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इतिहासकार राजकिशोर राजे बताते हैं कि ताजमहल के निर्माण के दौरान ही यमुना किनारे स्थित दरवाजे बनवाए गए थे, ये ताजमहल के अंदर भूमिगत कमरों में खुलते थे। यहां से शाहजहां ताजमहल में प्रवेश करते थें। राजकिशोर ने अपनी पुस्तक 'तवारीख-ए-आगरा' में लिखा है कि सितंबर 1657 में दिल्ली में शाहजहां को मूत्र रोग हो गया था। जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से उनका बेटा दारा शिकोह उन्हें आगरा लेकर आ गया। यहां उनकी मौत की अफवाह फैल गई। तब उनके जीवित रहते ही बेटों में सिंहासन के लिए युद्ध छिड़ गया था-
इसी खास दरवाजे से अंदर लाया गया था शाहजहां का शव-
राजकिशोर राजे ने बताया कि युद्ध में औरंगजेब जीत गया और शाहजहां को बंदी बनाकर आगरा किले में रखा। करीब आठ साल की कैद के बाद जनवरी 1666 में शाहजहां फिर बीमार पड़ गए और 74 साल की आयु में लाल किले के मुसम्मन बुर्ज में उनका निधन हो गया। तब उनके शव को यमुना के रास्ते नाव से लाकर ताजमहल के खास दरवाजे से इतिहासकारों के लिए रहस्य है यह दरवाजा-
अब यह दरवाजा इतिहासकारों के लिए रहस्य बन गया है, जिसे जानने के लिए सभी इच्छुक हैं। इतिहासकार राजकिशोर राजे ने दिसंबर 2008 में सूचना के अधिकार के तहत इन दरवाजों के बारे में जानकारी मांगी थी। इस पर एएसआई ने जवाब में कहा था कि चमेली फर्श के नीचे बने हुए भूमिगत कमरों में जाने के लिए बने दरवाजे यमुना की ओर खुलते थे। इन दरवाजों को ब्रिटिश शासनकाल में बंद करवा दिया गया था। इनको ईंटों की चुनाई करके बंद किया गया था। इनके निशान आज भी हैं, लेकिन यहां लगे दरवाजे का रिकॉर्ड नहीं है-
ताजमहल के निर्माण से 89 साल पहले की है लकड़ी-
लखनऊ के वकील हरीशंकर जैन सहित छह वकीलों ने आगरा के सिविल अदालत में ताज को राजा परमार्दिदेव द्वारा बनाया गया शिवालय बताते हुए याचिका दायर की है। उनका कहना है कि सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क ब्रुकलिन कॉलेज के प्रोफेसर ईवान टी. विलियम्स ने भी ताजमहल के मुगल काल के होने से पहले की बात कही थी। ब्रिटिश शासनकाल में जब वह ताजमहल आए थे, उस समय वे यमुना किनारे के दरवाजे की लकड़ियों के कुछ अंश ले गए थे। उन्होंने कार्बन डेटिंग करवाई थी और लकड़ी की उम्र साल 1359 बताई। उन्होंने आशंका व्यक्त की थी कि यह लकड़ी ताजमहल के निर्माण से 89 साल पहले की है। गया था। इसके बाद उन्हें मुमताज के बगल में दफनाया दिया गया-
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