्रह्म से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई और ब्रह्मा ने खुद को दो भागों में विभक्त कर लिया। उसका पुरुष रूप एक भाग का नाम था स्वायंभुव मनु और स्त्री रूप दूसरे का नाम शतरूपा था। सप्तचरुतीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई। प्रमाण यही बताते हैं कि आदि सृष्टि की उत्पत्ति भारत के उत्तराखंड अर्थात इस ब्रह्मावर्त क्षेत्र में ही हुई। 
2. मनुष्य बना मछली जैसे प्राणी से : आज का मनुष्य मछली की लाखों प्रजातियों में से एक विशेष मछली का विकसित रूप है। विकास के क्रम में उसने कई महत्वपूर्ण रूप बदले। लेकिन पूर्व काल में मनुष्य सिर्फ मछली का ही विकसित रूप नहीं रहा और ‍भी कई ऐसे जीव-जंतु थे, जो न मालूम कब वानर की भिन्न-भिन्न प्रजातियां बनते गए और अंतत: उन्हीं में से एक आज का आधुनिक मनुष्य बना। जिस तरह मछलियां हजारों प्रजातियों में पाई जाती हैं उसी तरह मानव भी आदिकाल में हजारों प्रजातियों में थे। हालांकि आज हमें अफ्रीकी, यूरोपीय, चीनी, भारतीय आदि क्षे‍त्र की मानव प्रजातियां ही नजर आती हैं।
वेद में सृष्टि की उत्पत्ति, विकास, विध्वंस और आत्मा की गति को पंचकोश के क्रम में समझाया गया है। पंचकोश ये हैं- 1. अन्नमय, 2. प्राणमय, 3. मनोमय, 4. विज्ञानमय और 5. आनंदमय। 
उक्त पंचकोश को ही 5 तरह का शरीर भी कहा गया है। वेदों की उक्त धारणा विज्ञानसम्मत है।
दो गोलार्ध हैं- एक उर्ध्व और दूसरा अधो। जब आत्मा नीचे गिरती है तो जड़ हो जाती है और इस तरह वह विकास क्रम का हिस्सा बनकर अपने पुरुषार्थ से ऊपर उठना शुरू करती है और अंतत: स्वयं के आनंदस्वरूप को पुन: प्राप्त कर लेती है। लेकिन कुछ ऐसी भी आत्माएं हैं, जो कभी नीचे नहीं गिरीं और जाग्रत हो गईं, वे ही आत्माएं देवात्माएं कहलाईं। उनके कारण भी सृष्टि उत्पत्ति, विकास और विध्वंस हुआ।
महर्षि अरविंद ने अपनी किताब ‘दिव्य जीवन’ में इस संबंध में बहुत अच्छे से लिखा है।

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

डॉ ज़ाकिर नायक परिचय और विवाद और हकीकत -Dr Zakir Naik from controversy and reality -

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डॉ ज़ाकिर नायक परिचय और विवाद और हकीकत -Dr Zakir Naik from controversy and reality -
डॉ ज़ाकिर नायक परिचय और विवाद और हकीकत -Dr Zakir Naik from controversy and reality - डॉ ज़ाकिर नायक परिचय और विवाद ।Dr Zakir Naik introduction and controversy.जाकिर नायक की जीवनी ,जाकिर नायक का राज भारतीय इस्लामी विद्वान और तुलनात्मक धर्म विशेषज्ञ डॉ. जाकिर अब्‍दुल करीम नायक दूसरे धर्मों से मुनाजिरों के हवाले से पहचाने जाते हैं, काम के लिहाज  से एम. बी. बी. एस. डाक्‍टर हैं । स्‍वयं को कुरआन के मुताबिक मुस्लिम कहते हैं लेकिन उनके विरोधियों का कहना है कि नायक अहले हदीस  हैं , अफ्रीका के प्रसिद्ध  धर्म प्रचारक अहमद दीदात को गुरू मानते हैं, 1991 से इस्‍लाम के प्रचार को पूरी दिलचस्‍पी के साथ अपना लिया,  हिन्‍दू, जैन, इसाई आदि से Debate मुनाजरे मशहूर हुए , बहुत से लोंगो ने नायक के द्वारा इस्‍लाम धर्म अपनाया, मुम्‍बई में  पैदा होने वाले नायक इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष हैं और दुनिया के प्रसिद्ध गैर अरबी जाकिर नाइक का बयान डॉ जाकिर नाइक हिंदी ज़ाकिर नायक पुस्तकें zakir naik videos डॉक्टर जाकिर नायक dr zakir naik in hind फरहत नाइक ज़ाकिर नाइक पुस्तकेंजाकिर नाईक हैं कौन और आख़िरकार क्या है उनका कुसूर
भारतीय इस्लामी विद्वान और तुलनात्मक धर्म विशेषज्ञ डॉ. जाकिर अब्‍दुल करीम नायक दूसरे धर्मों से मुनाजिरों के हवाले से पहचाने जाते हैं, काम के लिहाज  से एम. बी. बी. एस. डाक्‍टर हैं । स्‍वयं को कुरआन के मुताबिक मुस्लिम कहते हैं लेकिन उनके विरोधियों का कहना है कि नायक अहले हदीस  हैं , अफ्रीका के प्रसिद्ध  धर्म प्रचारक अहमद दीदात को गुरू मानते हैं, 1991 से इस्‍लाम के प्रचार को पूरी दिलचस्‍पी के साथ अपना लिया,  हिन्‍दू, जैन, इसाई आदि से Debate मुनाजरे मशहूर हुए , बहुत से लोंगो ने नायक के द्वारा इस्‍लाम धर्म अपनाया, मुम्‍बई में  पैदा होने वाले नायक इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष हैं और दुनिया के प्रसिद्ध गैर अरबी भाषी इस्लामी विद्वानों में से एक हैं. इस्‍लामी चैनल पीस टीवी के नाम से चला रहे हैं,   हाजिर जवाबी और मुनाजरों में दस्‍तरस रखते हैं, विलियम केम्‍पबेल से मुनाजिरे के कारण अंतरराष्ट्रीय वक्ता के रूप में प्रसिद्ध हुए, उर्दू-हिंदी मराठी स्‍टाइल में बोलते हैं, अरूण शौरी, योगी आदित्‍यानाथ, तस्लीमा नसरीन जैसी बडी कई धार्मिक और राजनितिक हस्तियों को नायक चुनौती दे चुके हैं तो अपने को सुन्नि मोलवी से बना पंडित कहने वाले महिंद्रपाल और शिया से नास्तिक बना अली सीना जैसे दर्जन से अधिक उनको चुनौती दे रहे हैं । गुरू रामपाल ने तो बहस का झूटा इशतहार तक टीवी पर चलवा दिया था,  अंतरराष्ट्रीय वक्ता के रूप में प्रसिद्ध लगभग 50 वर्षीय जाकिर नायक की पत्नि फरहत नायक, बेटा फारिक नायक और बेटी रूशदा नायक भी प्रचारकों की दुनिया में अपनी पहचान बना चुके।
किसी मुद्दे या ग़लत फेहमी दूर दूर करने के लिए तैयारी के साथ पब्लिक के सामने जो बात करते हैं वो पीस टीवी के कैमरों द्वारा रिकोर्ड करके प्रसारित करदी जाती है । फिर वो वीडियोज समर्थकों के द्वारा ऑनलाइन अपलोड करदी जाती जिसे पसंद करने वाले अपनी भाषाओं में अनुवाद करके प्रकाशित कर लेते हैं।  ऐसे ही तैयार हुई जाकिर नायक की 5 हिंदी पुस्‍तकें खाकसार कैरानवी द्वारा आनलाइन उपलब्‍ध कर दी गयी हैं

    कुरआन और विज्ञान
    क्‍या कुरआन ईश्वरीय ग्रन्थ है?  "IS THE QURAN GOD'S WORD?"
    गैर मुस्लिमों के 20 सवालों के जवाब
    इस्लाम में औरतों (नारियों) के अधिकार
    ''इस्‍लाम आतंकवाद या भाईचारा''
डॉ. जाकिर नाइक को सऊदी अरब के नए शाह ने इस्लाम धर्म के प्रति अभूतपूर्व योगदान के लिए देश के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक से सम्मानित किया..मालूम हो के इस से पहले  अवॉर्ड इस्लाम के मशहूर उलेमा मौलाना अबुल हसन नदवी को 1980 मे दिया गया था.
शाह सलमान ने शानदार पुरस्कार समारोह में किंग फैसल अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार (केएफआईपी) इस्लाम की गैरमामूली सेवा के लिये प्रदान किया. यह पुरस्कार नोबेल पुरस्कार के जैसा मुस्लिम दुनिया में सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है। पांच श्रेणियों - इस्लाम की सेवा, इस्लामिक अध्ययन, अरबी भाषा एवं साहित्य, चिकित्सा और विज्ञान में दिए जाते हैं. हर पुरस्कार के साथ विजेता की उपलब्धियों से जुड़ा अरबी का एक हस्तलिखित प्रमाणपत्र, एक 24 कैरेट 200 ग्राम सोने का स्मारक पदक और 2,00,000 डॉलर की पुरस्कार राशि दी जाती है.
पुरस्कार समारोह में देश के मंत्री, शाही परिवार के सदस्य, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, शिक्षाविद् और प्रतिष्ठित विद्वान मौजूद थे. नाइक ने समारोह के दौरान दिखाई गई एक वीडियो बायोग्राफी में कहा था कि  'इस्लाम एकमात्र धर्म है जो पूरी मानवता के लिए शांति ला सकता है। .वर्तमान में जो यह 1 करोड 32 लाख रूपए से अधिक की राशि होती है यह जाकिर नायक द्वारा पीस टीवी नेटवर्क के वक्फ में दे दान कर दी गयी।
डॉ जाकिर नायक इस्लामी दृष्टिकोण स्पष्ट करने के लिए कारण, तर्क और वैज्ञानिक तथ्यों के साथ साथ साथ अपनी अच्छी याददाश्त से कुरआन, प्रामाणिक हदीस और अन्य धार्मिक ग्रंथों का उपयोग  हवालों के साथ करके, इस्लाम के बारे में दूसरों की गलतफहमी को दूर करना चाहते हैं । वार्ता के बाद दर्शकों से उत्पन्न चुनौतीपूर्ण प्रश्‍नों को समझाने के दिए गए उनके उत्‍तर बेहद पसंद किए जाते हैं।
ज़ाकिर नायक अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, आस्‍टे्लिया, चाईना सहित 30 से अधिक देशों में प्रोगराम में अपने फन का मुजाहिरा लाखों की भीड के सामने कर चुके हैं।
इंग्लिश समाचार पत्र 'इंडियन एक्‍सप्रेस'  ने हिन्‍दुस्‍तान के करोंडों मुसलमानों में से टाप 100 ताकतवर मुसलमानों 2009 की लिस्‍ट में 82 और 2010 ई. में 89 नम्‍बर पर रखा था, 2009 के हिंदुस्‍तान के टाप के दस आध्यात्मिक गुरुओं में उनको तीसरा नम्‍बर दिया गया तो 2010 में सबसे ऊपर जाकिर नायक का नाम दिया गया।
डॉ विलियम कैम्पबेल के साथ उनका सार्वजनिक संवाद, 1 अप्रैल 2000 को "कुरआन और विज्ञान के प्रकाश में बाईबिल" विषय पर शिकागो, संयुक्त राज्य अमेरिका में आयोजित एक प्रोगराम में हुआ, इस संवाद को मुस्लिम दुनिया में बेहद पसंद किया गया, प्रमुख हिंदू गुरू श्री श्री रवि शंकर के साथ उनकी आपसी बातचीत, "पवित्र ग्रंथों के प्रकाश में हिंदू धर्म और इस्लाम में ईश्वर की अवधारणा' को विषय को देखते हुए दोनों धर्मों के मानने वालों में पसंद किया गया । यह धार्मिक गुरूओं से बातचीत ऑनलाइन मक़बूल होने के पश्चात अब उर्दू,हिंदी और इंग्लिश में छप भी चुकी हैं।
“Deedat Plus”
शेख अहमद दीदात इस्लाम और तुलनात्मक धर्म पर विश्व प्रसिद्ध वक्ता ने 1994 में इस्‍लाम की दावत और तुलनात्मक धर्म पर नायक के अध्ययन पर एवार्ड देते हुए जाकिर नायक को "दीदात प्लस" कहते हुए कहा कि ', अल्‍हम्‍दु लिल्‍लाह,बेटा जितना काम तुमने 4 साल में कर दिखाया इतना काम करने में मुझे 40 साल लग गए थे'
दुबई के शासक के प्रधानमंत्री ने 29 जुलाई 2013 को डॉ जाकिर नाइक को प्रतिष्ठित दुबई अंतर्राष्ट्रीय पवित्र कुरआन एवार्ड  अर्थात  '2013 का इस्लामी व्यक्तित्व' और मीडिया, शिक्षा और परोपकार में विश्व स्तर पर इस्लाम और मुसलमानों के लिए काम पर प्रशस्ति पत्र और 272,000 अमेरिकन डालर दिए गए जिन्‍हें जाकिर नायक ने पीस टीवी नेटवर्क में देकर उससे वक़्फ़ फंड शुरू करवा दिया।
मलेशिया के बादशाह द्वारा मलेशिया के सर्वोच्च पुरस्कार अर्थात गणमान्य अंतर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व 2013 अवार्ड नायक की बेमिसाल इस्‍लाम की खिदमत और इस्‍लाम को मजबूती देने के लिए दिया गया साथ ही मलेशिया के प्रधानमंत्री द्वारा हस्ताक्षर किया गया प्रशस्ति पत्र भी 5 नवंबर 2013 में दिया गया था।
शारजाह के शासक द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्लाम के लिए स्वैच्छिक सेवा के लिए वर्ष 2013 के लिए डॉ जाकिर नाइक को 16 जनवरी 2014 को 'स्वैच्छिक कार्य के लिए शारजाह पुरस्कार 2013' दिया गया
गाम्बिया गणराज्य के राष्ट्रपति 15 अक्टूबर 2014 को 'गाम्बिया गणराज्य के राष्ट्रीय आदेश के कमांडर का प्रतीक चिन्ह 2015' सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार से डॉ जाकिर नाइक को सम्मानित किया साथ ही गाम्बिया के विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा, उनके उत्कृष्ट योगदान और ज्ञान के प्रसार और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामुदायिक सेवाओं के अनुसंधान और प्रसव को बढ़ावा देने के लिए डाक्टरेट की मानद उपाधि दी गयी
फेसबुक पेज पर जून 2015 तक की स्थिति के अनुसार, डॉ जाकिर नाईक पेज को दो वर्ष में अल्‍हम्‍दु लिल्‍लाह 8 लाख लाइक मिले, यह न केवल धर्म पर अंग्रेजी में बोलने वाले मुसलमानों के बीच सबसे अधिक में से एक है बल्कि किसी भी अंग्रेजी वक्ता के बीच सबसे अधिक पसंद किया जा रहा  है, यूट्यूब उपाध्यक्ष, टॉम पिकेट, ने बताया है कि यूटयूब पर जाकिर नायक पर लाइक यानि पसंद ओर लोकप्रियता बहुत अच्‍छी है।
डॉ जाकिर नाइक दुनिया के 200 से अधिक देशों में कई अंतरराष्ट्रीय टीवी चैनलों पर नियमित रूप से दिखाई देते हैं। नियमित रूप से टीवी और रेडियो साक्षात्कार के लिए उन्‍हें आमंत्रित किया जाता है। संवाद, बहस और संगोष्ठियों के एक सौ से अधिक डीवीडी उपलब्ध हैं। इस्लाम और तुलनात्मक धर्म पर कई किताबें भी लिखी है।
दूसरों तक आसानी से इस्‍लाम का पैगाम पहुंचाने के लिए पीस टीवी नेटवर्क डॉ जाकिर नायक की सोच का नतीजा है, जनवरी 2006 में पीस टीवी अंग्रेजी में भी शुरू किया गया, 100 मिलियन से अधिक दर्शकों की संख्या के साथ, वर्तमान में दुनिया में 'किसी भी धार्मिक' उपग्रह टीवी चैनल पर यह सबसे अधिक दर्शेकों की संख्‍या हैं जिनमें 25% गैर-मुसलमान हैं, इस सफलता को देखते हुए 2009 में पीस टीवी उर्दू  और 2011 में बंग्‍ला भाषा में शुभारंभ किया गया, 2015 के अंत तक चीनी भाषा सहित विश्‍व की प्रमुख भाषाओ में भी पीस टीवी अपनी सेवा आरम्‍भ कर रहा है । परदे बारे में नायक का एक सवाल के उत्‍तर में कहना था कि तीन सैंकिंड से अधिक महिला का चहरा पीस टी वी पर नहीं दिया जाता जिससे पहली नजर माफ वाली बात पर अमल हो सके।
पीस टीवी का लाइसेंस अरब अमीरात से लिया गया था भारत में इसकी सफलताओं को देखते हुए विरोधियों ने इस पर पाबंदियां लगवायी आज केबल आप्रेटर गंदा या नंगा चैनल दिखा देता है मगर पीस टीवी के लिए बताया जाता है कि डी एम की मंजूरी जरूरी है ,पीस कान्‍फ्रेंस भी बेहद कामयाबी के साथ जारी थी कि उसको भी विरोधियों ने बंद करवादिया अब इधर हालत यह है कि भारत में सभी तरह के लोग अपने प्रोगराम कर सकते हैं लेकिन जाकिर नायक कोई प्रोगराम नहीं कर सकता, वैसे इसके भी अच्‍छे नतीजे रहे कि जाकिर नायक भारत के लिए काफी काम कर चुके अब जरूरत थी विश्‍व स्‍तर पर काम करने की तो उसका मौका पा‍बंदियों से मिल गया।
पीस टीवी पर हो jरही  पाबंदियों को देखते हुए पीस मोबाइल लांच किया गया है जिस में मुसलमान की जरूरतों का पूरा खयाल रखा गया है ।
आर्य समाजी महेंद्रपाल द्वारा चैलंज पर दोनों ओर के समर्थर्कों का विवाद डा. मुहम्मद असलम कासमी की पुस्‍तक
"महेन्द्रपाल आर्य बनाम कथित महबूब अली" के द्वारा उठाई गयी आपत्तियों की विश्लेषणात्मक समीक्षा
से आसानी से समझा जा सकता है, असलम कासमी लिखते हैं
    श्रीमान महेंद्रपाल जी के द्वारा इन्टरनेट पर एक वीडियो डाली गयी है जिसका शीर्षक है महेंन्द्रपाल ने डाक्टर ज़ाकिर नायक के उस्ताद अब्दुल्लाह तारिक को हराया।
     पहली बात तो यह है कि उक्त विडियो जिस प्रोग्राम की है वह कोई शास्त्रार्थ का प्रोगराम नहीं था अपितु आपसी भाईचारे पर आधारित प्रोग्राम था और अगर महेंद्रपाल जी उसे शास्त्रार्थ ही का प्रोग्राम मानते हैं तो फिर बताएं उसमें जज किसे नियुक्त किया गया था, उसमें अधिक संख्या महेन्द्रपाल जी के अनुयाईयों की थी उन्होंने ही प्रोग्राम का आयोजन किया था, और अब्दुल्लाह तारिक को बतौर अतिथि बुलाया गया था।
     अब्दुल्लाह तारिक रियासत रामपुर के रहने वाले मशहूर इस्लामी स्कालर हैं उनके प्रोग्राम पीस टीवी से प्रसारित  होते रहते हैं। परन्तु जाक़िर नायक से उनका कोई गुरू-शिषय का संबंध नहीं है बल्कि उनकी जाक़िर नायक से एक दो मुलाकातों के अलावा अन्य कोई राबता नहीं है। ऐसे में उनको ज़ाकिर नायक का उस्ताद लिखना केवल अज्ञानता है।
     जहाँ तक उनको हराने की बात है। नेट पर मौजूद विडियो में ऐसी कोई बात नहीं दिखती। महेंद्रपाल और अब्दुल्लाह तारिक की बातचीत की इस विडियो को देखकर लगता है कि महेंद्रपाल सच्चाई को जानने समझने और सही बात को मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है बल्कि आक्रमक अंदाज में बेवजह चीख रहे हैं। जबकि अब्दुल्लाह तारिक सभ्यता और शाइस्तगी से बात समझाने का प्रयास कर रहे हैं।
दूसरी बात यह कि आर्य समाजी महेंद्रपाल के समर्थकों को पता नहीं कि नेट में उपलब्‍ध विडियो में पंडित जी स्‍वयं यह बता रहे हैं कि जाकिर नायक ने पंडित महिंद्रपाल को 2004 में सम्‍मेलन में मुम्‍बई में सादर आमंत्रित किया था मगर पंडित जी नहीं पहुंचे,
शियाओं से विवाद
जाकिर नायक की शिया मुफती से टी वी पर बहस सुनने से पता चलता है कि वो देवलबंद, जमाते इस्‍लामी, अहले हदीस आदि से फतवा मंगा चुके, उन फतवों में उन्‍हें यह जवाब दिया गया कि वो यजीद के लिए दुआओं के अल्‍फाज कह सकते हैं, किसी ने मु‍स्‍तहिब कहा है मना किसी ने नहीं किया, फतवों को देख कर नायक का कहना है कि वो आलिमों को कहना मानेंगे, जिन्‍होंने मना नहीं किया, उनका इस बातचीत में यह भी कहना था कि हदीस के मुताबिक जो उस जंग में शरीक हुआ वो जन्‍नती है, यजीद के बारे में गवाही है कि वो उस जंग में कमांडर थे,  अर्थात हजूर की बशारत के मुताबिक जन्‍नती हुए, इस लिए नाम के साथ दुआओं के अलफाज के हकदार हैं,  इमाम गजाली और बुखारी शरीफ की शरह लिखने वाले हाफिज असकलानी से भी उन्‍होंने बताया कि उनका कहना है कि यजीद मुसलमान था, यह भी कहा कि हम जब मुसलमानों के लिए दुआ करते हैं तो सबके साथ उसमें वो भी शरीक होते हैं, यह भी कहा कि वो हजरत हुसैन को पूरी इज्‍जत देते हैं जिसने उनका कतल किया उसको बुरा समझते हैं, लेकिन उस समय यजीद या उस समय की पूरी मुस्लिम फौज को बुरा कहना गलत मानते हैं साथ ही यह भी कहा कि हदीस के मुताबिक अगर हम किसी गलत आदमी के लिए दुआ करते हैं तो वो लगती नहीं और अगर सही आदमी को लानत भेजते हैं तो वो वापस आती है इस लिए लानत भेजने वालों को गोर करने की जरूरत है कि वो सही या गलत पर लानत भेज रहे हैं, उनका यह भी कहना था कि शिया हजरात मुझे बदनाम करने का कुछ बहाना ढूंडते रहते हैं जबकि वो शिया-सुन्‍नी इखतलाफी बातों से बचते रहते हैं कि अगर वो कुछ कहेंगे तो शिया हजरात को जवाब देना में मुश्किल होगी
    उपरोक्‍त टीवी बहस में इस बात की ओर इशारा है कि इमाम गजाली फरमाते हैं '' यजीद की तरफ से हजरत हुसैन (रजिअल्‍लाह अन्‍हू) को कतल करना, या उनके कतल करने का हुकुम देना या उनके कतल पर राजी होना, तीनों बातें दुरूस्‍त नहीं और जब यह बातें यजीद के मुताल्लिक साबित ही नहीं तो फिर यह भी जायज नहीं कि उसके मुताल्लिक ऐसी बदगुमानी रखी जाए क्‍यूंकि कुरआन मजीद में अल्‍लाह का फरमान है कि मुसलमान के मुताल्लिक बदगुमानी हराम है, ( बहवाला मिनहाजु सुन्‍नत, जिल्‍द 4, पृष्‍ठ 5455)
शायद इन सब बातों को देखते हुए ही रामपुर के अब्‍दुल्‍लाह तारिक के साथ मौलाना सलमान नदवी भी नायक के पीस टी वी चैनल से जुड चुके हैं, नए मुस्‍लमान हुई कई विश्‍व में नाम कमा चुकी हस्तियां पहले ही चैनल से जुडे हुए हैं। पब्लिक में जो शंका थी वो सऊदी बादशाह द्वारा इस्‍लाम की गेर मामूली खिदमात पर किंग फेसल इनाम 2015 मिलने से दूर हो गयी, यह किंग फेसल इनाम अली मियां को भी मिल चुका है।

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